इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव पर लगाई पाबंदी, आखिर क्यों स्वतंत्र छात्र राजनीति से डरती है बीजेपी !

मोदी सरकार को पहले कार्यकाल में कई विश्वविद्यालयों से बड़ा वैचारिक विरोध मिला था। दोबारा सत्ता में आने पर बीजेपी ने तय किया है कि वैचारिक विरोध की नर्सरी को ही समाप्त कर देना बेहतर होगा। यह प्रयोग सफल हुआ तो दूसरे विश्वविद्यालयों पर भी इसे लागू किया जाएगा।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

गोथिक शैली में बने शानदार भवन, बड़े लॉन, महान साहित्यकारों से लेकर बड़े आलोचक और हजारों की तादाद में प्रशासनिक अधिकारी पैदा करने वाले 132 साल पुराने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जुबान पर ताला लगा दिया गया है। पिछले 29 जून को हुई एक्जीक्यूटिव कॉउंसिल की बैठक में यह प्रस्ताव पास कर दिया गया कि अब ‘पूरब के ऑक्सफोर्ड’ के नाम से मशहूर इस विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव नहीं होंगे।

कहने को तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह फैसला विश्वविद्यालय में बढ़ती गुंडागर्दी को रोकने, छात्र राजनीति को अनुशासित करने और पठन-पाठन के पक्ष में महौल बनाने को ध्यान में रखकर लिया है, लेकिन जानकार बताते हैं कि इसके पीछे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी के पैतृक संगठन- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की सोची-समझी साजिश है।

मुद्दे की समझ रखने वाले छात्र नेता और विश्वविद्यालय से जुड़े प्राध्यापक मानते हैं कि इस फैसले के पीछे का बड़ा कारण तमाम कोशिशों के बाद भी छात्र संघ पर कब्जा करने में विद्यार्थी परिषद की नाकामी है। दूसरे शब्दों में कहें तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा बीजेपी और संघ की राजनीति को रिजेक्ट करने का परिणाम यह हुआ कि सरकार के इशारे पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले दरवाजे से छात्र संघ का गला घोंटने का ही फैसला कर लिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता विष्णु प्रभाकर के मुताबिक, हालांकि छात्रसंघ का गला घोटने की तैयारियां पहले से चल रही थीं लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को काले झंडे दिखाने के बाद यह लगभग तय हो गया था कि देर-सबेर छात्रसंघ को समाप्त कर दिया जाएगा।

कारण पूछे जाने पर प्रभाकर बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में विश्वविद्यालय का परिसर बीजेपी-विरोधी राजनीति के केंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है। देखा जाए तो दिल्ली में जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय ही था जिसके छात्रों ने पिछले कुछ सालों में मोदी सरकार की नीतियों और संघ की राजनीति के विरोध में कड़ा प्रतिवाद किया है।

प्रभाकर के मुताबिक, विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ को खत्म करने का फैसला जल्दबाजी में और चोरी-छिपे उस वक्त किया जब गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं और ज्यादातर छात्र छुट्टियों में घर गए हुए हैं। मौके का फायदा उठाते हुए पुलिस की मदद से विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल खाली करा दिया, हालांकि इसका विरोध भी हो रहा है। छात्र नेता मानते हैं कि आज इस फैसले को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लागू किया जा रहा है, कल इसे दूसरी जगहों पर भी लागू किया जाएगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष और देश भर में मोदी विरोध का चेहरा बन चुकी ऋचा सिंह का कहना है कि दरअसल यह कदम बीजेपी सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच सांठ-गांठ के बाद उठाया गया है। ऋचा का कहना है, “इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसने देश की राजनीति में न सिर्फ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जैसे नेता दिए बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल, मंडल-कमंडल जैसे कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को भी दिशा दी है। यह राजनीति की नर्सरी को खत्म करने का प्रयास है।”

ऋचा सिंह ने आगे कहा, “छात्रसंघ चुनावों के लिए न्यायपालिका ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का उल्लेख किया हुआ है। अगर इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन लिंगदोह को लागू नहीं करा पता है तो उसकी अपनी नाकामी का उदाहरण है। रही अराजकता की बात, तो विश्वविद्यालय प्रशासन स्वयं अराजक तत्वों को संरक्षण और अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए संरक्षण देकर चुनाव लड़ने की अनुमति देता है। वह लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के आधार पर अराजक तत्वों को रोक भी सकता है।”

प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने के बाद इसे मोदी सरकार द्वारा छात्र-राजनीति पर सबसे बड़ा हमला बताते हुए ऋचा कहती हैं कि विश्वविद्यालय के कुलपति रत्न लाल हंगलू ने ये फैसला उनके खिलाफ लगे आरोपों से ध्यान हटाने के लिए लिया है।

एक दूसरे छात्र नेता ने नवजीवन से बातचीत में दावा किया कि बीजेपी सरकार के आगे सिर झुकाकर कुलपति हंगलू ने अपने लिए दरअसल मोहलत हासिल की है। यह देखना दिलचस्प है कि जहां वामपंथी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठन इस मुद्दे पर जोर-शोर से विश्वविद्यालय के फैसले का विरोध कर रहे हैं, वहीं संघ से जुड़े छात्र संघठन एबीवीपी ने पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है।

पूरे मामले में विद्यार्थी परिषद की भूमिका पर सवाल उठाते हुए ऋचा सिंह पूछती हैं कि “उस वक्त जब 97 सालों का इतिहास समेटने वाले विश्वविद्यालय के छात्रसंघ को बंद किया जा रहा है, अपने आप को विश्व के सबसे बड़े और पुराने छात्र संगठन कहने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग कहां हैं? चरण वंदना से फुर्सत मिल गई हो तो कुछ जिम्मेदारी का वहन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रति भी करें। केंद्र से लेकर राज्य में उनकी सरकार है। ऐसे में, आखिर इस दमन के खिलाफ वे कब आवाज उठाएंगे?”

विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि छात्रसंघ पर प्रतिबंध का फैसला न सिर्फ राजनीति की नर्सरी को रौंदना है बल्कि लोगों के संवैधानिक मूल्यों का हनन भी है। इस प्रोफेसर के मुताबिक भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत इस देश के नागरिकों को संगठन बनाने का अधिकार दिया गया है। इसीलिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जो फैसला किया है, वह संविधान का भी सरासर उल्लंघन है।

जानकार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान कई विश्वविद्यालयों ने उसे तगड़ी चुनौती दी थी। मोदी सरकार को सबसे बड़ा वैचारिक विरोध विश्वविद्यालयों में झेलना पड़ा था। इसलिए दोबारा सरकार बनाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तय किया है कि वैचारिक विरोध की नर्सरी को ही समाप्त कर देना बेहतर होगा। माना जा रहा है किअगर यह प्रयोग कामयाब हुआ तो बीजेपी विरोधी राजनीति के केंद्र बन चुके दूसरे विश्वविद्यालयों पर भी इसे लागू किया जाएगा।

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