क्या आप भारतीय नागरिक हैं? सरकार को भी नहीं पता!
भारतीय नागरिक कौन है? अगर आधार, पासपोर्ट, पैन (जो टैक्स देने वालों की पहचान के लिए होता है), ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं हैं, तो फिर क्या है?

भारत में नागरिकता के सबूत के तौर पर किसी एक दस्तावेज़ को ही नहीं माना जाता है। असम में एनआरसी के लिए 14 दस्तावेज़ों की सूची बनाई गई थी, जिन्हें नागरिक अपने भारतीय होने दावे के तौर पर पेश कर सकते थे। एसआईआर के लिए 12 दस्तावेज़ों की सूची थी। लेकिन आम लोगों पर शक करने वाली सरकार को लगता है कि इनमें से हर दस्तावेज़ जाली हो सकता है, इसलिए नागरिकता पक्की करने के लिए वह एक के बाद एक वेरिफिकेशन की प्रक्रिया जोड़ती जा रही है। अगर आप उलझन में हैं, तो घबराइए नहीं, क्योंकि सरकार भी उलझन में ही है।
देश में गैर-नागरिकों या बीजेपी की भाषा में कहें तो ‘घुसपैठियों’ की पहचान करने के लिए अपनाई गई असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (एनआरसी), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और एसआईआर (स्पेशल इलेक्टोरल रिविज़न) जैसी प्रक्रियाएं और सिस्टम होने के बावजूद, भारत में नागरिकता के सबूत के तौर पर कानूनी रूप से मान्य कोई एक भी दस्तावेज़ नहीं है। बायोमेट्रिक पहचान नंबर 'आधार' को पहचान या निवास का सबूत माना जाता है, न कि नागरिकता का। अदालती फैसलों में यह भी कहा गया है कि वोटर का फोटो पहचान पत्र (ईपिक) भी नागरिकता का सबूत नहीं है।
इन्हीं उलझनों के बीच अब विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि पासपोर्ट महज एक यात्रा दस्तावेज़ है, न कि नागरिकता का सबूत। इससे लोगों में उलझन और नाराज़गी और बढ़ गई है। वोटर लिस्ट में सुधार के दौरान भारतीय पासपोर्ट होना नागरिकता साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है, इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बुधवार, 24 जून 2026 को साफ़ किया कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज़ है, न कि नागरिकता का सबूत। इस जवाब ने सरकार द्वारा स्वीकार्य नागरिकता के सबूत को लेकर लोगों की चिंता और उलझन को और बढ़ा दिया है।
तो फिर भारतीय नागरिक कौन है? अगर आधार, पासपोर्ट, पैन (जो टैक्स देने वालों की पहचान के लिए होता है), ड्राइविंग लाइसेंस और वोटर कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं हैं, तो फिर क्या है?
इन दस्तावेज़ों को ‘सबूत’ के तौर पर न मानने की एक अनकही वजह यह है कि इनमें धोखाधड़ी या जाली दस्तावेज़ बनाने की गुंजाइश मानी जाती है। जाली पासपोर्ट और आधार कार्ड मिलना कोई नई बात नहीं है। लेकिन हमारे इस ‘नकली देश’ में तो हर सरकारी दस्तावेज़ पर शक किया जा सकता है और उनमें धोखाधड़ी हो सकती है (और शायद होती भी है)। पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के तौर पर न मानने की एक और वजह यह है कि ‘इंडियन पासपोर्ट्स एक्ट, 1967’ की धारा 20 के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह गैर-भारतीयों को विदेश यात्रा के लिए ‘पहचान प्रमाण-पत्र’ (आईंटिटी सर्टिफिकेट) जारी कर सके। तिब्बती शरणार्थी और बांग्लादेश से विस्थापित हुए लोग ऐसे ही कुछ लोग हैं जिन्होंने भारतीय ‘पासपोर्ट’ पर यात्रा की है।
जब 1955 में नागरिकता कानून लागू हुआ, तो उसकी धारा 3 में कहा गया था कि 1 जनवरी 1950 या उसके बाद भारत में पैदा होने वाला कोई भी व्यक्ति भारतीय नागरिक होगा। बाद में 1986 में हुए एक संशोधन के ज़रिए इस नियम में बदलाव किया गया और जन्म के आधार पर अपने-आप नागरिकता मिलने का अधिकार सिर्फ़ उन लोगों तक सीमित कर दिया गया, जिनका जन्म 1 जनवरी 1950 और 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में हुआ था। 1 जुलाई 1987 के बाद भारत में पैदा हुए लोगों को नागरिकता देने के लिए एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी गई कि उनके माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है।
