बिहार में सरकारी शिक्षकों का हाल, पढ़ाई के अलावा सारे काम: 'शिक्षक नहीं, ट्रैक्टर हैं, जहां चाहे जोत देती है सरकार'

पटना के बापू स्मारक कन्या उच्च विद्यालय के शिक्षक अभिषेक कुमार कहते हैं कि ‘जैसे ट्रैक्टर को कभी खेत जुताई में लगाया जाता है तो कभी माल ढुलाई में, कभी सड़क पर दौड़ा दिया जाता है, उसी तरह सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों पर सरकार हर तरह का प्रयोग कर रही है।

फोटो : सोशल मीडिया
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शिशिर

इस स्टोरी में नीचे दिया गया मैसेज तब से ही वायरल है जब से नीतीश सरकार ने शिक्षकों के कंधे पर शराबबंदी को सफल बनाने का भार भी सौंप दिया। वैसे, बिहार के शिक्षकों को इस तरह के भार की आदत है। सरकारी विद्यालयों के शिक्षक हर जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 2017 में खुले में शौच करने वालों को रोकने की अहम जिम्मेदारी भी सरकार ने इन शिक्षकों को दी थी। तब भी हंगामा मचा था। जमीनी हकीकत देखें तो सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं मिली है- बच्चों को सही तरीके से पढ़ाकर कोर्स पूरा कराने की। यकीन न हो तो किसी भी अधिकारी के निरीक्षण की रिपोर्ट निकालकर खुद देख सकते हैं। साप्ताहिक निरीक्षण तक का प्रावधान है लेकिन निरीक्षण करने वाले अधिकारी सिर्फ शिक्षकों की हाजिरी देखकर लौट जाते हैं। अनुपस्थित शिक्षक पर कार्रवाई भी आसान नहीं होती क्योंकि, बिहार की कहावत में, इन्हें पढ़ाई छोड़कर छत्तीस तरह के काम सरकार ने खुद दे रखे हैं। कोई शिक्षक अंडा लाने तो कोई बोरा बेचने तक के लिए बाजार जाने की बात कह भी छूट सकते हैं।

बिहार में सरकारी शिक्षकों का हाल, पढ़ाई के अलावा सारे काम: 'शिक्षक नहीं, ट्रैक्टर हैं, जहां चाहे जोत देती है सरकार'

नीतीश सरकार सफाई दे रही है कि समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को जागरूकता की जिम्मेदारी दी गई है। इस पर पटना के बापू स्मारक कन्या उच्च विद्यालय के शिक्षक अभिषेक कुमार कहते हैं कि ‘जैसे ट्रैक्टर को कभी खेत जुताई में लगाया जाता है तो कभी माल ढुलाई में, कभी सड़क पर दौड़ा दिया जाता है तो कभी गड्ढे में उतारा जाता है, उसी तरह सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों पर सरकार हर तरह का प्रयोग कर रही है। उन्हें बच्चों को खिलाना भी है, जनगणना- पशु गणना भी करनी है, दवा भी बांटनी है, चुनाव भी कराना है, दहेज भी रोकना है और बाल विवाह भी!’ भोजपुर में सरकारी उच्च विद्यालय के शिक्षक और लेखक शंभू शरण सिंह कहते हैं कि ‘हम शिक्षकों से सिर्फ शिक्षा विभाग ही ड्यूटी नहीं लेता बल्कि सामान्य प्रशासन भी इन्हें काम देता है, स्वास्थ्य विभाग भी, महिला एवं बाल कल्याण भी, समाज कल्याण विभाग भी और उपभोक्ता संरक्षण भी। अब तो मद्य निषेध विभाग के लिए भी जिम्मेदारी आ गई है।’


