बंगाल: बकरीद पर पशु वध के नियमों से हिंदू व्यापारियों पर आर्थिक संकट, विपक्ष ने दी हाईकोर्ट में चुनौती
बकरीद के मौके पर बंगाल सरकार ने एक पुराने कानून को सख्ती से लागू करने का ऐलान कर हिंदू पशु विक्रेताओं के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। वहीं मुसलमानों ने कुर्बानी के लिए गायें न खरीदने का फैसला किया है। विपक्ष ने इस मामले में हाईकोर्ट का रुख किया है।

बकरीद से पहले पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार द्वारा जारी पशु वध से जुड़े नए दिशानिर्देशों को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं में तृणमूल नेता महुआ मोइत्रा और अखरुज़्ज़मान शामिल हैं। इन याचिकाओं पर हालांकि बुधवार को सुनवाई निर्धारित थी, लेकिन राज्य सरकार द्वारा स्थगन का अनुरोध किए जाने के बाद इसे टाल दिया गया। मामले की सुनवाई अब गुरुवार को होने की संभावना है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की पश्चिम बंगाल इकाई ने भी कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया है। सीपीआई -एमएल लिबरेशन ने बीजेपी सरकार द्वारा 'पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950' को लागू करने के खिलाफ तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है। लेफ्ट पार्टी ने आरोप लगाया है कि सरकार इस अधिनियम का इस्तेमाल करके धार्मिक अनुष्ठानों में पशुओं की बलि पर प्रतिबंध लगाना चाहती है।
इस मामले में अदालत के बाहर संवाददाताओं से बातचीत में तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि सरकार के इस कदम से गरीब परिवारों को भारी आर्थिक नुकसान होगा। उन्होंने कहा, "इससे केवल मुस्लिम समुदाय ही प्रभावित नहीं होगा; बल्कि हिंदू व्यापारी भी ईद-उल-अज़हा (बकरीद) के दौरान मवेशी बेचकर अपनी आजीविका कमाते हैं।"
महुआ ने इस कानून की धारा 12 का हवाला देते हुए ने कहा, “इसके लिए कानूनी मंज़ूरी मौजूद है। हमने सिर्फ़ इस साल के लिए और विशेष रूप से त्योहार के दौरान, गायों को छोड़कर भैंसों या बैलों के वध की अनुमति देने का अनुरोध किया है।”
पश्चिम बंगाल में मवेशियों के कटान से जुड़े पुराने कानूनों को हाल ही में सख्ती से लागू किए जाने के कारण, ईद-उल-अज़हा से पहले किसानों, व्यापारियों और धार्मिक समुदायों के बीच भारी चिंता और बेचैनी है। कई लोगों का दावा है कि हिंदू विक्रेताओं और मुस्लिम खरीदारों के बीच चला आ रहा एक पुराना आर्थिक ताना-बाना अब गंभीर खतरे में आ गया है।
हालांकि पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 का है, लेकिन व्यापारियों का कहना है कि पिछली सरकारों ने इन नियमों को शायद ही कभी सख्ती से लागू किया। दशकों तक, पूरे राज्य में पशुओं का व्यापार खुलेआम चलता रहा, खासकर ईद-उल-अज़हा के दौरान, जब मुस्लिम परिवार पारंपरिक रूप से 'क़ुर्बानी' के लिए पशु खरीदते हैं।
कई हिंदू पशु व्यापारी, खासकर गोआला या गोपा समुदाय के लोग, पशुपालन को अपना मुख्य पेशा मानते हैं। ये परिवार छोटी-छोटी डेयरियां चलाते हैं, दूध और पनीर बेचते हैं, और त्योहारों के मौसम में बूढ़े या दूध न देने वाले पशुओं को भी बेचते हैं। व्यापारियों का कहना है कि ईद के बाज़ार की तैयारी के लिए वे अक्सर पशु और चारा खरीदने के लिए बैंक से कर्ज़ लेते हैं।
सरकार के नए निर्देशों पर एक हिंदू व्यापारी, प्रकाश राय ने कहा, “बीजेपी हमें अपनी गायें मुसलमानों को बेचने की इजाज़त क्यों नहीं दे रही है? मुसलमान हमें कभी नुकसान नहीं पहुंचाते। चुनावों से पहले उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही थी। बीजेपी हमें उनके साथ व्यापार करने से क्यों रोक रही है? तो फिर हमें ज़हर ही दे दो।”
गोआला समुदाय की एक और व्यापारी दीपा घोष का कहना था: “हम बैंकों का कर्ज़ कैसे चुकाएंगे? अब हम इन जानवरों का क्या करेंगे? हमारे पास इन्हें रखने के लिए कोई शेड तक नहीं है।”
इस मुद्दे पर विशेषज्ञों और समुदाय के नेताओं का कहना है कि हिंदू पशु विक्रेताओं और मुस्लिम अनुसार खरीदारों के बीच का रिश्ता धार्मिक बंटवारे के बजाय आर्थिक आधार पर बनता है। ईद के दौरान मुस्लिम आमतौर पर खरीदार के रूप में सामने आते हैं, क्योंकि इस्लामी परंपरा के कुर्बानी के लिए स्वस्थ पशुओं की आवश्यकता होती है। इससे साल में एक बार पशुओं की एक बड़ी, लेकिन मौसमी मांग पैदा होती है।
इसके अलावा बहुत सारे हिंदू टैनरीज (चमड़े की फैक्ट्रियों), परिवहन सेवाओं, मीट प्रोसेसिंग प्लांट्स (मांस प्रसंस्करण संयंत्रों) और पशु बाजारों में भी काम करते हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि नियमों की सख़्ती से पशु पालन और बूचड़खानों के बंद होने से कामगार परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। खासतौर से दलितों और निचली जातियों के हिंदुओं को काफी दिक्कतों से दोचार होना पड़ रहा है, क्योंकि इन समुदायों के बहुत से लोग पशु-संबंधी उद्योगों पर निर्भर हैं।
पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित बीजेपी सरकार के 13 और 14 मई के आस-पास जारी नोटिसों के बाद हालात एकदम बदल गे हैं। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे 1950 के मौजूदा कानून और 2018 के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को लागू कर रहे हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि उचित प्रमाणन के बिना गाय और भैंस का वध करना गैर-कानूनी बना रहेगा और इसके लिए जुर्माना या कारावास की सज़ा दी जा सकती है।
इस बीच पुलिस अधिकारियों का भी कहना है कि प्रवर्तन एजेंसियों को मवेशियों के अवैध परिवहन और अनाधिकृत वध के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों ने यह बताया कि आधिकारिक कानून के अनुसार, मवेशियों के लिए नगर निगम के अधिकारियों और पशु चिकित्सकों से 'फिटनेस प्रमाण पत्र' की आवश्यकता होती है, न कि 'जन्म प्रमाण पत्र' की।
कोलकाता के बाहरी इलाके में एक क्लिनिक चलाने वाले पशु चिकित्सक डॉ. सुबीर दास का कहना है कि, “मैंने अपने करियर के दौरान सैकड़ों गायों का इलाज किया है। बहुत कम पशुओं को उनके मालिक 10 साल से ज़्यादा समय तक अपने पास रखते हैं। ज़्यादातर किसान आमतौर पर अपनी गायों को चार या पांच बार बच्चे देने के बाद और दूध का उत्पादन कम होने पर बेच देते हैं। ज़्यादातर मामलों में, पशु चिकित्सक जानवर की सेहत की जांच करते हैं और मालिक द्वारा बताई गई उम्र पर ही भरोसा करते हैं।”
दरअसल पशुओं की उम्र आदि को लेकर विवाद उस समय बढञा जब कथित तौर पर बीजेपी विधायक रेखा पात्रा ने हिंगलगंज में मवेशी ले जा रहे एक वाहन को रोककर, यह साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र की मांग की कि गायें 14 वर्ष से अधिक उम्र की हैं। उन्होंने कहा, "यदि कोई भी व्यक्ति अवैध रूप से गायों को ले जाते हुए पाया जाता है, तो हमें उसे पकड़ना चाहिए और उससे गायों के जन्म प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कहना चाहिए।"
इस मामले पर टिप्पणीकार मज़ाक उड़ाते हुए तर्क दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में मवेशियों के जन्म प्रमाण पत्र की कोई भी कारगर व्यवस्था मौजूद नहीं है। विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाया कि आम किसान ऐसे दस्तावेज़ कैसे पेश कर सकते हैं, जो पहले कभी जारी ही नहीं किए गए थे।
उधर किसानों और व्यापारियों का कहना है कि पशुधन से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ हासिल करने की प्रक्रिया बेहद मुश्किल है। रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था ज़्यादातर कागज़ों तक ही सीमित है, और इसके लिए ऑनलाइन आवेदन, पशु-चिकित्सा प्रमाण पत्र, पहचान पत्र, निरीक्षण और शुल्क की ज़रूरत पड़ती है। ग्रामीण इलाकों के कई किसानों के पास न तो इंटरनेट की सुविधा है, न ही डिजिटल साक्षरता और न ही नियमित पशु-चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हैं।
खबरों के मुताबिक, इस अचानक लागू हुई सख्ती से मुस्लिम खरीदार डर गए हैं, जिन्हें अब कानूनी पचड़ों, जांच-पड़ताल या उत्पीड़न का डर सता रहा है। कुछ बाजारों में, नियमों को लेकर बनी अनिश्चितता के चलते मुसलमानों ने कथित तौर पर हिंदू व्यापारियों से मवेशी खरीदने से इनकार कर दिया है।
मुस्लिम नेताओं ने ईद के दौरान शांति बनाए रखने और कानूनों का पालन करने की अपील की है। मौलाना शफीक कासमी और मौलाना शब्बीर मिस्बाही सहित अन्य धार्मिक विद्वानों ने नमाज़ियों से आग्रह किया कि वे सरकारी नियमों का पालन करें और, जहां ज़रूरी हो, कुर्बानी के लिए गाय के बजाय बकरियों या भेड़ों का इस्तेमाल करें।
इस बीच, बीजेपी मंत्री दिलीप घोष ने इस कार्रवाई को सही बताते हुए कहा कि इसका मकसद किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि अवैध कटाई और मवेशियों की तस्करी को रोकना था।
व्यापारियों का कहना है कि हालिया पाबंदियों ने उस व्यवस्था को बिगाड़ दिया है, जो पिछली कम्युनिस्ट और तृणमूल कांग्रेस सरकारों के समय से पीढ़ियों से चली आ रही थी। ग्रामीण बंगाल के कई परिवारों के लिए यह मुद्दा सिर्फ़ राजनीतिक या धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक है। मवेशियों के न बिकने, उनके रखरखाव का खर्च बढ़ने और बैंक के कर्ज़ न चुका पाने की वजह से, हिंदू विक्रेता और मुस्लिम खरीदार—दोनों का ही कहना है कि इस व्यापार को लेकर बनी अनिश्चितता ने साल के सबसे अहम त्योहारों के मौसम से ठीक पहले उनकी आजीविका को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
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