बिहार में खाना बंटने की खबर पर उमड़ती भीड़ खोल रही सरकारी ‘राहत’ की पोल, ‘राशन’ के नाम पर भय का माहौल

हजारों नहीं तो सैंकड़ों लोग अकेले पटना की सड़कों पर खाना बांटने वालों की आस में यहां-वहां बैठे रहते हैं। पूरे बिहार में कितने होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यही वजह है कि जिस शहर के जिस रास्ते पर किसी खाना बांटने वाले की खबर फैलती है, भीड़ उमड़ पड़ती है।

फोटोः शिशिर
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शिशिर

हृदयेश झा पहले मधुबनी के अंधराठाड़ी में चाय की दुकान चलाते थे। वहां गुजारा नहीं हो सका तो पटना चले आए। चार साल से यहीं हैं। जनता कर्फ्यू की शाम दुकान के पास वाले चबूतरे पर बैठ केतली पर चम्मच भी पीटा। उसके बाद लॉकडाउन ऐसा हुआ कि कोरोना भूल पेट की चिंता में गले जा रहे हैं। क्या खाऊं, क्या पिऊं... वाली हालत में हैं।

हृदयेश कहते हैं, “फॉरवर्ड होने की वजह से सरकारी राशन पर हमारा हक तो है नहीं। सरकारी राहत वाले भी ‘झा जी’ सुनकर झांकने नहीं आ रहे। कोरोना छोड़ भी दे, भूख नहीं छोड़ेगी। बस, परिवार की चिंता है। बाल-बच्चे घर पर ही हैं। कैसे होंगे, यह जानने के लिए मोबाइल रीचार्ज कराने तक का पैसा नहीं है।”

हृदयेश खाना बांटने निकले लोगों की आस में सुबह-शाम अपनी दुकान वाली जगह पर डरे-सहमे बैठे रहते हैं। डर इसलिए कि कहीं पुलिस पीट नहीं दे या कोई बीमार न कर जाए। लेकिन पेट की मजबूरी है। हजारों नहीं, लेकिन सैंकड़ों लोग पटना की सड़कों पर कहीं-न-कहीं इसी तरह टिके हैं। पूरे बिहार में कितने होंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यही कारण है कि जिस शहर के जिस रास्ते पर किसी खाना बांटने वाले की जानकारी फैलती है, लोग उमड़ पड़ते हैं।

बिहार सरकार अप्रैल के तीसरे हफ्ते तक 1.02 करोड़ राशन कार्डधारकों को हजार-हजार रुपये सहायता पहुंचाने का दावा कर रही है। हालांकि, उसके पास भी 36 लाख रद्द-लंबित आवेदकों के बारे में कुछ ठोस कहने लायक नहीं हैं। इस सूची के बाहर वालों के लिए तो दावा की जगह वादा ही है। वादा भी यही कि राज्य में जीविका समूहों ने बिना राशन कार्ड के जिन 9.70 लाख परिवारों की पहचान की है, उन वंचितों को भी हजार-हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी, लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद राशन कार्ड बनवाकर।

और इसमें भी आर्थिक रूप से पिछड़े उच्च जाति के लोग हैं या नहीं, इस बारे में सरकार कुछ कहने को तैयार नहीं है। यानी, यह सब भगवान भरोसे हैं। वैसे, भगवान भरोसे वह भी होने वाले हैं जिन्हें अब तक सरकार राशन मुहैया कराने की बात कह रही है।

राज्य के जन वितरण प्रणाली दुकानदारों ने मई-जून माह में केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का अनाज उठाने से इनकार कर दिया है। फेयर प्राइस डीलर्स एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष वरुण कुमार सिंह इसके पीछे कमीशन नहीं तय करने को वजह बताते हैं। उनके मुताबिक, “कोरोना वायरस के खतरे के बावजूद दुकानदार कार्डधारकों को मुफ्त अनाज का वितरण कर रहे हैं, जबकि इसके एवज में कमीशन तक तय नहीं किया गया है। दुकानदार फिर भी यह काम कर रहे थे, लेकिन पिछले दिनों बिना जांच बहुत सारी दुकानों का लाइसेंस निलंबित करने के कारण एसोसिएशन विरोध के लिए मजबूर हुआ है। अप्रैल के बाद कोई भी दुकानदार अनाज का उठाव या वितरण नहीं करेगा।”

20 अप्रैल को जब एक तरफ एसोसिएशन यह धमकी दे रहा था, दूसरी तरफ बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के सचिव अनुपम कुमार का बयान आया कि गरीबों के अनाज में गड़बड़ी करने वालों पर सख्ती बरती जाएगी। दोनों ओर से तनातनी की स्थिति में सरकार पर ही यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर उसे आपदा की स्थिति के पहले कभी यह जानकारी क्यों नहीं मिली कि अनाज वितरण में बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है। लॉकडाउन के बीच खाने पर आफत हुई तो 144 दुकानदारों पर मुकदमा दर्ज किया गया, जबकि सरकार के संज्ञान में 267 मामले आए। 127 मामलों में जन वितरण प्रणाली की दुकानों का लाइसेंस निलंबित और 36 का रद्द किया गया है।

बिहार में अनाज की कालाबाजारी नई नहीं है और हर जिले की सामान्य रूप से यही शिकायत है कि 90 फीसदी वितरक सहज रूप से सभी कार्डधारकों को अनाज नहीं देते हैं। लेकिन आपदा के समय लाइसेंस निलंबन और रद्द करने की प्रक्रिया से जरूरतमंद लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और इस पर गुस्सा भी भड़क रहा है। कई जिलों में निलंबित और रद्द दुकानों से अनाज उठाकर दूसरी जगह ले जाने की सूचना पर बवाल भी हो चुका है।

भय-भूख की खबरें यहां और भी हैं

बीजेपी का सूत्र वाक्य यह भी रहा हैः भय, भूख, भ्रष्टाचार से मुक्ति! लेकिन, बीजेपी-जेडीयू की बिहार सरकार में राशन योजना में भ्रष्टाचार के साथ राशन के नाम पर भय-भूख की भी खबरें लगातार आ रही हैं। 15 अप्रैल को वैशाली जिले के महुआ में कटहरा सहायक थाना क्षेत्र के रसूलपुर गांव में केला काटने पर बच्चे की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। नालंदा जिले के इस्लामपुर में विक्षिप्त मां को खाना खिलाने के लिए एक नाबालिग चोरी करता हुआ पकड़ा गया।

भूख से तड़प रही विधवा मां के लिए खाना जुटाने की कोशिश में पकड़े गए इस नाबालिग को जब कोर्ट में पेश किया गया तो उसकी व्यथा सुन जज ने उसे छोड़ने का आदेश दिया और उसके घर अनाज के साथ कपड़े भेजने का भी निर्देश दिया। भूख से मरने के भय में बिहार के हर जिले में कुछ-न-कुछ हो रहा है। भूखे लोग मर भी रहे हैं। यह अलग बात है कि सरकार किसी के भूख से मरने की पुष्टि नहीं कर रही है।

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