अजय माकन ने AAP और बीजेपी की खोली पोल, कहा- हर मोर्चे पर हुए हैं दोनों फेल

दिल्ली विधानसभा चुनाव अब पूरे रंग में आ चुका है। कांग्रेस, बीजेपी और आप, तीनों दलों ने अपनी ताकत झोंक रखी है। ऐसे में दिल्ली और केंद्र के पूर्व मंत्री अजय माकन ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को हर मोर्चे पर नाकाम बताया है। नवजीवन ने उनसे खास बात की।

फोटो : सोशल मीडिया
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दिल्ली में चुनावी सरगर्मियां अब आखिरी दौर में हैं। अब कौन से मुद्दे इस चुनाव के केंद्र में हैं?

बुनियादी मुद्दे तो दिल्ली से ही जुड़े होने चाहिए, लेकिन बीजेपी अपने स्टार प्रचारकों के जरिए माहौल में जहर घोलने की कोशिश कर रही है और उनकी पूरी कोशिश है कि चुनाव का माहौल सांप्रदायिक हो जाए। बीजेपी चुनावी माहौल को हिंसा की तरफ ले जाना चाहती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि दिल्ली के लोग बीजेपी की इस साजिश को समझ रहे हैं और लगता है कि बीजेपी दिल्ली में तीसरे नंबर पर रहेगी। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच है। दिल्ली वाले  बीजेपी को सबक सिखाएंगे।

कांग्रेस  जिन मुद्दों को लेकर लोगों के बीच गई है वह हैं दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण, दिल्ली में बढ़ती बेरोजगाकी। दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के आने का मसला है, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का मुद्दा है, अनिधिकृत कॉलोनियों में विकास ठप होने का मुद्दा है। यह वह मुद्दे हैं जिसके लिए आप और बीजेपी दोनों ही जिम्मेदार हैं।

यह मुद्दे होने चाहिए, लेकिन बीते सप्ताह के दौरान प्रधानमंत्री से लेकर बीजेपी के तमाम नेताओं ने इन मुद्दों की जगह शाहीन बाग को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की है। क्या बीजेपी इसमें कामयाब होगी?

जैसा कि मैंने कहा कि बीजेपी को बिल्कुल कामयाबी नहीं मिल रही है। हमने चुनाव आयोग से बीजेपी की शिकायत की है कि वह सांप्रदायिकता फैला रही है और ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। हमारी शिकायत के बाद ही चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के प्रचार करने पर रोक लगाई। हमें उम्मीद है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराएगा।

कांग्रेस केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर मुफ्त सुविधाएं देने का आरोप लगाती रही है, लेकिन खुद कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में आप से आगे बढ़कर दो सौ की जगह तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा किया है। तो फिर कांग्रेस और आप में फर्क क्या है?

हमने कभी यह नहीं कहा कि मुफ्त बिजली क्यों दी जा रही है। हमने तो इस बात की आलोचना की है कि उन्होंने अपने घोषणाप्तर में कहा था कि सब्सिडी के जरिए नहीं बल्कि बिजली कंपनियों के काम के तरीकों को बदल कर कीमतें कम करेंगे। उन्होंने खुद अपने घोषणाप्तर में कहा था कि सब्सिडी देनी भी पड़ेगी तो निजी कंपनियों को नहीं देंगे, बल्कि सरकारी कंपनी ट्रांसको को देंगे। लेकिन, अब पिछले  पांच साल में उन्होंने 9 हजार करोड़ रुपए सीधे तौर पर निजी कंपनियों को दिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह 9 हजार करोड़ रुपए सीधे उपभोक्ताओं को जाना चाहिए था जैसा कि कांग्रेस के शासनकाल में मिट्टी के तेल के मामले में डायरेक्ट ट्रांसफर के तहत उपभोक्ता को सीधा फायदा पहुंचाया गया। अगर यह पैसा सीधे लोगों को दिया जाए तो लोग 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त पा सकेंगे।

कांग्रेस के घोषणापत्र में बेरोजगारी भत्ते की बात कही गई है। क्या दिल्ली की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह इतनी बड़ी रकम मुहैया करा सके?

बिल्कुल, हम ने इसका पूरा हिसाब लगाया है। हमने जिस बेरोजगारी भत्ते की बात की है उसका हिसाब-किताब है हमारी 25 साल से कम की जो आबादी है वह दिल्ली की आबादी की पचास फीसदी है और 35 साल से कम की आबादी 5 फीसदी है। यानी 25 से 25 फीसदी आबादी 15 फीसदी है। सीएमआईई के आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश में बेरोजगारी की दर है वह 15 फीसदी है। अगर हम 25 से 25 साल के युवाओं को ग्रेजुएट मानें तो संभव नहीं है, फिर भी यह संख्या 4.5 लाख होती है और अगर हर युवा को हम 6 हजार रुपए देंगे तो इसपर 3240 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। यह रकम दिल्ली के बजट का पांच फीसदी है। इसके अलावा युवाओ को यह पैसा यूं नहीं दिया जाएगा। उन्हें 100 दिन का प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि उन्हें आगे चलकर नौकरी मिल सके। इस सबका मकसद यह है कि हमारे युवाओं को स्किल ट्रेनिंग दे सकें और पैसा न होने की वजह से वे हताशा का शिकार न हों। बेरोजगारी भत्ता बहुत सारी सामाजिक बुराइयों को भी रोकेगा।

आम आदमी पार्टी सरकार के बारे में यह धारणा बनी हुई है कि उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में  क्रांतिकारी काम किया है। कांग्रेस का इस पर क्या कहना है?

