केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार के जाति सर्वेक्षण का किया विरोध, कहा- राज्‍य सरकार को अधिकार नहीं

पटना हाईकोर्ट ने 1 अगस्त को जाति सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि हम राज्य सरकार की इस कार्रवाई को पूरी तरह से वैध पाते हैं, इसे उचित सक्षमता के साथ शुरू किया गया है आर 'न्याय के साथ विकास' करना इसका वैध उद्देश्य है।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार के जाति सर्वेक्षण का किया विरोध
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार के जाति सर्वेक्षण का किया विरोध
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नवजीवन डेस्क

बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र की मोदी सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर बिहार सरकार के जाति सर्वेक्षण का पुरजोर विरोध किया है। केंद्र ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि उसके अलावा किसी को भी जनगणना या इस तरह की कोई भी प्रक्रिया अपनाने का अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत के विचार के लिए संवैधानिक और कानूनी स्थिति रखते हुए बिहार की नीतीश सरकार के जाति आधारित सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में आज केंद्रीय गृह मंत्रालय के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय द्वारा एक संक्षिप्त हलफनामा दाखिल किया गया।

हलफनामे में कहा गया है कि जनगणना का विषय संविधान की सातवीं अनुसूची में प्रविष्टि 69 के तहत संघ सूची में शामिल है और जनगणना अधिनियम, 1948 केवल केंद्र सरकार को जनगणना करने का अधिकार देता है। इसमें आगे कहा गया है कि, संविधान के तहत या अन्यथा (केंद्र को छोड़कर) कोई भी अन्य निकाय जनगणना या ऐसी कोई कार्रवाई करने का हकदार नहीं है।" इसने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार भारत के संविधान और अन्य लागू कानूनों के प्रावधानों के अनुसार एससी/एसटी/एसईबीसी और ओबीसी के उत्थान के लिए सभी सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है।

केंद्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे पर आरजेडी प्रमुख और बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस जाति जनगणना नहीं चाहते हैं। यह एक सर्वेक्षण है। वहीं बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कहा कि "उन्हें कोई जानकारी नहीं है। वे सिर्फ झूठ बोलना और सच को दबाना जानते हैं।। उन्होंने हलफनामे में भी इसका विरोध किया है। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि बीजेपी यह नहीं चाहती है और इसका विरोध कर रही है। यदि वे इसका समर्थन करते हैं, तो उन्हें पूरे देश में इसे (जाति जनगणना) कराना चाहिए।''


सुप्रीम कोर्ट ने 21 अगस्त को केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया था, जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि वह मामले की संवैधानिक और कानूनी स्थिति को रिकॉर्ड पर रखना चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण की अनुमति देने वाले पटना उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए बड़ी संख्या में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं पर आज 28 अगस्त को सुनवाई होनी थी, लेकिन वो आज सूचीबद्ध नहीं हो सकीं।

शीर्ष अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सर्वेक्षण प्रक्रिया गोपनीयता कानून का उल्लंघन करती है और केवल केंद्र सरकार के पास भारत में जनगणना करने का अधिकार है, और बिहार सरकार के पास जाति आधारित सर्वेक्षण कराने और अधिसूचित करने का कोई अधिकार नहीं है। इससे पहले शीर्ष अदालत ने सर्वेक्षण प्रक्रिया या सर्वेक्षण के परिणामों के प्रकाशन पर रोक लगाने के लिए अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था।

इस बीच नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने कहा है कि बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण पूरा हो गया है और परिणाम जल्द ही सार्वजनिक हो जाएगा। इससे पहले 1 अगस्त को पारित अपने आदेश में पटना उच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं को खारिज करते हुए सर्वेक्षण कराने के राज्य सरकार के फैसले को हरी झंडी दे दी थी। बिहार सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उसी दिन प्रक्रिया फिर से शुरू की और शेष सर्वेक्षण प्रक्रिया को तीन दिनों के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया।

इससे पहले, उच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया था जो इस साल 7 जनवरी को शुरू हुआ था और 15 मई तक पूरा होने वाला था। उच्च न्यायालय ने बाद में कई याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था, "हम राज्य सरकार की इस कार्रवाई को पूरी तरह से वैध पाते हैं, इसे उचित सक्षमता के साथ शुरू किया गया है आर 'न्याय के साथ विकास' करना इसका वैध उद्देश्य है।''

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Published: 28 Aug 2023, 10:00 PM
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