बिहार: जो दिखता है, हमेशा सब कुछ वैसा ही नहीं होता!

बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे नए नैरेटिव का शिकार है जिसके केंद्र में सिर्फ, और सिर्फ नीतीश कुमार हैं या फिर आरजेडी से उनकी ‘न टूटती दिखने’ वाली नजदीकियां! यह सब अचानक नहीं हुआ। और भी क्या सियासी हलचल है, बिहार में, पढ़िए इस सप्ताह की बिहार डायरी

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नागेन्द्र

नीतीश, जद (यू) और मीडिया का इंडिया  

क्या बिहार की राजनीति में सबकुछ वैसा ही है जैसा दिख रहा या दिखाया जा रहा? क्या कारण है कि “जेडीयू के अंदर की गड़बड़ियों” और “नीतीश कुमार की बीमारी” से जितना जेडीयू और नीतीश परेशान नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा परेशानी बीजेपी के अंदर और मीडिया के एक बड़े धड़े में दिखाई दे रही है! 

वो कहते हैं न, “काजी दुबले क्यों, शहर के अंदेशे में...” तो कुछ यही हाल इन दिनों बिहार में बीजेपी का है। जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के इस्तीफे से जितनी चिंता जेडीयू-आरजेडी या लालू यादव-नीतीश कुमार की जोड़ी को प्रत्यक्ष तौर पर नहीं दिखती, उससे कहीं ज्यादा चिंता गिरिराज सिंह और शाहनवाज हुसैन तक पहुंच गई है। दोनों इस मामले में खुलकर और नीतीश को उकसाने वाली बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन नामालूम कारणों से छोटे मोदी (सुशील कुमार मोदी) चुप्पी साधे हैं।

दरअसल, बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे नए नैरेटिव का शिकार है जिसके केंद्र में सिर्फ, और सिर्फ नीतीश कुमार हैं या फिर आरजेडी से उनकी ‘न टूटती दिखने’ वाली नजदीकियां!  

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यह सब अचानक नहीं हुआ। शुरुआत तो उनके आरजेडी से गठजोड़ के साथ ही हो गई थी और फिर से पलटी मारने, तेजस्वी के साथ पटरी न खाने, फिर से एनडीए में जाने की चर्चाएं चलती ही रहीं। कभी राजभवन में सुशील मोदी से मुलाकात, तो कभी पुराने साथी, ‘अपने’ ही राज्यसभा सांसद और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से पटना में उनका मिलना इसे हवा देते रहे। हालांकि नीतीश हर बार अफवाहों पर मिट्टी डालते रहे।

हाल के दिनों की कुछ घटनाओं के बाद उनकी बीमारी पर चर्चाएं शुरू हुईं तो इसमें भी मीडिया तो ज्यादा आगे नहीं बढ़ा लेकिन बीजेपी अपने तरीके और स्थानीय सहयोगियों के जरिये इसे भी उछालने में पीछे नहीं रही। इस सब के बीच यह भी हुआ कि बीजेपी शीर्ष नेतृत्व ने हाल के दिनों में नीतीश को लेकर कोई सीधी या आक्रामक टिप्पणी नहीं की और ललन इस्तीफा एपिसोड के बाद जब केसी त्यागी ने ‘राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता’ जैसी बात कही तो लोगों को ‘रिश्ते’ नए सिरे से व्याख्यायित करने का मौका दे दिया। आश्चर्यजनक तो पूरे प्रकरण पर जेडीयू से लेकर बिहार आरजेडी तक में पसरी खामोशी भी रही। 


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हालांकि बीते दिनों के पूरे प्रकरण को वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार एक तरह का छद्म युद्ध कहते हैं, ‘जिसमें किसी के बारे में इस हद तक प्रचार कर दिया जाए कि वह वैसा न होते हुए भी वैसा दिखने लगे जैसा ‘उसके दुश्मन’ चाहते  हैं (और मौजूदा बीजेपी इसमें माहिर है)।’ हेमंत नीतीश की सेहत को लेकर कोई सर्टिफिकेट नहीं देते लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि हाल के दिनों में उनको लेकर गढ़े गए सारे किस्से-कहानियां बीजेपी खेमे द्वारा छेड़े गए एक मनोवैज्ञानिक युद्ध के अलावा कुछ नहीं हैं। 

