बिहार: सरकारी नौकरी मिलते ही कुंवारों की जान सांसत में, उम्र-वर्ण को लेकर बदल जाता है समाज का मिजाज़

बिहार में पकड़ौआ शादी के तमाम किस्से हैं। लेकिन बात इससे भी आगे की है। अब ऐसे रोचक किस्से सामने आ रहे हैं, जहां कल तक ठुकराए जाने वाले कुंवारों के लिए रिश्तों की लाइन लग गई है, जिसमें उम्र-वर्ण-शारीरिक अपंगता को भी अनदेखा किया जा रहा है।

(बाएं) परमजीत सिंह और (दाएं) प्रभु नारायण
(बाएं) परमजीत सिंह और (दाएं) प्रभु नारायण
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अनिल चमड़िया

भारतीय समाज में सरकारी नौकरी एक ऐसी घटना होती है जिससे न जाने कितने तरह के रहस्य, रोमांच,मनोरंजन के किस्से बनते हैं। सरकारी नौकरियां समाज के असली चेहरे का आईना भी होती है। बिहार में घटी कुछ ऐसी घटनाओं के कुछ किस्सों ने इन्हें फिर से साबित किया है।

कुछ घटनाएं काफी रोचक हैं-

बिहार के वैशाली को इतिहास में नगर वधुओं के लिए जाना जाता है। वहीं बिहार के गौतम के किस्से की भी खूब चर्चा हुई। दरअसल गौतम का किस्सा शुरु हुआ था सरकारी नौकरी पाने के बाद। दिवाली के आसपास गौतम राय की नियुक्ति रेपुरा के स्कूल में हुई। वह सरकारी नौकरी पाने के पीछे जाने कब से भाग रहा था, लेकिन एकदम अनुमान नहीं था कि उसी गति से उसके पीछे ‘शादी’ भी लगी है।

दिसंबर के शुरुआती दिनों में स्कूल में जब वह बच्चों को  पढ़ा रहे थे, उसी समय कुछ लोग आए और उन्हें क्लास रुम से बुलाकर बेलोरो गाड़ी में जबरन बैठा कर अपने साथ ले गए। गौतम की शादी पिता राकेश राय और काका भूषण राय के परिवार की लड़की से ‘पकड़औवा शादी’ करा दी गई।

बिहार में लड़को को अपहरण करके शादी कराने की घटनाओं को पकड़औवा शादी कहा जाता है । इस तरह की शादियों की घटनाओं के बारे में इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि 2017 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार में ऐसी 3405 शादियां कराई गई थीं।

आंखों से अपंग शिक्षक परमजीत की कहानी 

अब किस्सा शुरु होता है परमजीत सिंह का।  

परमजीत सिंह की म्यूजिक टीचर (संगीत शिक्षक) के पद पर नियुक्ति हुई है। उनकी उम्र बत्तीस साल है। आंखों से दिखता नहीं है। वे सिख धर्म को मानते हैं और गुरुद्वारा टकसाल संगत में 18 साल से सेवा कर रहे हैं। शादी की चाहत एक सामान्य पुरुष की तरह उनके भीतर भी रही है। आसपास उनके दोस्तों और परिवार में सदस्यों की शादी में उन्होने भोज भी खाया है। लेकिन उनके जीवन में शादी का दिन कभी नहीं आया। कारण, न नौकरी थी और ना ही आंखों में रोशनी। भला कौन उन्हें अपनी बहन-बेटी ब्याहता।

लेकिन बिहार में सरकारी स्कूलों में नौकरी क्या मिली , सैकड़ों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन घटनाओं-दुर्घटनाओं से गुजरने लगे। सरकारी शिक्षक बनने के साथ परमजीत के दिन ऐसे फिरे कि उनसे शादी के लिए एक लंबी लाइन लग गई है।

परमजीत सिंह कहते हैं कि उन्हें किसी तरह की बुरी आदत नहीं है। लेकिन समाज की नजरों में रोशनी नहीं है। इसीलिए समाज अंधेरे में भटकता रहता है। उनकी जब सरकारी नौकरी लगी है तो वे लोग भी उनके लिए शादी के प्रस्ताव लेकर आ रहे हैं जो उनकी अपंगता और सरकारी न होने के कारण मुंह बिचका दिया करते थे।


