अयोध्या केस: सभी पक्षों ने लिखित में भी दोहराए अपने दावे, हिंदू पक्ष नहीं चाहते विवादित भूमि का हो बंटवारा

अयोध्या मामले सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में अपने लिखित दावे भी जमा करा दिए हैं। हालांकि कुछ पक्षों ने अपने दावे सीलबंद लिफाफे में दिए हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि हिंदू पक्ष विवादित भूमि का हिंदूओं और मुस्लिम के बीच बंटवारा नहीं चाहता है।

फोटो : Getty Images
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ऐशलिन मैथ्यू

अयोध्या के बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के 134 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने मुकदमे के दोनों पक्षों (हिंदू और मुस्लिम) को लिखित में मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर अपनी राय देने को कहा, यानी कोर्ट ने सभी पक्षों से पूछा कि वे किस मुद्दे पर कोर्ट का फैसला चाहते हैं।

सभी पक्षों ने कोर्ट की तय समयसीमा में अपने लिखित पक्ष जमा करा दिए हैं। मुकदमे के सभी मुस्लिम पक्षों ने संयुक्त रूप से एक सीलबंद लिफाफे में अपनी राय कोर्ट को दे दी है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि मुस्लिम पक्ष ने इसमें क्या राय दी है। हालांकि कोर्ट में बहस के दौरान मुस्लिम पक्ष की मांग थी कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल का पुनरुद्धार किया जाए, यानी जैसी मस्जिद पहले थी, वैसे ही बनाई जाए। उधर हिंदू पक्ष की तरफ से निर्मोही अखाड़ा ने भी सीलबंद लिफाफे में अपनी राय कोर्ट को दी है। लेकिन कुछ हिंदू पक्ष ऐसे भी हैं जिन्होंने कोर्ट को दी गई अपनी राय सार्वजनिक कर दी है।

सूत्रों का कहना है कि निर्मोही अखाड़ा ने अपनी राय में 6 संभावित विकल्पों की राय दी है कि अगर कोर्ट इन छह में से जिस भी विकल्प पर फैसला देता है तो वे क्या चाहते हैं।

केस नंबर 5 में रामलला विराजमान की तरफ से पेश हिंदू पक्ष ने कहा है कि सभी के हित में यह रहेगा कि हिंदुओं को इस पवित्र स्थल का कब्जा दिया जाए और पूरी भूमि राम लला को सौंपी जाए। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड विवादित भूमि पर दावा नहीं कर सकते। इस पक्ष ने साथ ही निर्मोही अखाड़े के दावे पर भी सवाल उठाए हैं। इस पक्ष ने कहा है कि कोर्ट को हिंदुओं की इच्छाओं का ध्यान रखते हुए फैसला देना चाहिए।

इसके अलावा श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि भूमि का फैसला राम लला विराजमान के पक्ष में होना चाहिए। समिति ने प्रस्तावित राम मंदिर के प्रबंधन और प्रशासन के लिए भी योजना तय करने की अपील की है। इसके अलावा मांग की है कि केंद्र सरकार एक ट्र्स्ट बनाए जिसके सदस्यों में वह सभी लोग हों जिन्होंने भूमि पर अपना दावा दायर किया है।

इसके अलावा अखिल भारतीय हिंदू महासभा का कहना है कि चूंकि मुस्लिम पक्ष ने दलील दी है कि भगवान राम के सही जन्मस्थान का पता नहीं है, ऐसे में पूरे अयोध्या नगरी को पवित्र नगरी घोषित किया जाए।

वहीं 16 जनवरी 1950 को मुकदमा दायर करने वाले गोपालदास विशारद ने मांग की है कि इस केस में किसी किस्म का कोई समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि इस केस में मुस्लिमों का कोई अधिकार ही नहीं है इसलिए किसी जमीन पर कब्जा करने वाले को उसका स्वामित्व नहीं देना चाहिए।

इन सारी राय को देखकर मोटे-तौर पर आभास होता है कि हिंदू पक्ष किसी भी हाल में नहीं चाहता कि अयोध्या की विवादित भूमि का हिंदू और मुस्लिम के बीच बंटवारा हो।

ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यी संविधान पीठ ने इस पूरे मामले की 40 दिन सुनवाई के बाद 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया। इस पीठ की अगुवाई मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कर रहे हैं जो 17 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं।

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