2003 के संशोधन के बाद यह शर्त और कड़ी कर दी गई। इसके तहत, 3 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोग भारतीय नागरिकता के लिए तभी पात्र होंगे, जब उनके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो।
पूर्व राजनयिक और विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने गुरुवार को विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण का बचाव करते हुए उसे कानूनी और तकनीकी रूप से सही बताया।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, “कोई भी पासपोर्ट, पासपोर्ट एक्ट के तहत जारी किया जाता है, जबकि नागरिकता, नागरिकता एक्ट, 1955 के तहत तय होती है। एक कानून दस्तावेज़ को नियंत्रित करता है; दूसरा कानूनी स्थिति को... पासपोर्ट से नागरिकता नहीं मिलती। और न ही यह वह कानूनी दस्तावेज़ है जो नागरिकता को अंतिम रूप से तय करता है, अगर अदालत में इस स्थिति को चुनौती दी जाए। कई लोकतांत्रिक देशों की तरह, भारत भी नागरिकता कानून और पासपोर्ट कानून के बीच अंतर करता है। धोखाधड़ी, माता-पिता के बारे में विवाद या गैर-कानूनी तरीके से नागरिकता हासिल करने जैसे दुर्लभ मामलों में, नागरिकता को नागरिकता एक्ट के प्रावधानों और सहायक सबूतों के ज़रिए साबित करना पड़ सकता है।”
उन्होंने आगे कहा, “पासपोर्ट तभी जारी किया जाता है जब सरकार इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि आप भारतीय नागरिक हैं। इसलिए, आम ज़िंदगी और अंतरराष्ट्रीय यात्रा में यह नागरिकता का एक मज़बूत सबूत है। लेकिन नागरिकता से जुड़े किसी कानूनी विवाद में, नागरिकता कानून ही लागू होता है, और पासपोर्ट कोई ऐसा पक्का सबूत नहीं है जो बाकी सभी सबूतों से ऊपर हो।”
याद रहे कि सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) को लेकर मचे विवाद के बीच, केंद्र सरकार ने 2020 में एक प्रेस बयान जारी किया था (जिसकी रिपोर्ट 'लाइव लॉ' में आई थी)। इस बयान से यह और साफ़ हो गया कि सरकार खुद भी नागरिकता के सबूत के बारे में स्पष्ट नहीं है।
प्रेस रिलीज़ में कहा गया था, “जन्म की तारीख और जन्म स्थान से जुड़े कोई भी दस्तावेज़ जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है। हालांकि, ऐसे स्वीकार्य दस्तावेज़ों पर अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है। इसमें वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार, लाइसेंस, जीवन बीमा के कागज़ात, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र, ज़मीन या घर से जुड़े दस्तावेज़ या सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी किए गए ऐसे ही अन्य दस्तावेज़ शामिल हो सकते हैं। इस सूची में और भी दस्तावेज़ शामिल किए जा सकते हैं ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को बेवजह परेशानी न हो।” वैसे, यह मामला अभी सुलझा नहीं है।
एक और रुकावट यह है कि लाखों भारतीयों के पास जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज़ हैं ही नहीं।
एनआरसी/सीएए मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान, एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने सर्वे के आंकड़े पेश करते हुए बताया था कि बहुत कम भारतीयों के पास आधिकारिक पहचान दस्तावेज़ हैं: उन्होंने दावा किया कि लगभग 5 फीसदी लोगों के पास पासपोर्ट हैं, करीब 50 फीसदी के पास जन्म प्रमाण पत्र हैं और लगभग 60 फीसदी के पास स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र (स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट) है।
हालांकि, सरकार के अपने आंकड़े इससे ज़्यादा हैं। 2024 तक, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ लगभग 9.26 करोड़ भारतीयों के पास वैध पासपोर्ट हैं (जो आबादी का लगभग 6.5–7 प्रतिशत है), जबकि राष्ट्रीय स्तर पर जन्म पंजीकरण का दायरा 89 फीसदी से ज़्यादा हो गया है; हालांकि, सभी पंजीकृत जन्मों के लिए जन्म प्रमाण पत्र जारी नहीं किए जाते हैं।
इन सारी जानकारियों के बाद अगर आप अब भी उलझन में हैं, तो आप खुद को इस बात से तसल्ली दे सकते हैं कि सरकार भी उतनी ही उलझन में है, जितने आप हैं।
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