इस बीच दिल्ली घटनाक्रम के ठीक बाद तेजस्वी यादव की आस्ट्रेलिया की तयशुदा यात्रा अचानक रद्द होने, लालू प्रसाद यादव की ओर से उम्मीद के विपरीत कोई सीधा बयान न आने और साल के अंतिम दिन बिहार विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी की लालू यादव से उनके घर पर मुलाकात से कुछ नई चर्चाओं को जन्म मिलना ही था। सुनने में आ रहा है कि खरमास का ‘शुभ-अशुभ’ बीतते ही इस 14 जनवरी और फिर 22 जनवरी को, जिस दिन बीजेपी अपने ‘अयोध्या कांड’ से देश-दुनिया की सुर्खियां बटोरने की तैयारी में है, बिहार से किसी ऐसे नए धमाके की गूंज सुनाई दे जाए जो शायद पूरे ‘अयोध्या कांड’ पर ही भारी पड़े!   

नीतीश, बिहार गठबंधन और ‘इंडिया’ को लेकर बढ़ी अटकलों के बीच बिहार की राजनीति को गहरे समझने वाले समी अहमद कहते हैं: “नीतीश की स्थिति उस पलटी हुई गाड़ी की हो गई है जो कई बार गैराज जाकर बाहर निकली है। सवाल है कि अगर यह गाड़ी एक बार फिर पलटी मारेगी तो गैराज जाकर लौटेगी या कबाड़खाने में बिकेगी।” वह सवाल उठाते हैं कि “क्या नीतीश के लिए एनडीए में जाने का विकल्प बचा भी है?” 

नीतीश इस समय बहुत फिसलन भरी राजनीति कर रहे हैं और अगर वह अब कोई ऐसा कदम उठाते हैं जिससे उनकी विश्वसनीयता पर शक हो तो उनका राजनीतिक कॅरियर कितना नीचे गिरेगा, इसका अंदाजा लगाना शायद उनके लिए भी मुश्किल होगा। सच भी यही है कि ‘इंडिया’ के अस्तित्व में आने के साथ नीतीश का कद जिस तरह बढ़ा और उनकी स्वीकार्यता सामने आई, उसमें फिलहाल तो उनके सामने कोई और बेहतर विकल्प नहीं दिखता। जानकर यह भी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव पूर्व की राजनीतिक बिसात की एक चौसर अभी झारखंड में भी जल्द ही बिछनी है। उसके भी तार बिहार, ख़ासतौर से राजद की राजनीति को प्रभावित करते दिखाई दे सकते हैं।


बिहार: जो दिखता है, हमेशा सब कुछ वैसा ही नहीं होता!

लालू और लाला की लालटेन! 

हमेशा सुर्खियों में रहने वाले लालू यादव एक इतर कारण से भी चर्चा में हैं और वह है उन पर बनी फिल्म ‘लाला का लालटेन’। खास बात यह कि इसकी पूरी शूटिंग गुजरात में हुई है और उनका किरदार निभाने वाले अभिनेता यश उनसे कभी मिले नहीं हैं। 2 घंटे 25 मिनट की यह ‘बायोपिक’ भोजपुरी में है और लालू यादव को इसमें लाला यादव नाम दिया गया है। स्वाभाविक रूप से उनके बचपन से लेकर छात्र जीवन और फिर मुख्यमंत्री बनने की कहानी समेटे फिल्म में अगर चरित्रों के नाम बदले हैं तो इसके तकनीकी कारण होंगे। इसमें लालू प्रसाद (यश) के साथ राबड़ी देवी (स्मृति सिन्हा) होंगी तो जय प्रकाश नारायण (अनूप अरोड़ा) भी दिखेंगे, उनसे जुड़े हुए और भी तमाम चरित्र।