परमजीत के दादा रतन सिंह शहर के सबसे पुराने रूंगटा हाई स्कूल की स्थापना करने वालों में थे और वहां के लंबे समय तक प्रिंसपिल भी रहे हैं। लेकिन जब परमजीत ने संगीत शिक्षक के पद के लिए आवेदन किया और बिहार राज्य सेवा आयोग ने परीक्षा आयोजित की तो उनके सामने एक नई समस्या खड़ी हुई। उन्हें अपने साथ राइटर ले जाने की इजाजत नहीं मिल रही थी। उन्होंने अधिकारियों के सामने दावा किया कि वे परीक्षा हॉल में उनके चेहरे के सामने कैमरा लगा दें। उन्हें आंखे नहीं होने के कारण राइटर से जो मदद मिलनी चाहिए ,उससे ज्यादा किसी तरह की मदद की जरुरत नहीं है। आखिरकार परमजीत ने परीक्षा पास की और उन्हें नौकरी मिल गई।

बस इसके बाद तो परमजीत के जीवन में मानो बड़ा बदलाव हो गया। कई परिवार अपने परिवार और संबंधियों की बेटी-बहनों के रिश्तों का प्रस्ताव लेकर आने लगे। परमजीत बताते हैं कि कोई उन्हें मोटा दहेज देना चाहता है तो कोई बड़ी रकम। लेकिन परमजीत का साफ कहना है कि उन्हें शादी ऐसी लड़की से करनी है जो पढ़ी लिखी हो और घर संभालने के साथ उनकी जिम्मेदारियों को भी समझ सके।

प्रभू जी की कहानी...

ऐसा ही कुछ प्रभु के साथ भी हुआ है।

प्रभु नारायण विभू को लोग प्रभु जी के नाम से जानते हैं। वे पहले प्राइवेट नौकरी करते थे। प्रभु एक निजी स्कूल में पढ़ाते थे और बिहार में आमतौर पर निजी स्कूलों में शिक्षको की आर्थिक व सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं मानी जाती है।

बिहार में बीपीएससी की परीक्षा पास करने के बाद उनकी नियुक्ति म्यूजिक लेक्चरर के रुप में हुई हैं। संयुक्त परिवार है उनका और वे घर में भाई बहनों में सबसे बड़े है। बहन की शादी 2018 में हो चुकी है। दो छोटे भाई पढ़ते हैं। उनकी उम्र 35 साल हो गई हैं। प्रभु के परिवार में सबकी इच्छा थी कि उनकी भी शादी हो।

प्रभु जी बताते हैं कि पहले जो शादी के प्रयास हुए उसमें अधिकतर में लड़की वालों ने यह कहकर रिश्ते ठुकरा दिए कि एक तो नौकरी प्राइवेट है और उनका रंग भी काला है। लेकिन बिहार सरकार की नौकरी मिलने के बाद प्रभू जी के सामने शादी के प्रस्तावों की लाइन लग चुकी है। प्रभु जी कहते हैं कि समाज में विद्वता की नहीं रुपवानों की पूजा होती है। लड़के का रंग गोरा हो और भले वह कैसा भी हो, उसे स्वीकार कर लिया जाता है। पहले जिन लोगों की नजरों में शादी के संदर्भ में उनका रंग सांवला था और नौकरी प्राइवेट थी, वही लोग फिर उनके सामने शादी के प्रस्ताव ला रहे हैं।


प्रभु जी गुस्से में हैं

बिहार में एक मुहावरा कहा जाता है- सरकारी नौकरी का मतलब भगवान जी का दर्शन हो गया।

प्रभु जी बताते हैं कि सरकारी स्कूल में नौकरी लगने के बाद उनके सामने 15 से ज्यादा प्रस्ताव आ चुके हैं । उन प्रस्तावों मे पैसा, लड़की का रंग गोरा और गाड़ी देने जैसे सारे लालच शामिल हैं। लेकिन उन्हें इन सब चीजों का सच पता है। प्रभू जी को समाज के रुख को लेकर बहुत गुस्सा है।

प्रभु की भी कहानी बताती है कि भारतीय समाज दो उलटी दिशा में एस साथ चलने वाले हालात में फंसा हुआ है। समाज का बड़ा हिस्सा निजीकरण का समर्थन करने लगा है, लेकिन बहन-बेटियों की शादी के लिए सरकारी नौकरी वाले लड़के की तलाश करता है या उसे प्राथमिकता देता है।

बिहार में सरकारी नौकरी मिलने के बाद पुरुषों और महिलाओं के पारिवारिक और सामाजिक जीवन में जो बदलाव अचानक दिखने लगा है, वह एक दिलचस्प समाज शास्त्रीय शोध अध्ययन हो सकता है।

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