सोलापुर के बाद पुणे में भी डीजे मुक्त गणेशोत्सव के लिए जनांदोलन
महाराष्ट्र के सोलापुर के बाद पुणे जैसे शहर में भी डीजे मुक्त गणेशोत्सव की मुहिम शुरु हुई है। लोग धार्मिक उत्सवों के नाम पर बढ़ती अराजकता और अश्लीलता का विरोध कर रहे हैं।

ऐसे दौर में, जब धर्म और आस्था के सार्वजनिक प्रदर्शन का अर्थ दिन-ब-दिन बदलता दिखाई दे रहा है, धार्मिक उत्सव और यात्राएं कई जगहों पर भक्ति से ज्यादा शक्ति-प्रदर्शन का रूप लेती जा रही हैं। आस्था के नाम पर दूसरे समुदाय को नीचा दिखाना, उसे असहज करना और सार्वजनिक जगहों पर अपनी मौजूदगी के जरिए दबाव बनाना मानो धार्मिक उत्सवों की नई पहचान बनते जा रहे हैं।
लेकिन इसी शोर के बीच महाराष्ट्र के कुछ शहरों से आती तस्वीरें इस पूरे विमर्श को एक अलग दिशा देती हैं। यहां सवाल यह नहीं कि किसका धर्म कितना ऊंचा है, बल्कि यह है कि क्या आस्था बिना शोर, बिना शक्ति-प्रदर्शन और बिना किसी दूसरे समुदाय को परेशान किए भी मनाई जा सकती है?
इस सवाल का एक बेहद दिलचस्प जवाब महाराष्ट्र के सोलापुर से मिलता है।
देश के दूसरे हिस्सों के लोगों के लिए शायद यह जानना दिलचस्प होगा कि दस लाख से अधिक आबादी वाला महाराष्ट्र का यह ऐतिहासिक शहर पिछले साल से ‘डीजे-मुक्त गणेशोत्सव’ की पहल को आगे बढ़ा रहा है। सोलापुर को आज़ादी के आंदोलन में उसके नागरिकों की कुर्बानियों के कारण ‘शहीदों का शहर’ भी कहा जाता है। लेकिन आज इस शहर की एक और पहचान उभर रही है—धार्मिक उत्सव को शोर और शक्ति-प्रदर्शन से अलग करने की नागरिक पहल।
यह पहल किसी सरकारी फरमान का नतीजा नहीं, बल्कि नागरिकों के संगठित और सचेत प्रयास का सम्मान है। यानी उत्सव वही, आस्था वही, पर तरीका बदलने की कोशिश। और शायद यही बात इसे महज़ ‘डीजे बंद करने’ के अभियान से कहीं बड़ा बनाती है। क्योंकि असली सवाल डीजे का नहीं है। असली सवाल यह है कि हम अपने धर्म को किस तरह सार्वजनिक करते हैं—अपनी आस्था के रूप में या अपनी ताक़त के प्रदर्शन के रूप में?
जब देश के कई हिस्सों में धार्मिक जुलूसों और उत्सवों को लेकर तनाव, टकराव और सामुदायिक असहजता की खबरें आम होती जा रही हों, तब सोलापुर का यह प्रयोग बताता है कि धर्म को सार्वजनिक जीवन में मौजूद रखने का एक दूसरा रास्ता भी हो सकता है—जहां उत्सव हो, उत्साह हो, पर उन्माद न हो; आस्था हो, मगर आक्रामकता नहीं; और धार्मिक पहचान हो, मगर दूसरे की कीमत पर नहीं। इस साल भी सोलापुर में उसी दिशा में तैयारियां चल रही हैं।
सोलापुर की तर्ज पर ही महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहर पुणे में भी मुहिम ने जनांदोलन का रूप लिया है कि धार्मिक उत्सवों को 'डी जे मुक्त' , 'ध्वनि प्रदूषण रहित ' किया जाए।
