अनुच्छेद 370 : धीरे-धीरे कर दो महीने बीत गए, अब तक सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया कोई हस्तक्षेप

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के खिलाफ दायर करीब 12 अलग-अलग याचिकाओं पर अब 14 नवंबर को सुनवाई होगी। इसमें केंद्र और जम्मू एवं कश्मीर प्रशसान को अपना-अपना जवाब दाखिल करने के साथ ही फैसले से संबंधित सभी कागजात सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने होंगे।

फोटोः सोशल मीडिया
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आईएएनएस

मोदी सरकार द्वारा जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 को रद्द किए करीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब तक कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने के विरोध में कई लोगों ने इसकी वैधता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। मोदी सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता का मुद्दा अब न्यायमूर्ति एन वी रामना की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष है। मामले पर सुनवाई के लिए इस पीठ का गठन एक अक्टूबर को किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के खिलाफ दायर करीब 12 अलग-अलग याचिकाओं पर अब 14 नवंबर को सुनवाई होगी। इसके साथ ही केंद्र और जम्मू एवं कश्मीर सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दाखिल करनी होगी और राज्य से विशेष दर्जा हटाए जाने के फैसले से संबंधित सभी कागजात सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने होंगे।

हालंकि इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू एवं कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा बनाए रखने की याचिकाकर्ताओं के अनुरोध को ठुकरा दिया है। इससे जम्मू एवं कश्मीर को 31 अक्टूबर से दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के नए कानून का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि केंद्र द्वारा राज्य को विभाजित करने का फैसला बना रहेगा या नहीं, यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा। हालांकि, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, शीर्ष अदालत ने मामले में दलीलों की जांच करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है।

बता दें कि इस मामले पर सबसे पहली याचिका 6 अगस्त को दायर की गई थी। केंद्र सरकार द्वारा जम्मू एवं कश्मीर से 5 अगस्त को विशेष राज्य का दर्जा रद्द किए जाने के ठीक एक दिन बाद ही अधिवक्ता एम.एल. शर्मा ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।हालांकि उनकी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने दोषपूर्ण करार देते हुए ठुकरा दिया था।

इसके कुछ दिनों बाद ही नेशनल कान्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन ने भी स्वराज का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कहा कि एक संघीय ढांचे के अंतर्गत स्वायत्त शासित स्वशासन का अधिकार महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर की पूर्व रियासत द्वारा अनुच्छेद 370 को राज्य में शांति बहाल करने और लोकतांत्रिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर विचार करने के बाद लागू किया गया था, जो जम्मू एवं कश्मीर के भारत संघ के साथ संबंधों को परिभाषित और नियंत्रित करता है।

इसके बाद कई अन्य लोगों ने भी सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं। इनमें आईएएस अधिकारी से राजनेता बने शाह फैसल, सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कान्फ्रेंस, सीपीएम नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, कश्मीरी कलाकार इंदर सलीम उर्फ इंदरजी टिक्कू, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और ब्यूरोक्रेट्स सहित कई अन्य लोग शामिल हैं। इन सभी ने राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती दी है, जिसने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान अपनी ओर खींचा।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 28 सितंबर को न्यायमूर्ति एन वी रमना, न्यायमूर्ति एस के कौल, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत को लेकर पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया था, जो इस मामले पर सुनवाई करेगी। संविधान पीठ के अलावा अन्य कुछ याचिकाओं की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय पीठ भी गठित की गई है।

इन याचिकाओं में जम्मू एवं कश्मीर में लॉकडाउन और अन्य बंदिशों में राहत की मांग की गई है।हालांकि केंद्र सरकार और जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन का कहना है कि घाटी में लगे प्रतिबंधों को एक-एक कर हटाया जा रहा है, ताकि घाटी में हिंसा जैसी घटनाओं को टाला जा सके। न्यायमूर्ति एन वी रमना, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी की तीन सदस्यीय पीठ 16 अक्टूबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

इसके अलावा सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने भी अपनी पार्टी के नेता मोहम्मद युसुफ तारिगामी की नजरबंदी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं एक मलेशियाई एनआरआई व्यवसायी की पत्नी आसिफा मुबीन ने भी अपने पति की नजरबंदी को कोर्ट में चुनौती दी है। इसके अलावा कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। वहीं बाल अधिकार कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली ने घाटी में बच्चों की हिरासत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने प्रतिबंधों में ढील दिए जाने की याचिकाओं पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने एक हलफनामे में दावा किया कि घाटी में लागू प्रतिबंधों में ढील बरती गई है। राज्य प्रशासन का दावा है कि लैंडलाइन सेवा 100 प्रतिशत बहाल कर दी गई है, जबकि सीआरपीसी की धारा 144 को भी हटा लिया गया है।

लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी अदालत से कोई ठोस पहल सामने नहीं आने से याचिकाकर्ताओं में थोड़ी निराशा का भाव है। अभी आने वाले दिनों में भी कोर्ट की तरफ से कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है, क्योंकि फैसले को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर 14 नवंबर को सुनवाई होगी और इस बात की प्रबल संभावना है कि उसके बाद भी सुनवाई जारी रहेगी। ऐसे में इतना तय है कि जम्मू एवं कश्मीर को लोगों अभी आने वाले दिनों में भी कोर्ट से कोई राहत नहीं मिलने वाली है।

Published: 4 Oct 2019, 6:04 PM
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