यूपी में बीजेपी सांसदों-विधायकों का सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ हल्ला बोल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बीजेपी के ही सांसदों-विधायकों ने हल्ला बोल रखा है। यही कारण है कि 'विधानसभा में न तो विधायकों को बोलने दिया गया और न ही प्रेस गैलरी में पत्रकारों को आने दिया गया।'

फोटो : Getty Images
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के संतोष

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हरसंभव कोशिश करते हैं कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की तरह उनकी भी हनक बनी रहे। सरकार में हैं, तो प्रशासन के जरिये विपक्षियों पर तो कोड़े बरसाते रहते हैं। लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी के विधायकों ने उन्हें हलकान कर रखा है। कुछ विधायक तो बयानबाजी करते रहते हैं और उनकी अनसुनी कर दी जाती है। लेकिन विधानसभा बैठक के दौरान इनके गुस्से परकाबू पाने का तरीका योगी अब तक निकाल नहीं पाए हैं।

पिछले साल दिसंबर महीने की बात याद करना जरूरी है। उपेक्षा से जूझते 100 से अधिक विधायकों ने लोनी (गाजियाबाद) के विधायक नंद किशोर गुर्जर को अपने क्षेत्र के फूड इंस्पेक्टर द्वारा अपमानित करने के मामले में प्रदर्शन कर तब सरकार को मुश्किलों में डाल दिया था। उस मामले से जैसे-तैसे निबटा गया।

सरकार को अभी हाल के विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान भी फजीहत झेलनी पड़ी। आखिरकार, सरकार को शोक प्रस्ताव और कोरोना की आड़ लेकर सत्र की औपचारिकता पूरी करने को मजबूर होना पड़ा। दरअसल, सत्र शुरू होने से पहले ही गोरखपुर शहर सीट से विधायक डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने एक ट्वीट के जरिये बीजेपी कार्यकर्ता के रिश्तेदार की मौत पर कार्रवाई नहीं होने पर नौकरशाही को घेरा। विधायक ने आरोप लगाया कि ‘अपर मुख्यसचिव अवनीश अवस्थी और डीजीपी हितेश अवस्थी को पांच-पांच बार फोन किया गया लेकिन कोई रिस्पांस नहीं मिला।’ फजीहत होती देख अधिकारियों ने विधायक से बात की। इसके बाद आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ ही दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की गई। बाद में विधायक ने ट्वीट को डिलीट कर दिया।

वहीं सुल्तानपुर से बीजेपी विधायक देव मणि द्विवेदी ने भी सत्र के लिए ऐसे सवाल लगाए जिससे सरकार परेशानी में पड़ेः पिछले तीन वर्षों में कितने ब्राह्मण मारे गए हैं? इस अवधि में कितने आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं? क्या राज्य सरकार ने ब्राह्मणों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई योजना बनाई है? क्या सरकार प्राथमिकता के आधार पर ब्राह्मणों को हथियार लाइसेंस प्रदान करेगी? विधानसभा में इन सवालों के जवाब देने की नौबत नहीं आई लेकिन इस पर सियासत खूब हो रही है। रही-सही कसर लगातार सात बार के विधायक औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना के बयान ने पूरी कर दी। महाना ने कहा, ‘कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद मुझे मुख्यमंत्री से अपॉइंटमेंट नहीं मिलती है जबकि विपक्ष का विधायक होने के बाद भी सपा सरकार में जब चाहा, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से क्षेत्र की समस्याओं को साझा किया।’


योगी की दिक्कत यह है कि विरोध के स्वर थम नहीं रहे हैं। वैसे, इसके पीछे एक-दूसरे की टांग खिंचाई भी है। मुख्यमंत्री के जिले के सांसद और विधायक लोक निर्माण विभाग के एक राजपूत सहायक अभियंता के के सिंह को लेकर आमने-सामने हैं। दरअसल, जलभराव के मुद्दे पर डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने बीते दिनों उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य से मुलाकात की थी जिसके बाद इंजीनियर को मुख्यालय से संबंद्ध करने का मौखिक आदेश हुआ था। इसके बाद सांसद रवि किशन, विधायक विपिन सिंह, शीतल पांडेय और महेन्द्र पाल सिंह ने उपमुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इंजीनियर को ईमानदार बताते हुए कार्रवाई नहीं करने की मांग कर डाली। इंजीनियर के समर्थन में विधायक संगीता यादव और फतेह बहादुर सिंह भी कूद पड़े हैं। माना जा रहा है कि नगर विधायक का विरोध खुद मुख्यमंत्री के इशारे पर हो रहा है। वैसे, एक अन्य विधायक कहते हैं कि ‘मुख्यमंत्री ने कार्यभार संभालते ही नौकरशाहों को यह कहते हुए सरंक्षण दे दिया था कि आप अपने विवेक से काम करें, विधायकों के दबाव में आने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री का इशारा मिलने के बाद अधिकारी बेलगाम हो गए हैं।’

