अरुणाचल प्रदेश: सियांग घाटी में धधका बांध विरोधी आंदोलन
प्रस्तावित सियांग परियोजना के खिलाफ भड़के जन-आक्रोश और चीन सीमा के सामरिक पेंच

सियांग नदी के पूरे इलाके में तनाव चरम पर पहुंच चुका है। लंबे समय से सुलग रहा बांध-विरोधी आंदोलन अब ग्रामीण अंचलों की सीमाएं लांघकर अरुणाचल प्रदेश के प्रमुख शहरी केन्द्रों तक फैल गया है। इस पूरे हंगामे की जड़ में 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (सम्प) है।
अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में पूर्वी सियांग, ऊपरी सियांग और सियांग जिले सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पों, सरकारी संपत्तियों की तोड़फोड़-आगजनी और स्थानीय युवा नेताओं की बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियों से दहल उठे। हालात बिगड़ते देख प्रशासन ने निषेधाज्ञा (धारा 144) लगाई, इंटरनेट बंद किया और पासीघाट में कर्फ्यू का सख्ती से पालन कराने के लिए केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की 30 कंपनियां झोंक दीं।
इससे पहले 20 अक्टूबर को परियोजना की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट के लिए चल रहे सर्वेक्षणों के विरोध में करीब 700-800 युवा, छात्र और स्थानीय नागरिक पासीघाट में जुटे थे। उनकी मुख्य मांग थी कि अरुणाचल प्रदेश विधि-विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम (यूएपीए जैसा राज्य का कानून) के तहत हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए, सियांग पट्टी से केन्द्रीय सुरक्षा बलों को वापस बुलाया जाए और परियोजना से जुड़ी सभी गतिविधियों पर फौरन रोक लगे।
22 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों ने मिरेकल ग्राउंड में 24 घंटे का शांतिपूर्ण धरना शुरू किया। लेकिन 23 और 24 अक्टूबर को आदि बाने केबांग यूनाइटेड (आब्कू) और उससे जुड़े संगठनों द्वारा बुलाए गए 12 घंटे के बंद के दौरान स्थिति बेकाबू हो गई।
प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) तथा स्थानीय प्रशासनिक दफ्तरों में तोड़फोड़ की। भीड़ को खदेड़ने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। कई सरकारी और निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, जिससे पासीघाट की सड़कों पर चारों तरफ जली गाड़ियों का मलबा बिखर गया।
प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए आंदोलन के प्रमुख चेहरों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया, जिनमें कई युवा नेता और ‘सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम’ के प्रतिनिधि शामिल हैं। पुलिस हिरासत में कई कार्यकर्ताओं ने भूख हड़ताल शुरू कर दी है, जिसने स्थानीय लोगों के बीच इस आंदोलन के प्रति समर्थन और सहानुभूति की लहर को और तेज कर दिया है।
नई दिल्ली सम्प को केवल बिजली उत्पादन के साधन के रूप में नहीं, बल्कि एक अहम भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच के तौर पर देखती है। नदी के ऊपरी बहाव क्षेत्र में स्थित तिब्बत के मेडोग काउंटी में चीन ने कथित तौर पर यारलुंग त्सांगपो नदी (जो भारत में प्रवेश करने पर सियांग कहलाती है) पर 60 गीगावाट के एक महाविशाल बांध का निर्माण शुरू किया है। भारतीय सुरक्षा रणनीतिकारों की दलील है कि अगर सीमा पार से आक्रामक चीन अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ता है- या जानबूझकर पानी रोक लेता है- तो उस ‘वाटर बम’ से निपटने के लिए भारत को निचले हिस्से में एक बड़े जलाशय की सख्त जरूरत है।
पासीघाट पश्चिम से विधायक निनॉन्ग एरिंग ने कहा, ‘यह राष्ट्रीय हित से जुड़ी परियोजना है। अगर चीन ने अचानक पानी छोड़ दिया और अपने ऊपरी ढांचे को वाटर बम की तरह इस्तेमाल किया, तो क्या होगा? हमें खुद को सुरक्षित रखने के लिए व्यवस्था चाहिए, और यही वजह है कि केन्द्र सरकार इस परियोजना को पूरा करने के लिए इतनी गंभीर है।’
अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का दावा है कि जनता के बीच फैली यह चिंता कुछ ‘खास स्वार्थी समूहों’ द्वारा फैलाई गई ‘गलत सूचनाओं और भ्रांतियों’ का नतीजा है। खांडू ने स्थानीय निवासियों से अपील की है कि वे प्रारंभिक सर्वेक्षण होने दें ताकि परियोजना का एक पारदर्शी और विश्वसनीय डेटा सबके सामने रखा जा सके।
दूसरी ओर, पीढ़ियों से सियांग घाटी में बसने वाले मूल निवासी आदि और गालो समुदायों के लिए यह बांध उनके अस्तित्व पर सीधा वार है। यदि यह प्रस्तावित ढांचा बनता है, तो इसके विशाल जलाशय में 27 गांव जलमग्न हो जाएंगे, करीब 1.5 लाख स्थानीय आदिवासी बेघर हो जाएंगे और यिंगकियोंग तथा गेकू जैसे ऐतिहासिक कस्बे व उपजाऊ कृषि भूमि डूब जाएगी।
गेकू गांव के निवासी और एसआईएफएफ के प्रतिनिधि ताजोम एजिंग का कहना है, ‘हम अपनी ही पुश्तैनी जमीन पर शरणार्थी बन जाएंगे। सर्वेक्षण पूरा भी हो जाए, तब भी किसी कीमत पर इस बांध का निर्माण नहीं होने देंगे। राज्य सरकार को सैन्य बल उतारने के बजाय सीधे प्रभावितों से बात करनी चाहिए।’
स्थानीय लोगों का कहना है कि सियांग नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि उनकी पहचान, लोककथाओं और पारंपरिक किसानी विरासत की आत्मा है। विस्थापन के अलावा, भूवैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने पूर्वी हिमालय के अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र होने के संदर्भ में चेताया है। उनका कहना है कि इतने भारी जलभंडार वाला जलाशय बनाने से बड़े भूकंप का खतरा बढ़ जाएगा और निचले हिस्से में स्थित असम के पर्यावरण और जनजीवन पर भी विनाशकारी असर पड़ेगा।
यह आलेख लिखे जाने तक गतिरोध जस-का-तस बना हुआ था और पूरी सियांग पट्टी में हालात बेहद नाजुक थे। पूर्वी और ऊपरी सियांग के जिलाधिकारियों ने संकेत दिया है कि अगर कानून-व्यवस्था बनी रहे, तो वे गांव के बुजुर्गों और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच बातचीत कराने को तैयार हैं। लेकिन आदिवासी नेताओं का दो-टूक कहना है कि जब तक केन्द्रीय अर्धसैनिक बल गांवों में रहेंगे और उनके कार्यकर्ता जेलों में रहेंगे, तब तक किसी तरह की बातचीत मुमकिन नहीं। अरुणाचल प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व का एक तबका इस पूरे गतिरोध के लिए राज्य सरकार की अदूरदर्शिता को जिम्मेदार ठहराता है।
एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ‘नेशनल हेरल्ड’ को बताया, ‘बांध-विरोधी कार्यकर्ता पूरी लगन और निष्ठा के साथ अपना अभियान चला रहे हैं। नतीजतन, वे ग्रामीणों को समझाने में पूरी तरह कामयाब रहे कि इस परियोजना से उनके आशियाने, आजीविका और भविष्य पर क्या विनाशकारी असर पड़ेगा।’
उनका मानना है कि परियोजना को जबरन आगे बढ़ाने का सरकार का अति-उत्साह उलटा पड़ गया है। उन्होंने कहा, ‘हम अभी सिर्फ प्रारंभिक सर्वेक्षण के दौर में हैं, लेकिन सरकार का बर्ताव ऐसा रहा, मानो परियोजना पूरी तरह तय हो चुकी है। यह केवल शुरुआती अध्ययन है। जब तक यह पूरा नहीं होता, तब तक कोई नहीं कह सकता कि परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा या इसे हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा।’
आंदोलन को पुलिसिया ताकत से कुचलने के बजाय राज्य सरकार को इस गतिरोध को खत्म करने का कोई व्यावहारिक रास्ता निकालना होगा। इसके लिए जरूरी है कि वह स्थानीय प्रतिनिधियों की आवाज सुने, ग्राम सभाओं को विश्वास में ले और पासीघाट की सड़कों पर उतरे आक्रोशित युवाओं से खुले मन से बात करे।
भारत जब अपनी पूर्वी सीमाओं को अभेद्य बनाने और ऊपरी बहाव वाले अपने प्रतिद्वंद्वी चीन से जल अधिकारों को सुरक्षित करने की जद्दोजहद में जुटा है, तब सियांग घाटी का यह सुलगता प्रतिरोध साफ बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के रणनीतिक हितों, आदिवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकारों और नाजुक पर्यावरण के बीच संतुलन साधना कितना पेचीदा इम्तिहान है।
