TMC में बगावत के बीच ममता बनर्जी का कविता से वार, 'गिरगिट' शीर्षक से लिखी तीखी कविता!
ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया पर साझा की गई कविता ‘गिरगिट’ में उन लोगों को निशाना बनाया है जो निजी फायदे के लिए अक्सर अपनी निष्ठा, विश्वास और स्थिति बदलते रहते हैं, जिस तरह गिरगिट अपना रंग बदलता है।

पश्चिम बंगाल में सत्ता चले जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की बढ़ती आवाजों के बीच, पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने ‘गिरगिटि (गिरगिट)’ शीर्षक से एक नई कविता लिखी है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक उन नेताओं के लिए एक अप्रत्यक्ष संदेश मानते हैं जो हाल के दिनों में पार्टी की आलोचना करने लगे हैं।
सोशल मीडिया पर साझा की गई कविता ‘गिरगिट’ में उन लोगों को निशाना बनाया है जो निजी फायदे के लिए अक्सर अपनी निष्ठा, विश्वास और स्थिति बदलते रहते हैं, जिस तरह गिरगिट अपना रंग बदलता है।
कविता में, पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा है कि कुछ लोग ‘गिरगिट से भी ज्यादा खतरनाक’ होते हैं क्योंकि वे अपने आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घंटों में अपना चरित्र एवं चाल बदल लेते हैं।
कविता में कहा गया है, ‘‘आप अपने चरित्र में और कितना बदलाव लाना चाहते हैं? आपके पैरों में कितना चढ़ावा चढ़ाया जाएगा? आप खुद को और कितना बदलना चाहते हैं?’’
राजनीतिक हलकों में कई लोगों ने इसे उन नेताओं पर कटाक्ष के रूप में देखा है जिन्होंने हाल में तृणमूल से खुद को अलग कर लिया है। यह कविता ऐसे समय में आई है जब कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के प्रति असंतोष व्यक्त किया है, भ्रष्टाचार से संबंधित आरोप लगाए हैं और आंतरिक कामकाज पर सवाल उठाए हैं। इस असंतोष के साथ-साथ हाल के सप्ताहों में पार्टी पदों से कई इस्तीफे भी हुए हैं।
ममता बनर्जी की कविता किसी का नाम लिए बिना सार्वजनिक जीवन में कृतज्ञता, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनशीलता के क्षरण पर शोक व्यक्त करती है। वह यह बताती है कि कुछ व्यक्ति परिस्थितियां बदलने पर अपने रिश्तों, विचारधाराओं और विश्वासों को आसानी से बदल लेते हैं।
कविता कहती है कि वफादारी और शत्रुता की अभिव्यक्तियां अक्सर स्वार्थ से प्रेरित होती हैं। वह यह प्रश्न उठाती है कि क्या ऐसे व्यक्ति कभी अपने कार्यों का आत्मनिरीक्षण करते हैं।
कविता यह भी दर्शाती है कि समाज में अब भी ऐसे लोग हैं जो अपने सिद्धांतों के प्रति समर्पित हैं, हालांकि उनकी आवाज अक्सर उन लोगों के शोर में दब जाती है जो अपने हितों के अनुरूप रंग बदलते रहते हैं।
यह नवीनतम कविता बनर्जी की पिछली रचना ‘दोखोल’ (कब्जा) के बाद आई है, जिसने भी राजनीतिक बहस छेड़ दी थी। उस कविता को व्यापक रूप से भाजपा सरकार की आलोचना के रूप में देखा गया था, जिसने इस महीने की शुरुआत में राज्य में सत्ता संभाली है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ‘गिरगिट’ बनर्जी द्वारा कविता को राजनीतिक संदेशों को संप्रेषित करने के माध्यम के रूप में उपयोग करने का एक प्रयास प्रतीत होता है, खासकर ऐसे समय में जब तृणमूल कांग्रेस चुनावी हार के बाद संगठनात्मक चुनौतियों और दलबदल दोनों से जूझ रही है।
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