गौरतलब है कि बीते एक दशक से अधिक समय के दौरान जबसे हिंदुत्व वर्चस्ववादी ताक़तों ने सत्ता संभाली है , तबसे ये बात बार बार रेखांकित हो रही है कि किस तरह धार्मिक उत्सवों का भी स्वरुप बदल गया है , कभी रामनवमी के नाम पर तो कभी कांवड़ यात्रा के नाम पर तो कभी अन्य किसी धार्मिक आयोजन के बहाने ऐसी ही कोशिशें नज़र आती हैं। इस बाबत कई लेख लिखे गए हैं और किताबें भी लिखी जा रही हैं।
धार्मिक उत्सवों के दौरान डी जे और लाउड स्पीकर के ज़रिये अश्लील या संप्रदाय विशेष को निशाना बनाने वाले नारे लगाना, गीत गाना ऐसी कोशिशों का एक अहम हिस्सा बन चुका है। लेखक-पत्रकार कुणाल पुरोहित ने हिंदुत्वा पॉप (Hindutva Pop) नाम से किताब लिखी है, जो इसी बात पर रौशनी डालती है।
सर्वविदित है कि पश्चिमी भारत में – और खासकर महाराष्ट्र में गणेशोत्सव धूम धाम से मनाया जाता है, और चंद दिनों के बाद ही चारों तरफ 'गणपति बाप्पा मोरया ' का नारा गूंजेगा।
पिछले दिनों पुणे महानगरपालिका में इसी सिलसिले में गणेशोत्सव की तैयारियों की बैठक 24 अगस्त को हुई। बैठक में सार्वजानिक गणेशोत्सव का आयोजन करने वाले मंडलों के प्रतिनिधि और आम नागरिकों को सुझाव देने के लिए या बुलाया गया था। लेकिन इस बैठक में जो हुआ वह अभूतपूर्व था, जिसकी पुणे ही नहीं महाराष्ट्र के इतिहास में लम्बे वक़्त तक चर्चा होती रहेगी।
बैठक में शामिल विद्यानंद बापट नाम के एक युवा ने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। कोंकण के रत्नागिरी जिले का यह युवा बीते करीब 8 साल से पुणे में रहकर एक बीपीओ में काम करता है। किसी संगठन से सीधा जुड़ाव तो उसका नहीं हैं, लेकिन हाल के वर्षों में धार्मिक उत्सवों के बदलते स्वरुप को लेकर उसने अपनी चिंता सबके सामने रखी। उसने गणेशोत्सव - और तमाम धार्मिक उत्सवों में , प्रार्थना स्थलों पर - बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को रोकने की मांग उठाई और इस बात को भी रेखांकित किया कि कर्कश ध्वनियों के चलते लोगों के स्वास्थ्य पर कितना गंभीर असर पड़ता है। इस युवा ने यह भी बताया कि किस तरह धार्मिक उत्सवों के नाम पर सड़कों पर अस्थायी मंडप बनाये जाते हैं , जिससे लोगों और वाहनों की आवाजाही में असर पड़ता है, लोगों का तनाव बढ़ जाता है।
विद्यानंद बापट की बातें इतनी तार्किक और तथ्यपरक थी कि सभी लोग ध्यान से सुन रहे थे। उसने कहा कि सोलापुर शहर अगर इस दिशा में पहल ले सकता है, पिछले साल से ही अपने आप को 'डी जे मुक्त' घोषित कर सकता है तो पुणे पीछे क्यों रहे? यह शहर जिसने तमाम समाज सुधारकों को पैदा किया है , जहां सावित्री- ज्योतिबा पहले दम्पति ने अपने सहयोगियों फातिमा शेख और उस्मान शेख के साथ मिलकर शिक्षा का अलख जगाया, जहां आगरकर जैसे समाज सुधारक सक्रिय रहे, वह शहर अभी क्यों परम्परा की दुहाई देकर धार्मिक उत्सवों के प्रचंड शोरगुल को, अश्लील गानों को जगह दे रहा है? क्यों नहीं यहां पर भी डी जे तथा लाउडस्पीकर मुक्त धार्मिक आयोजन का संकल्प नहीं लिया जा सकता !