गुस्से को हवा दे रहे विपक्षी

बीजेपी के जनप्रतिनिधियों के इस हाल को देखते हुए विपक्षी भी मुद्दों को हवा दे रहे हैं। पिछले दिनों विधान परिषद में सपा सदस्य सुनील यादव साजन ने कैबिनेट मंत्री चेतन चैहान की कोरोना से हुई मौत के बहाने संजय गांधी पीजीआई की दुर्दशा को बयां कर सियासी हल्के में तूफान खड़ा कर दिया। एमएलसी ने कहा कि ‘पीजीआई स्टाफ कैबिनेट मंत्री को ‘चेतन’ कहकर पुकार रहे थे। पूछा जा रहा था कि कहां के मंत्री हैं।’ बयान वायरल होने के बाद प्रदेश सरकार को स्वर्गीय चेतन चैहान की पत्नी से बयान दिलाना पड़ा कि ‘पति के इलाज में उपेक्षा नहीं हुई है। ऐसा होता तो वह मुझे अवश्य बताते।’ वहीं बीजेपी विधायकों के ट्वीट और सरकार विरोधी प्रतिक्रियाओं को सपा अपने फेसबुक पेज और ट्विटर पर लगा रही है। सपा के राष्ट्रीय सचिव प्रो. अभिषेक मिश्रा चुटकी लेते हुए कहते हैं कि ‘बीजेपी विधायकों में थोड़ा भी सम्मान बचा हो तो सीएम योगी को अपना इस्तीफा देकर विरोध करना चाहिए।’


थम नहीं रहा गुस्सा

आगरा में कोरोना के बिगड़ते हाल पर बीजेपी के मेयर नवीन जैन ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर जिलाधिकारी को तुरंत हटाने की मांग करते हुए लिखा कि ‘आगरा को वुहान होने से बचाइए।’ पत्र के बाद जिलाधिकारी को तो नहीं बदला गया लेकिन सरकार की तरफ से मेयर से लेकर सांसद, विधायक को सरकार की डांट जरूर पड़ी। हरदोई से बीजेपी सांसद जयप्रकाश ने फेसबुक पर लिखा कि ‘30 साल के राजनीतिक जीवन में अधिकारियों की ओर से ऐसी बेरुखी कभी नहीं देखी।’ सांसद से लेकर विधायक तक अपनी निधि रोके जाने के बाद इससे खरीदे गए उपकरणों की डिटेल नहीं मिलने से नाराज हैं। सांसद जयप्रकाश ने लिखा कि ‘मेरी निधि की राशि कहां गई, मुझे ही नहीं मालूम।’ वहीं गोपामऊ से बीजेपी विधायक श्याम प्रकाश का पुलिसिया कार्रवाई को लेकर दर्द फेसबुक पर छलक चुका है। नाराज विधायकों में सीतापुर शहर सीट से विधायक राकेश राठौर का नाम भी सुर्खियों में है। वह पीएम के थाली बजाओ अभियान का मखौल उड़ाकर प्रदेश अध्यक्ष का नोटिस पा चुके हैं।

इन्हीं वजहों से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं कि ‘योगी सरकार अपने विधायकों से लेकर मीडिया तक से डरी हुई है। इसी का नतीजा है कि न तो अपने विधायकों को विधानसभा में बोलने दिया गया, न ही प्रेस गैलरी में पत्रकारों को एंट्री दी गई। बिना बहस के चंद मिनटों में 28 विधेयकों को ताबड़तोड़ मंजूरी दे दी गई।’

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