जनधन और आधार पर मोदी सरकार के दावे भी जुमला, मई 2014 से पहले ही खुल चुके 25 करोड़ खाते और 65 करोड़ आधार

मोदी सरकारके जनधन खातों की सच्चाई महज एक जुमला है, क्योंकि इसकी शुरुआत यूपीए सरकार केजमाने में हो चुकी थी और लगभग 25 करोड़ खाते खुल चुके थे। इतना ही नहीं मई 2014 तक65 करोड़ आधार नंबर भी जारी किए जा चुके थे। यह दावा किया है कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने।

फोटो : सोशल मीडिया
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पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि जिस तरह भारत उदय की कहानी 26 मई 2014 को नहीं शुरु हुई, उसी तरह जनधन योजना की शुरुआत भी मोदी सरकार के दौर में नहीं हुई। गुरुवार को दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस में पी चिदंबरम ने कहा कि, ”यूपीए सरकार के शासन में ही 'वित्तीय समावेश' की मजबूत नींव पड़ चुकी थी, जिसके तहत आरबीआई ने बुनियादी बचत बैंक जमा खाते खोलने की शुरुआत कर दी थी। यह सारे खाते जीरो बैलेंस वाले थे। और, मई 2014 तक इस तरह के 25 करोड़ खाते खुल चुके थे।“

चिदंबरम ने कहा कि आम लोगों को आधुनिक बैंकिंग सुविधाओं का लाभ मिलना शुरु हो चुका था। उन्होंने बताया कि इसी तरह आधार कार्ड जारी करने का कार्यक्रम भी शुरु हो चुका था और मई 2014 तक 65 करोड़ लोगों को आधार नंबर जारी किया जा चुका था। पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि बुनियादी बचत खाते और आधार, दोनों ही ऐतिहासिक कदम थे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया था क्योंकि आम लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने के लिए कई मजबूत कदम उठाए गए थे:

  • 2008 में राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एन पी सी आई स्थापित किया जा चुका था
  • 2009 में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई की स्थापना की गई थी
  • 2010 में राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एन पी सी आई ने तत्काल भुगतान प्रणाली यानी आई एम पी एस की शुरुआत कर दी थी
  • 2012 में रिज़र्व बैंक ने बुनियादी बचत खातों की विधिवत शुरुआत कर दी थी
  • 2012 में एन पी सी आई ने रूपे कार्ड की शुरुआत कर दी थी

उन्होंने बताया कि मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने के दावे भी खोखले हैं। पी चिदंबरम ने आंकड़े देते हुए कहा कि 2010 से 2014 के बीच ग्रामीण इलाकों में कुल 12,748 बैंक शाखाएं खोली गईं और 3,03,504 ग्रामीण बैंक सहायकों की नियुक्ति की गई जो गांव-गांव जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं मुहैया करा रहे थे। इस तरह गांवों केलिए कुल 3,16,252 बैंकिंग शाखाएं एक तरह से काम कर रही थीं। चिदंबरम ने मोदी सरकार के पहले चार साल के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि 2014-18 के बीच महज 4,679 ग्रामीण बैंक शाखाएं खोली गई और 1,77,639 ग्रामीण बैंक सहायक तैनात किए गए। यानी कुल 1,82,318 ग्रामीण बैंक शाखाओं की सुविधा गांव के लोगों के लिए उपलब्ध कराई गई।

चिदंबरम ने कहा कि मोदी सरकार ने बुनियादी बैंक खातों का नाम बदलतर जनधन योजना रख दिया और सिर्फ जुमले गढ़ कर वाहवाही लूटने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जब भी मोदी सरकार जनधन खातों की बात करती है, तो 2014 से पहले खोले गए खातों का जिक्र नहीं करती। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की जनधन योजना आत्ममुग्धता के लिए की गई बहुत बड़ी धोखाधड़ी है, क्योंकि दिसबंर 2016 तक कुल खातों का 24 प्रतिशत में कोई राशि ही जमा नहीं थी। उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि, “वित्त मंत्रालय के अनुसार 6.1 करोड़ जनधन खाते अर्थात पांच में से एक खाता 'निष्क्रिय' है।“

उन्होंने विश्वबैंक की ग्लोबल फिन्डेक्स डाटाबेस 2017 का हवाला देते हुए कहा कि भारत में '48 प्रतिशत बैंक खाते' निष्क्रिय हैं जोकि किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के 25 प्रतिशत के मुकाबले लगभग दोगुने हैं। इसके अलावा 33 प्रतिशत खाते उन व्यक्तियों के द्वारा खोले गए हैं जिनके पहले से ही खाते थे। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि, “अब ये सबको मालूम है कि जनधन खातों का इस्तेमाल नोटबंदी के बाद काले धन को खपाने के लिए किया गया। 8 नवम्बर 2016 से 30 दिसम्बर 2016 के बीच 42187 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि जनधन खातों में जमा की गई। शुरुआत में अर्थात 12 नवम्बर 2016 वित्त मंत्री ने इस प्रकार के संदिग्ध खातों में पैसा जमा करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही करने की 'धमकी' भी दी थी, लेकिन कुछ ही समय बाद ऐलान कर दिया था कि इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी।“

चिदंबरम ने कहा कि, “अकेले यूनाइटेड बैंक ऑफ़ इंडिया में, 11,80,000 जनधन खाते हैं, जिसमें एक लाख से अधिक तथाकथित 'yचत राशि' जमा की गयी है।“

चिदंबरम ने कहा कि सरकार जनधन खाता धारकों को 30 हज़ार रुपये के, 'जीवन बीमा' और 'दुर्घटना बीमा सुविधा' देने का प्रचार तो कर रही है, लेकिन वो चालाकी से यह सच्चाई छुपा रही कि यह सुविधा सिर्फ उन खाताधारकों मिलेगी जिन्होंने 15 अप्रेल 2014 से 31 जनवरी 2015 के बीच खाते खुलवाएं हैं। यानी इसके बाद वाले खाताधारकों को यह सुविधा नहीं मिलेगी। इस योजना का मकसद लोगों को सुविधा देना नहीं था बल्कि अधिक से अधिक खाते खुलवाने के मकसद से इस प्रकार का लालच दिया गया था। सरकार आज तक यह नहीं बता पा रही है कि इस योजना का लाभ ( मृत्यु या दुर्घटना के पश्चात) कितने लोगों को मिला है।

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Published: 02 Nov 2018, 8:54 AM