क्या आरोग्य सेतु ऐप के लिए सरकार किसी को कानूनी तौर पर मजबूर कर सकती है, जवाब है नहीं

सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार कानूनी तौर पर आपको आरोग्य सेतु एप के लिए मजबूर कर सकती है। जवाब है नहीं। न तो सरकार बिना और न ही प्राइवेट इम्पलायर आपकी सहमति के बिना आपका कोई भी डेटा ले सकता है, क्योंकि यह निजता का उल्लंघन है।

फोटो : सोशल मीडिया
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ऐशलिन मैथ्यू

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहली मई को एक बेहद घुमावदार आदेश जारी कर दिया। इस आदेस में कहा गया कि कोरोना ट्रेसिंग ऐप, रोग्यसेतु को सभी सरकारी और प्राइवेट कर्मचारियों को डाउनलोड करना अनिवार्य होगा। आदेश में कहा गया कि, “हर संस्था का उच्चाधिकारी अपने कर्मचारियों पर यह आदेश 100 फीसदी लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा।” इस आदेश के दो सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल को राष्ट्र के नाम संदेश में सभी भारतीयों से इस ऐप को डाउनलोड करने की पील की थी ताकि कोरोना वायरस से लड़ा जा सके।

सरकार के पहली मई के आदेश को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून 2005 के तहत जारी किया गया है। आदेश के मुताबिक सभी जिलों को स्वास्थ्य मंत्रालय ने रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में बांटा है और स्थानीय प्रशासन को आरोग्य सेतु ऐप की 100 फीसदी कवरेज सुनिश्चित करनी है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार कानूनी तौर पर किसी को इसके लिए बाध्य कर सकती है। जवाब है नहीं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून, जिसके तहत सरकार ने यह आदेश जारी किया है वह संयुक्त सूची में आता है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार कोई भी दिशा निर्देश जारी कर सकती है और फिर राज्यों से इसे यथासंभव लागू करने को कह सकती है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर कम्यूनिकेशन गवर्नेंस के प्रोजेक्ट मैनेजर शशांक मोहन कहते हैं कि, “इसके दो पहलू हैं। पहला तो यह कि कंटेनमेंट जोन में रहने वाले हर व्यक्ति को यह ऐप अपनाना होगा और दूसरा यह कि हर काम करने वाले को इस ऐप को डाउनलोड करना होगा। कानूनी तौर पर सरकार किसी से भी ऐसा ऐप डाउनलोड करने को नहीं बाध्य कर सकती जिसमें नाम, लिंग, उम्र और आदतों की जानकारी देना जरूरी हो। सरकार किसी की मर्जी के बिना यह जानकारियां नहीं ले सकती। लेकिन इस मामले में ऐसा हो रहा है।”

संविधान विशेषज्ञ और वकील गौतम भाटिया का इस बारे में कहना है कि एडीएमए ऐसा कानून नहीं है, क्योंकि इसमें सरकार को किसी भी परिस्थिति में न तो किसी के सार्वजनिक अधिकार सीमति करने या उनमें झांकने का अधिकार मिलता हो। यहां तो मामला निजता का है।

यह भी प्रश्न उठता है कि आखिर सरकार इसका 100 फीसदी पालन कैसे कराएगी खासतौर से निजी कर्मचारियों के बीच और कंटेनमंट जोन में रहने वाले उन लोगों के बीच जिनके पास स्मार्टफोन नहीं हैं।

सरकारी इम्पलायर आमतौर पर सरकार ही है, लेकिन निजी इम्पलायर के लिए इस नियम का पालन करना थोड़ा जटिल है। शशांक मोहन कहते हैं कि, “संयुक्त संसदीय समिति के पास लंबित पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल के तहत सिर्फ कुछ ही जानकारियां कर्मचारी की सहमति के बिना ली जा सकती हैं, वह भी सिर्फ उनका वेतन देने के लिए। लेकिन जब संवेदनशील जानकारियों की बात आती है तो किसी भी इम्पलायर को कर्मचारी की सहमति चाहिए होती है।” मोहन बताते हैं कि किसी कर्मचारी के स्वास्थ्य की जानकारी संवेदनशील जानकारी में आती है।

तो क्या इम्पलायर को अपने कर्मचारियों के स्मार्टफोन की व्यवस्था करनी पड़ेगी? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। फूड कंपनी चलाने वाले एक सीईओ ने नाम बताने की शर्त पर कहा कि, “मैं कैसे सुनिश्चित करूंगा कि सभी कर्मचारियों ने इस ऐप को डाउनलोड किया है क्योंकि फूड फैक्टरियों में फोन लाने की इजाजत ही नहीं है।” इसी तरह जूते, ज्वेलरी, मशीन वर्कशॉप. हार्डवेयर और तमाम आईटी और आईटीईएस कंपनियों में भी फोन लाने की इजाज़त नहीं होती है। शायर अकाउंट, एचआर, एडमिन या दूसरे दफ्तरों में फोन लाने की इजाजत है।

उन्होंने बताया कि उनके वकीलों का कहना है कि कर्मचारियों पर यह नियम कानूनी तौर पर लागू नहीं कर सकते क्योंकि कोई कर्मचारी अपने फोन का पासवर्ड क्यों देगा, और अगर मांगा गया तो वह अदालत की शरण में जा सकता है। और फिर सभी कर्मचारियों को फोन कंपनी ने तो दिया नहीं है, और फिर कई कर्मचारी तो फील्ड में हैं, तो उनके फोन कैसे चेक किए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के 2017 के निजता के मामले में आए फैसले में कोर्ट ने कहा था कि निजता बुनियादी अधिकार है, और संविधान के तहत हमारी कोई भी अधिकार पूर्ण नहीं है। फैसला सुनाने वाली 9 जजों की बेंच में शामिल रहे जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि स्वास्थ्य इमरजेंसी या महामारी के दौरान सरकार बीमारी को रोकने के लिए सरकार लोगों का निजी डेटा हासिल कर सकती है। ऐसे में सरकार को डेटा की गोपनीयता सुनिश्चित करनी होगी।

लेकिन आरोग्य सेतु ऐप में संविधान द्वारा स्थापित मानकों का उल्लंघन होता दिखता है। आधार के फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी की कोई निजी जानकारी का उल्लंघन होता है तो इसे सही साबित करने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सारी जानकारियां किसी व्यक्ति के ही पास रहनी चाहिए, यानी अगर कोई व्यक्ति अपनी जानकारियां नहीं देना चाहता तो उन्हें हां या न कहने का विकल्प मिलना चाहिए। लेकिन आरोग्य सेतु ऐप में एक बार जानकारियां देने के बाद उन्हें बदला नहीं जा सकता। शशांक मोहन कहते हैं कि अगर सरकार लोगों को बाध्य करती है तो यह असंवैधानिक है।

स्वतंत्र शोधकर्ता और एक्टिविस्ट कल्याणी मोहन कहती है कि गुड़गांव दिल्ली सीमा पर सिर्फ उन्हीं लोगों को आने-जाने की अनुमति मिल रही है जो अपने फोन में आरोग्य सेतु ऐप को दिखा पा रहे हैं, यह निजता का उल्लंघन है। आधार की ही तरह यह भी एक तरह का निगरानी ऐप है जिसे सरकार ने महामारी के नाम पर लोगों पर पूर्ण नियंत्रण के लिए पेश किया है। कल्याणी कहती है कि, “सरकार का दावा है कि इससे कोरोना का प्रसार रुकेगा, लेकिन कैसे इस पर कोई जवाब नहीं है।”

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