ज्यादा सीटें-एनडीए सरकार, फिर भी बीजेपी की जीत का जश्न नहीं मना रहा बिहार, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है

बिहार चुनाव में इस बार बीजेपी ने ज्यादा सीटें जीती हैं, एनडीए की सरकार भी बन गई है, लेकिन अभी तक बिहार में बीजेपी अपनी इस जीत का जश्न नहीं मना पा रही है। इसका कारण यह है कि अभी बहुत कुछ बाकी बचा है बिहार की राजनीतिक पिक्चर में।

फाइल फोटो
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शैलेश कुमार सिंह

बिहार में एनडीए की सरकार बनने के बावजूद तीन सवालों के जवाब खोजने चाहिए क्योंकि उससे ही यहां की राजनीति के पानी का अंदाजा मिल सकता हैः

  1. अधिक सीटों पर जीत होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी राज्य में उत्सव क्यों नहीं मना रही है

  2. बिहार चुनाव से दूर रहे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह परिणाम के बाद से ही क्यों एक्टिव हुए हैं

  3. बीजेपी के प्रमुख नेताओं को नीतीश कुमार सरकार से अलग क्यों रखा गया है?

यह बात ध्यान रखने की है कि इन चुनावों में बीजेपी की सीटें 53 से बढ़कर 74 तो हो गईं लेकिन उसका वोट शेयर 24.4 प्रतिशत से घटकर 19.46 प्रतिशत हो गया है। दूसरी तरफ, पिछली बार जनता दल (यूनाइटेड) ने 16.8 प्रतिशत वोट पाकर 70 सीटें पाई थीं जबकि इस बार 15.39 प्रतिशत पाकर 43 सीटें ही जीती हैं। इस मामले में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल का प्रदर्शन बेहतर रहा है। उसे पिछली बार 18.4 फीसदी मत मिले थे जबकि इस बार 23.1 प्रतिशत मत। यह जरूर है कि पिछली बार उसे 81 सीटें मिली थीं जबकि इस बार 75 सीटें मिली हैं। इस तरह बीजेपी का वोट प्रतिशत तो घट ही गया, सीटों के मामले में वह आरजेडी से पीछे भी रह गई।

जब चुनाव की औपचारिक शुरुआत हो रही थी, तब भी चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को तवज्जो देते देखकर जेडीयू ने बीजेपी को चेताया था। एलजेपी की वजह से जिस तरह जेडीयू की सीटें कम हो गईं, उसके बाद बीजेपी-जेडीयू की संयुक्त बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरह के तेवर दिखाए, उसके बाद से ही बीजेपी के पैरों तले से जमीन खिसकी हुई है। उस बैठक में मौजूद रहे दो बीजेपी नेताओं का कहना है कि परिणाम आने के बाद नीतीश कुमार सार्वजनिक तौर पर भले ही शांत दिखे, पर कम सीटें आने के लिए बैठक में चिराग पासवान और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच मिलीभगत को जिम्मेदार ठहराया।

नीतीश किस तरह पलटूराम हैं, यह सब जानते हैं और इसी वजह से बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व तुरंत सतर्क हो गया। महाराष्ट्र में शिवसेना को धोखा देकर बीजेपी अपना हश्र देख चुकी है। उसे लगा कि यहां तो नीतीश को आरजेडी के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि वे दोनों पहले भी पार्टनर रह चुके हैं। इसलिए न सिर्फ नीतीश बल्कि जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी का भी लगातार मान-मनौवल किया जा रहा है। बीजेपी ने बिहार में इसीलिए कोई बड़ा सेलिब्रेशन नहीं किया।

अमित शाह के भी चुनाव बाद एक्टिव होने की वजह यही है। जेपी नड्डा बीजेपी अध्यक्ष तो बना दिए गए हैं, पर ‘असली नेतृत्व’ उनके राजनीतिक कौशल पर पूरा भरोसा नहीं करता। शाह मान-मनौवल से लेकर डराने-धमकाने तक में एक्सपर्ट हैं और पार्टी नेतृत्व को ऐसे वक्त उनकी जरूरत थी। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पटना में बताया कि शाह इसके साथ ही एक अन्य फ्रंट पर सक्रिय रहे। जब मंत्रिमंडल के लिए नाम फाइनल किया जाने लगा तो लगभग सभी प्रमुख पार्टी नेताओं को किनारे कर दिया गया। शाह एक मिशन की तरह बंगाल और असम पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं। बंगाल और असम में अगले साल मई में चुनाव हैं। उनकी तरफ से साफ संकेत था कि वह कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते हैं जिससे बिहार के गठबंधन में कोई दरार हो और विपक्ष उसका फायदा बंगाल में उठाए। इसीलिए दिल्ली में उत्सव मनाया गया जबकि बंगाल के बीजेपी संगठन को संदेश दिया गया कि बिहार की जीत को बंगाल में खूब भुनाया जाए। पार्टी के एक संगठन पदाधिकारी के अनुसार, बंगाल की सांसद और बीजेपी बंगाल महिला मोर्चा की अध्यक्ष लॉकेट चटर्जी ने शाह का नाम लेकर जिस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं को संदेश दिया है, उससे बात समझी जा सकती है।

वैसे, बीजेपी भविष्य की तैयारी में लगी तो हुई है। नीतीश कुमार को कब और कैसे शोभा का बड़ा पद देकर मनाया जाएगा, उसे लेकर कई थ्योरी है। पर बीजेपी ने सुशील मोदी को तो किनारे कर ही दिया है। छोटे मोदी से शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी प्रसन्न नहीं रहे और चुनाव से पहले ही तय हो चुका था कि उन्हें अगली सरकार में मौका नहीं मिलने वाला। बीजेपी ने संघ पृष्ठभूमि वाले दो नेताओं- तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बना तो दिया है लेकिन एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पार्टी को भी पता है कि उनमें सीएम मेटेरियल नहीं है। शायद फिलहाल वह नीतीश कुमार के कान खड़े नहीं करना चाहती इसलिए ये कमजोर पत्ते आगे किए गए हैं। बंगाल और असम चुनावों से पहले यह एक विराम है।

वैसे, बिहार के संदर्भ में बीजेपी की असली रणनीति उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सामने आएगी। यूपी में मार्च, 2022 में चुनाव होंगे। इसलिए तब तक केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय पर निगाह रखने की जरूरत है। वैसे, लोग केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का नाम भी जब-तब चलाते रहते हैं लेकिन जिस तरह की उनकी तबीयत है और जिस तरह के वह मुखर हार्डलाइनर हैं, उसमें उन्हें नेतृत्व तब ही सौंपा जा सकता है जब बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत हो। और वह अभी तो नहीं ही है उसके पास।

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