बिहार में 12वीं तक के 78,196 सरकारी विद्यायलों में से लगभग एक चौथाई एक या दो शिक्षकों के भरोसे हैं। पहली से बारहवीं कक्षा तक विद्यालयों में पांच साल पहले के हिसाब से ही तीन लाख से ज्यादा पद खाली हैं। लखीसराय में नियोजित शिक्षक कुंदन कहते हैं कि “शिक्षकों की स्कूल से ज्यादा बाहर ड्यूटी रहती है। हर मतदान केन्द्र के अंतर्गत औसतन दो-तीन विद्यालय होंगे। इनमें से एक शिक्षक की हर शनिवार बीएलओ के रूप में स्थायी ड्यूटी रहती है। वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना, हटाना, सुधारना- सारा काम। इस शिक्षक का नंबर निर्वाचन आयोग की साइट से लेकर जिला निर्वाचन कार्यालय के बोर्ड तक पर होता है। नतीजा किसी भी समय कॉल आ जाता है। मतलब, शनिवार की फिजिकल और बाकी दिनों की वर्चुअल ड्यूटी करते हैं। इसी तरह जनगणना-पशुगणना हो, तो हर स्कूल के ज्यादातर शिक्षक 2 महीने के लिए विद्यालय से बाहर ही ड्यूटी बजाते रह जाते हैं। प्राइमरी और मिडिल स्कूल के शिक्षक बनकर घर-घर घूम डाटा शीट भरते हैं जबकि हाईस्कूल के शिक्षकों को इसमें सुपरवाइजर की ड्यूटी लगती है।

2019 में लोकसभा, 2020 में विधानसभा, 2021 में पंचायत चुनाव थे और इस साल नगर निगम के चुनाव हैं। इन सभी में शिक्षकों के भरोसे ही सारा काम था और रहेगा। चुनाव के दो महीने पहले से शिक्षक इसी में लगे रह जाते हैं। कई बार तो एक या दो शिक्षक वाले स्कूल इसी चक्कर में बंद हो़ जाते हैं। उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल होने से लेकर मतगणना तक शिक्षकों की ड्यूटी रहती है। काम तो इतना है कि शिक्षक ही कन्फ्यूज हो जाते हैं कि उन्हें कभी पढ़ाने की जिम्मेदारी भी निभानी है या नहीं!’

मिड-डे मील के लिए खिचड़ी तो रसोइये बनाते हैं लेकिन सारे इंतजाम तो शिक्षक भरोसे ही हैं। इसकी जिम्मेदारी मूल रूप से प्रधान शिक्षक, यानी प्रधानाचार्य या प्राचार्य की होती है लेकिन वह विद्यालय प्रबंधन के अलावा मिड-डे मील के लिए सामान की खरीदारी, भंडारण, हिसाब तक तो रख नहीं सकते। जाहिर तौर पर जहां शिक्षक हैं, वहां दो-तीन इसी में दिमाग खपाते हैं।


प्राथमिक शिक्षक संघ के मनोज कुमार कहते हैं कि ‘शिक्षकों की ड्यूटी का अंत ही नहीं हो रहा है। हां, पढ़ाना हमारी ड्यूटी से भले दूर हो रहा है। मिड-डे मील ही देखिए तो साधनसेवी चावल दे जाते हैं लेकिन बाकी सामान दुकानों में मोलजोल कर लेना होता है। अंडा या फल खुदरा बाजार से लेना संभव नहीं तो थोक बाजार तक दौड़ लगाने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों पर ही होती है। खोली बोरे तक को बेचना और हिसाब देना भी हमारे भरोसे है। कितने बच्चे आए, कितनों को कब मिड-डे मील खिलाया, इसका हिसाब करना और मुख्यालय तक भेजना भी शिक्षकों की जिम्मेदारी है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इस शताब्दी में शिक्षकेतर कार्यों के लिए विद्यालयों में कोई नई नियुक्ति हुई ही नहीं। पुराने शिक्षकेतर कर्मचारी रिटायर होते गए। सेवाकाल में जिनकी मौत हुई, उनके नाम पर अनुकंपा बहाली हुई तो शिक्षकेतर कर्मी मिले। बाकी कोई नहीं। चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों का भी काम इनके भरोसे है जिला मुख्यालय के या जिले के प्रमुख विद्यालयों को छोड़कर। सरकार को सोचना चाहिए किहमसे पढ़ाने का भी काम ले।’

इतनी ड्यूटी के बाद भी मैट्रिक- इंटर परीक्षाओं के मूल्यांकन में भी प्राइमरी-मिड्ल स्कूल के शिक्षकों की ड्यूटी लग रही है। इन्हें यहां मूल्यांकन से जुड़े अवार्ड शीट भरने का काम करना होता है। हर साल इस काम के कारण कई विषयों के शिक्षक महीना भर गायब हो जाते हैं

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