महाराष्ट्र में सत्ता हथियाने के लिए बीजेपी ने शुरु की हर किस्म की जोड़-तोड़, नारायण राणे को दी गई जिम्मेदारी

विधानसभा निलंबित है इसलिए यह उम्मीद बनी हुई है कि राजनीतिक पार्टियों के पास जादुई आंकड़ा जुटाने के लिए छह महीने का समय है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां हर हाल में नए साल से पहले सरकार बनाने के लिए गठजोड़ में लगी हुई है। कोई भी पार्टी दोबारा चुनाव नहीं चाहती है।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवीन कुमार

महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर जिस तरह से गठजोड़ की रणनीति में उठापटक हो रही है, उसमें भारतीय जनता पार्टी का अलग रूप भी सामने आ रहा है। इसे बीजेपी नेता नारायण राणे ने जाहिर भी किया है। राज्य में जब तक राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ था, उससे पहले तक वह उस परिदृश्य से बाहर थे जिसमें बीजेपी की ओर से सरकार बनाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन राष्ट्रपति शासन लगने के दिन- 12 नवंबर को, ही वह मीडिया के सामने आए और कहा कि उन्हें भी सत्ता के लिए जादुई आंकड़ा 145 जुटाने का निर्देश मिला है। यह निर्देश उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिया है जो बीजेपी के विधायक दल के नेता हैं।

राणे के बयान से राजनीतिक माहौल बदला है क्योंकि जो बात ढके-छुपे हो रही थी, अब उनके बयान के जरिये बीजेपी ने साफ-साफ मान लिया है कि वह जोड़-तोड़ की राजनीति कर रही है। बीजेपी की नजर शिवसेना और एनसीपी के विधायकों पर है। विधानसभा चुनाव से पहले भी बीजेपी ने एनसीपी के कई नेताओं को अपने पाले में कर लिया था और यह मान लिया था कि एनसीपी की ताकत कमजोर हुई है। मगर एनसीपी के विधायकों की संख्या बढ़ गई। शिवसेना की कमजोर नस को भी बीजेपी पहचानती है और उसे लगता है कि कुर्सी का लालच देकर उसके कुछ विधायकों को अपने पाले में लाना आसान है।

इस तरह की रणनीति में फडणवीस खुद भी माहिर हैं। लेकिन इस समय बीजेपी राणे का इस्तेमाल करना चाहती है। वजह यह है कि राणे शिवसेना में रहते हुए मुख्यमंत्री बन चुके हैं और उसके बाद कांग्रेस में जाकर वहां के भी तौर-तरीके जान गए हैं। अब वह बीजेपी में हैं और कह रहे हैं कि 145 के आंकड़े के साथ बीजेपी सरकार बनाने का दावा करेगी। फिर भी, यह सवाल तो बना हुआ है कि 40 विधायक कैसे जुटेंगे।

बीजेपी ने शिवसेना के साथ गठबंधन करके विधानसभा का चुनाव लड़ा था। नतीजे आने के बाद शिवसेना ने बीजेपी से सत्ता में 50-50 का फॉर्मूला लागू करने की मांग की जिसे बीजेपी ने ठुकरा दिया। इससे ही नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक संकट बढ़ गया। शिवसेना ने तो एनडीए से भी नाता तोड़ लिया है। मोदी सरकार में शामिल रहे उसके मंत्री अरविंद सावंत ने इस्तीफा दे दिया है। शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री चाहिए और यह उसकी जिद है। ऐसे में किसी और के साथ गठबंधन में भी उसे दिक्कत आ रही है। अपने मुख्यमंत्री के लिए शिवसेना की एनसीपी और कांग्रेस के साथ बातचीत चल रही है। कांग्रेस और एनसीपी का चुनाव पूर्व गठबंधन था इसलिए ये दोनों पार्टियां अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत शिवसेना के साथ सरकार बनाने की दिशा में मंथन कर रहे हैं।


पहले तो बीजेपी को लग रहा था कि शिवसेना उसे छोड़ नहीं सकती। मगर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ शिवसेना नए समीकरण गढ़कर सरकार बनाने की कोशिश में है जिससे बीजेपी की परेशानी बढ़ गई है। उधर, एनसीपी ने भी इशारा किया है कि बीजेपी के कम-से-कम 15 विधायक उसके संपर्क में हैं। माना जाता है कि इनमें से अधिकतर वे हैं जो चुनाव से पहले पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हुए थे। इन नेताओं को सत्ता प्रिय है, तब ही उन्होंने पाला भी बदला था। माना जा रहा है कि ये विधायक शरद पवार के कहने पर घर वापसी कर सकते हैं। यह संभव हुआ तो बीजेपी सरकार बनाने की दौड़ में कमजोर पड़ सकती है।

सूत्रों का कहना है कि ऐसी स्थिति में केंद्र और बीजेपी के इशारे पर राज्यपाल विधानसभा को भंग भी कर सकते हैं। वैसे भी राज्यपाल का यह फैसला विवाद में है कि उन्होंने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश जल्दबाजी में की है। कांग्रेस को सरकार गठन का मौका ही नहीं दिया। उससे पहले शिवसेना और एनसीपी को भी बीजेपी की तरह समय नहीं दिया।

विधानसभा निलंबित है इसलिए यह उम्मीद बनी हुई है कि राजनीतिक पार्टियों के पास जादुई आंकड़ा जुटाने के लिए छह महीने का समय है। लेकिन राजनीतिक पार्टियां हर हाल में नए साल से पहले सरकार बनाने के लिए गठजोड़ में लगी हुई है। कोई भी पार्टी दोबारा चुनाव नहीं चाहती है। उन्हें पता है कि जनता उन्हें सबक सिखाएगी, खासकर बीजेपी और शिवसेना को जिसे गठबंधन के तौर पर जनादेश दिया था लेकिन कुर्सीके लालच ने दोनों को अलग कर दिया और राज्य में राजनीतिक संकट पैदा हो गया।


वैसे, बीजेपी सरकार बनाने के लिए एनसीपी की तरफ भी झांक रही है क्योंकि 2014 में अल्पमत की सरकार बनाने में बीजेपी को एनसीपी ने मदद की थी। लेकिन तब से पानी बहुत बह चुका है और अब एनसीपी ऐसा नहीं करेगी। वजह साफ है कि बीजेपी ने उसे खत्म करने के लिए तोड़-फोड़ की और अब एनसीपी का कांग्रेस के साथ गठबंधन है।

उधर मुख्यमंत्री-पद की अपनी मांग के साथ शिवसेना ने बीजेपी के लिए विकल्प भी खोल रखा है क्योंकि उसे बीएमसी में अपनी सत्ता के साथ अपना मेयर भी चाहिए जो अभी बीजेपी के सहयोग से है। मेयर का चुनाव भी इसी 22 नवंबर को होना है। बीजेपी हरसंभव कोशिश कर रही है कि एनसीपी और कांग्रेस सरकार न बना पाए इसलिए वह शिवसेना का साथ दोबारा पाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है।

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