कोरोना की दवाओं की खोज से बंधी एक और उम्मीद, महामारी के खिलाफ वैश्विक प्रयासों को जल्द मिलेगी बड़ी सफलता

अभी तक कोरोना का सबसे बेहतर इलाज सिंथेटिक-एंटीबॉडीज या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल के रूप में उपलब्ध था, जिसे इंजेक्शन के सहारे दिया जाता था। अब जो दवाएं आई हैं, उन्हें गोलियों के रूप में लिया जा सकता है। दावा है कि इनके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

अमेरिका की दो दवा कंपनियों ने कोरोना की दवाइयों की खोज का ऐलान करके कोविड-19 संक्रमण का सामना कर रही दुनिया को राहत दी है। गोलियों की शक्ल वाली ये दवाएं महंगी हैं, पर दुनिया को इनसे उम्मीद बंधी है। इनमें से एक को ब्रिटेन की मेडिसंस एंड हैल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगलुेटरी एजेंसी (एमएचआरए) ने स्वीकृति दे दी है। दोनों को अमेरिकी फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्शन रे (एफडीए) की मंजूरी भी मिलने की संभावना है। दावा है कि दोनों दवाएं वायरस को शरीर के भीतर बढ़ने से रोकती और उसके असर को खत्म करती हैं।

हालांकि इसके पहले भी कोविड-19 की दवाएं तैयार किए जाने का दावा किया गया है, पर यह पहली बार है कि किसी सरकारी संस्थान ने दवा को मंजूरी दी है। इन दवाओं की प्रभावोत्पादकता पक्के तौर स्थापित हुई, तो कोविड-19 के विरुद्ध वैश्विक प्रयासों को यकीनन बड़ी सफलता मिलेगी। वैक्सीन के साथ-साथ अब ये दवाएं भी हमारे पास हैं।

ब्रिटिश वायरोलॉजिस्ट स्टीफन ग्रिफिन का कहना है कि इनकी सफलता से सार्स-कोव2 के संक्रमण के घातक परिणाम रोकने में मदद मिलेगी । बीबीसी के अनुसार, ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जावेद ने इसे ‘गेमचेंजर’ बताया है। उन्होंने कहा, ‘आज का दिन हमारे देश के लिए ऐतिहासिक है क्योंकि ऐसे एंटीवायरल को मंजूरी देने वाला यूके विश्व का पहला देश बना गया है।’

अभी तक कोरोना का सबसे बेहतर इलाज सिंथेटिक एंटीबॉडीज या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल के रूप में उपलब्ध था जिसे इंजेक्शन के सहारे दिया जाता था। अब जो दवाएं आई हैं, उन्हें गोलियों के रूप में लिया जा सकता है। दावा यह भी है कि इनके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं। दवा कंपनी मर्क ने बताया है कि उसकी दवाई मोलनुपिराविर को ब्रिटिश औषधि नियामक की स्वीकृति मिल गई है। अमेरिकी एफडीए से स्वीकृति का अनुरोध किया गया है। यूरोपियन मेडिसन एजेंसी भी कुछ औषधियों को स्वीकृति देने पर विचार कर रही है।


जोखिम कम हुआ

मर्क की घोषणा के अगले ही दिन फायजर ने भी अपनी दवा पैक्सलोविड की सफलता की घोषणा की। दोनों ही एंटी-वायरल हैं। दोनों कंपनियों का दावा है कि इनके सेवन से संक्रमित व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत कम रह जाएगी। दवा को ब्रिटिश स्वीकृति मिलने के पहले ही मर्क और अमेरिकी सरकार के बीच मोलनुपिराविर के 17 लाख कोर्सों की सप्लाई का सौदा हो चुका है। कोर्स, यानी पांच दिनों की पूरी दवाई।

फायजर ने बताया कि पैक्सलोविड ब्रांड नाम की इस गोली को मरीज को दिन में दो बार देना होता है। शर्त है कि उसे एफडीए की स्वीकृति मिल जाए। कंपनी का कहना है कि साल के अंत तक दवा के एक करोड़ कोर्स तैयार कर लेंगे। 2022 में लक्ष्य दो करोड़ कोर्स का है। मर्क ने इसे बनाने का लाइसेंस कुछ दूसरी कंपनियों को भी दिया है।

भारत में भी इसका ट्रायल चल रहा है। संभव है कि किसी कंपनी को इसके उत्पादन का लाइसेंस मिले। गेट्स फाउंडेशन के ग्लोबल हेल्थ कार्यक्रम के अध्यक्ष ट्रेवर मंडेल ने कहा है कि अपेक्षाकृत कम अमीर देशों में जेनरिक दवाएं बनाने वाली कई कंपनियां मोलनुपिराविर की मांग का इंतजार कर रही हैं। इसलिए फाउंडेशन ने 12 करोड़ डॉलर इस मद में रख दिए हैं।

क्या गरीबों को मिलेगी?

ब्रिटेन ने मोलनुपिराविर के 4,80,000 कोर्स का आदेश दिया है। इस मामले में भी अमीर और गरीब देशों का विभाजन देखने को मिलेगा। फिलहाल अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान, थाईलैंड, वियतनाम, फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया आदि भी कतार में हैं। यह दवा फिलहाल उन्हें दी जाएगी जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है। अभी तक के परिणाम के अनुसार, मोलनुपिराविर लेने पर जोखिम 50 फीसदी कम हो जाता है। पिछले महीने आए इसके परिणामों के अनुसार इसे लेने वालों में से 50 फीसदी की अस्पताल में भर्ती होने की संभावना कम थी।


पूरी पड़ताल करें

दूसरी तरफ, संक्रमण रोगों की फ्रांसीसी विशेषज्ञ कैरीन लैकॉम्ब ने सितंबर में कहा था कि ऐसी घोषणाएं सोच-समझ कर स्वीकार करनी चाहिए। तभी की जानी चाहिए जब उससे जुड़ी स्टडीज की पड़ताल हो जाए। विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि मर्क और फायजर की घोषणाएं फर्जी नहीं हैं। इन दवाओं की अमेरिकी औषधि नियामक जांच कर रहे हैं। इन कंपनियों के शेयरों की कीमत आसमान में चढ़ गई है। अमेरिका में ही मोलनुपिराविर के 17 लाख कोर्सों के आदेश हो चुके हैं। इसके पांच दिन के कोर्स की कीमत 700 डॉलर, यानी करीब 50,000 रुपये है। फायजर ने अपनी दवा की कीमत अभी नहीं बताई है।

जटिल प्रक्रिया

औषधि खोजने की प्रक्रिया काफी जटिल और समय खाने वाली होती है। सामान्यतः नए कंपाउंड (यौगिक) की खोज में पांच साल तक लग जाता है। कोरोना के मामले में ज्यादातर देशों की नियामक एजेंसियों ने क्लिनिकल परीक्षणों की प्रक्रिया को जल्द से जल्द स्वीकृति दी थी। इस साल जून आते-आते दर्जनों दवाओं की पेशकश हो गई थी। इनमें तमाम दवाएं परीक्षणों के अंतिम दौर में हैं। मार्च, 2020 से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूरोपियन मेडिसन एजेंसी (ईएमए), अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) और चीन सरकार ने अकादमीशियनों और औषधि कंपनियों के समन्वय से इलाज खोजना शुरू कर दिया था।

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