लोग पूछ रहे कि जब लालू प्रसाद पर बायोपिक ही बनानी थी तो इसके लिए बिहार से सिर्फ चंद फुटेज क्यों लिए गए, पूरी शूटिंग उनसे छत्तीस का रिश्ता रखने वाले नरेंद्र मोदी के राज्य में क्यों हुई? लोग फिल्म में लाला यादव के इस संवाद का अर्थ भी तलाश रहे: “लाला यादव का आज से यही मुहिम होगा, कुर्ता नीचे गंजी ऊपर।” लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आई यह फिल्म बिहार की जनता के बीच क्या गुल खिलाती है, समय बताएगा

लेकिन इसे देखने वाले मनीष इसके संवाद “लाला यादव का वचन है आप लोगों को, कि आपका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाया जाएगा” के हवाले से नीचे तक जाने वाले इसके संदेश के असर से इनकार नहीं करते। मतलब, बिहार की राजनीति में सब कुछ रूखा-रूखा ही नहीं, कुछ रोचक-मनोरंजक भी होने जा रहा। गोया लोकसभा चुनाव के पहले अभी यहां कई नए रंग दिखने वाले हैं।

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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है!

राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बनने की ओर बढ़े ‘जनसुराज यात्रा’ के संयोजक प्रशांत किशोर इन दिनों अपनी यात्रा पर हैं और उस दिन दरभंगा में थे। यात्रा के दौरान वह लोगों को संबोधित भी करते हैं लेकिन छोटे-छोटे समूहों में, गांव-गिरांव में ठहर कर। वह लोगों को कांग्रेस, लालू और नीतीश के शासन के बारे में अलग-अलग अंदाज में समझाते हैं।

एक बैठकी में मौजूद मदन झा बताते हैं कि “वह लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और कांग्रेस के शासन की तारीफ करते, लोगों को समझाते दिखे। बोले, मान लीजिए कि कांग्रेस ने 45 साल बढ़िया काम किया, तो इसे मानने में क्या बुराई है। उन्होंने सही में काम तो किया है।” उन्होंने लालू प्रसाद के 15 साल के दौर को याद करते हुए याद दिलाया कि “उन्होंने गरीब-पिछड़ों को आवाज दी।” बोले- लालू को आप कभी यह कहते नहीं सुने होंगे कि उन्होंने बिहार को लंदन बना दिया। उन्होंने हमेशा कहा कि उन्होंने गरीब और पिछड़ों को आवाज दी। नीतीश कुमार के शासन में बिजली और शिक्षा पर हुए काम को भी याद किया। फिर आगे बोले- “लेकिन अगर आप रिकार्ड देखें तो फिर बिहार सबसे पिछड़ा राज बना हुआ है, तो फिर काहे बहस करते हैं कि लालू बिगाड़े कि मोदी बिगाड़े।” यह सब करते-कहते प्रशांत पूरा रास्ता ही बदलने की सलाह देते हैं। लेकिन वह कौन सा रास्ता होगा यह साफ-साफ नहीं बताते। मदन पूछते हैं, इस आदमी की पॉलिटिक्स क्या है भाई! 


और अंत में...

प्रशांत किशोर ने एक जुटान में जब यह दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए मतदान में राम मंदिर का मुद्दा कोई खास असर नहीं डालने जा रहा तो स्वाभाविक रूप से सुनने वालों को चौंकना ही था: ‘हां, यह एक बड़ी घटना जरूर है और भाजपा इसका जोर-शोर से प्रचार कर वोट में तब्दील करने की कोशिश भी जरूर करेगी।’ मंदिर के इर्दगिर्द सिमटी भावनाओं के सवाल पर उनका कहना था कि, “चुनावों के बारे में जितनी मेरी समझ है, यह काम नहीं करेगा। राजनीति में एक ही मुद्दा एक या दो बार से ज्यादा वोट नहीं दिला सकता।” और इसके समर्थन में वह मंडल और अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन की याद दिलाते हैं।  

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