अगर आप सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत क्रांतिकारी काम किया है तो इसे आंकने का पैमाना है कि बारहवीं में कितने बच्चे पास हुए। 2014 तक कांग्रेस सरकार सत्ता में थी हर साल बढ़ते-बढ़ते सरकारी स्कूलों से बारहवीं की परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या 1.47 लाख हो गई थी, लेकिन अब हर साल घट कर 2018 में 1.02 लाख हो गई है यानी 45 हजार कम हो गई। मुझे समझ नहीं आता कि इस में क्या क्रांतिकारी बात है। क्योंकि सरकारी स्कूलों से बारहवीं पास करने वाले छात्रों की संख्या तो कम हुई है। यहां ध्यान रखिए कि 2009 में यह संख्या 77 हजार थी जो 2014 में बढ़कर 1.47 लाख पहुंच गई थी।

इस सरकार ने कोई नया स्कूल या अस्पताल नहीं बनाया। जबकि कांग्रेस ने 15 साल में 14 नए अस्पताल बनवाए, यानी हर साल एक नया अस्पताल। उ्होंने एक नई यूनिवर्सिटी नहीं बनाई, जबकि कांग्रेस ने पांच नई यूनिवर्सिटी बनाईँ। हमने गुरु गोविंद सिंह यूनिवर्सिटी बनाई जिसमें 85 फीसदी दिल्ली के बच्चों को दाखिला मिलता है। वास्तविकता यह है कि इस सरकार ने जमीन पर कुछ नहीं किया लेकिन प्रचार ऐसा है कि जैसे पता नहीं क्या कर दिया।

यह हकीकत है कि कोई नया अस्पताल नहीं बना, लेकिन पूरी दुनिया में मोहल्ला क्लीनिक की तारीफ हो रही है।

उनका खुद का कहना है कि उन्होंने 185 मोहल्ला क्लीनिक बनाए हैं जबकि हमारा कहना है कि सिर्फ यह देख लें कि 2014 में कितनी सरकारी डिस्पेंसरी चल रही थीं और अब कितनी। अब तक 115 सरकारी डिस्पेंसरी बंद हो चुकी हैं। कांग्रेस के जमाने में दिल्ली में कुल डिस्पेंसरी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की संख्या 1370 थी। अगर मोहल्ला क्लीनिक और डिस्पेंसरी की तुलना करें तो पाएंगे कि मोहल्ला क्लीनिक का कंसेप्ट ही सही नहीं है। इन क्लीनिक में दिन सिर्फ 4 घंटे काम होता है और उसमें काम करने वाले डॉक्टर स्थाई सरकारी कर्मचारी नहीं होते। उनको प्रति मरीज के हिसाब से पैसा मिलता है जिसमें पारदर्शिता बिल्कुल नहीं है। हमने इस पर सवाल पूछा और सरकार के पास इसका जवाब नहीं है।

हमारी जांच में सामने आया था कि कुछ डॉक्टर सवा लाख रुपए तक फीस लेते हैं। यानी हर 15 सेकेंड में वह एक मरीज देख रहे हैं यानी हर मिनट चार मरीज। पार्टी के वर्कर की जगह पर 25 से 30 हजार रुपए महीना किराए पर मोहल्ला क्लीनिक चल रही है। शुंगलू कमेटी ने इसकी जांच की थी और बहुत सी गड़बड़ियां सामने आई थीं।

अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है। ौर बजट से मायूसी बढ़ी है। उन चुनावों में इसको आप कैसे देखते हैं?

अर्थव्यवस्था खराब होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोगों ने खर्च करने की क्षमता कम हो गई है। और इसकी वजह है लोगों केपास पैसा न होना। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से पैसे का सर्कुलेशन रुक गया है। जब पैसा नहीं है तो लोग खरीदारी कैसे करेंगे। और जब खरीदारी नहीं होगी तो मांग नहीं बढ़ेगी। देहात में लोगों के पास पैसा नहीं है। कांग्रेस ने गांव के लिए मनरेगा जैसी योजना शुरु की थी, जिसके कारण लोगों के हाथ में पैसा रहा, और इससे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी। लेकिन इन लोगों ने मनरेगा का गला घोंट दिया। सरकारी कर्मचारी परेशान हैंं और इसीलिए अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है। केंद्र की मौजूदा सरकार सिर्फ धनी लोगों की सरकार है।

चुनाव में कांग्रेस के बड़े चेहरे नजर नहीं आ रहे। आप की तरफ से खुद केजरीवाल ने मोर्चा संभाला है, बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी समेत केंद्रीय मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री मैदान में हैं। ऐसा क्यों?

दिल्ली के तमाम नेता और कांग्रेस के तमाम मुख्यमंत्री चाहे वह पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह हों, चाहे राजस्थान के अशोक गहलोत हों सब प्रचार में लगे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद समेत सब मैदान में उतरे हुए हैं। हमारा शीर्ष नेतृत्व आखिरी चरण में ही प्रचार में उतरता रहा है, लेकिन मीडिया जानबूझकर कांग्रेस का प्रचार नहीं दिखाना चाहती। अगले दो दिनों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी प्रचार  करते दिखेंगे।

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