इस दौरान कुछ लोगों ने उसे चुप कराने और यहां तक कि उस पर हाथ उठाने की भी कोशिश की, और पुलिस के उसे अपने घेरे में लेकर सभा से बाहर ले जाना पड़ा। लेकिन विद्यानंद बापट ने के सवालों ने शहर के लाखों लोगों की भावनाओं को शब्द दे दिए थे। बहुत से लोग थे जो निजी स्तर पर डीजे के बढ़ते शोरगुल पर आक्रोश तो जताते थे और त्योहारों के दिनों किसी शांत जगह पर चले जाते थे। ऐसे ही लोगों ने बापट की बातों को एक मुहिम बना दिया। सोशल मीडिया, यूट्यूब आदि पर इसे लेकर अभियान सा शुरु हो गया। मराठी के मुख्यधारा की मीडिया ने विद्यानंद के इस मिशन को अपना मिशन बना लिया। एक पत्रार ने तो अपनी ख़बर की सुर्खी इस तरह बना ली ' बापटांनी पुणे पेटवले ' ( बापट ने पुणे में आग लगा दी ')
एक हस्ताक्षर अभियान शहर के स्तर पर शुरू हुआ जिसमें सरकार से यह मांग की गयी की वह डी जे पर रोक लगा दे। पुणे के 'गुडलक चौक ' जैसे स्थानों पर लोगों ने बाकायदा धरना दिया और इस मांग को बुलंद किया। खबरें आईं कि कुछ उपद्रवियों ने धरना दे रहे लोगों पर हमला करने की भी कोशिश की।
इस हमले से यह चर्चा भी शुरु हो गई है कि डीजे मुक्त गणेशोत्सव की मांग के पीछे लोगों के बढ़ती संख्या से निहित स्वार्थी तत्वों में बेचैनी घर कर गई है। उन्हें भय सता रहा है कि जनांदोलन के बड़ा होने पर मांग पर अमल भी हो सकता है। फिलहाल पुणे शहर में डीजे मुक्त गणेशोत्सव की मांग को लेकर गेंद सरकार के पाले में है। जिला प्रशासन या राज्य सरकार ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है।
पुणे के पहले इस मामले में पहल लेने वाला शहर सोलापुर है। पुणे से लगभग 250 किलोमीटर दूर - पूरब दक्षिण के किनारे स्थित सोलापुर ने पिछले साल ही डीजे मुक्त गणेशोत्सव के युग में प्रवेश किया जब गणेशोत्सव में ना ही डी जे बजा और ना ही लेज़र लाइट से सजावट की गयी। बिना नागरिकों की मुहिम से यह संभव नहीं था। लेकिन नागरिकों की यह मुहिम शहर की दो त्रासदियों का नतीजा थी।
फरवरी 2025 के शिवजयंती जुलुस में राजू यादगिरकर नाम के व्यक्ति ने आयोजकों से गुजारिश की कि उनकी 80 साल की मां की तकलीफ़ तेज़ आवाज़ में बढ़ रही है तो उस आवाज़ को कृपया कम कर दें। लेकिन आयोजकों ने उसकी नहीं सुनी और उसे अपमानित किरते हुए डीजे के स्पीकर के सामने ही बैठने को मज़बूर किया जिससे वह हमेशा के लिए बहरेपन का शिकार हुआ। , अगस्त माह में किसी दूसरे धार्मिक प्रदर्शन में अभिषेक बिराजदार नामक 27 साल के एक युवक का डीजे की धुन पर नाचते हुए दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। डॉक्टरों ने बताया कि, 'तेज आवाज़, शारीरिक थकान और तनाव के चलते दिल का दौरा पड़ा था। और ऊंचे आवाज वाले डीजे सिस्टम से लोगों के स्वास्थ को काफी ख़तरा हो सकता है।'
इन दुर्घटनाओं से लोगों में आक्रोश पैदा हुआ है और सोलापुर के नागरिकों ने 'डीजे मुक्त सोलापुर एक्शन कमेटी' बनाई। इसमें वकील, डॉक्टर, वरिष्ठ नागरिक, छात्र और साधारण नागरिक भी जुड़े। इस कमेटी ने एक दिन में चालीस हज़ार से अधिक हस्ताक्षर जमा किए। 20 अगस्त 2025 को डीजे मुक्त गणेशोत्सव के लिए वरिष्ठ नागरिकों ने सैकड़ों की संख्या में शामिल होकर जुलुस निकला और महज़ पांच दिन बाद 550 डॉक्टरों ने भी इंडियन मेडिकल असोसिएशन तथा डॉक्टरों के अन्य संगठनों के बैनर तले जुलुस निकले। इस बढ़ते जनदबाव को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी हस्तक्षेप किया और सोलापुर डीजे मुक्त गणेशोत्सव को अपनाने वाला पहला शहर बन गया।
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