जेएनयू हमलाः दिल्ली पुलिस की पोल उसी के दावे खोल रहे, हमलावरों के घिर जाने पर मौके से निकाला

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के साबरमती होस्टल में हमला करने वाले पांच लोगों को छात्रों ने पकड़ भी लिया था लेकिन तभी पुलिसवाले आए और उन्हें वहां से निकालकर ले गए। जाहिर है, पुलिस जो भी दावा करे, लेकिन जेएनयू हिंसा में उसकी पूरी मिलीभगत थी।

फोटोः सोशल मीडिया
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तथागत भट्टाचार्य

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में नकाबपोश दंगाइयों ने छात्रों और शिक्षकों के साथ जो कुछ किया, उसकी बहुत तेजी से तफ्तीश करने का नाटक तो दिल्ली पुलिस ने किया लेकिन वह जिन तथ्यों के साथ सामने आई है, वही उसकी पोल खोल रहे हैं।

डीसीपी (क्राइम) जॉय तिर्की ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में 5 जनवरी को दोपहर बाद पेरियार होस्टल पर हमला करने के मामले में वामपंथी छात्रों के नाम लिए। ये सब वही नाम थे जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय संगठन मंत्री आशीष चौहान और संगठन के दिल्ली संयुक्त सचिव अनिमा सोनकर ने 7 जनवरी के अपने ट्वीट में बताए थे। बल्कि यह भी रोचक है कि उस ट्वीट में जिस तरह का क्रम था और जिस तरह की भाषाई गलती थी, पुलिस ब्रीफिंग में भी वह सब उसी तरह है।

और तो और तिर्की ने हिंसा के वक्त के जो फोटो दिखाए, उसमें उन्होंने वामपंथी छात्रों की तो पहचान की, लेकिन विद्यार्थी परिषद के लोगों का नाम लेना उन्होंने, पता नहीं क्यों, मुनासिब नहीं समझा। पुलिस ने एक और गलती की- उसने विद्यार्थी परिषद के शिवपूजन पटेल की विकास पटेल के तौर पर पहचान की। वैसे, दोनों ही विद्यार्थी परिषद के हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के डोलन सामंता के मामले में भी पुलिस ने जिस फोटो का उपयोग किया, वह पेरियार होस्टल का नहीं है। वह इस होस्टल से करीब एक किलोमीटर दूर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (एसएसएस) भवन का है।

वैसे, विभिन्न फैकल्टी के छात्र जो बता रहे हैं, वह किस्सा भी पुलिस की थ्योरी से किसी भी तरह मेल नहीं खाता। स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज (एसएल) के विद्यार्थी धर्मेंद्र का कहना है, “फीस बढ़ाने का विरोध कर रहे छात्रों पर 3 जनवरी के बाद से ही विद्यार्थी परिषद से जुड़े लोग हमला कर रहे थे और उन्हें परेशान कर रहे थे। 5 जनवरी को स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन और उपकुलपति और एम जगदीश कुमार के घोषित समर्थक अश्विनी महापात्रा ने विरोध कर रहे छात्रों को पीटने के लिए दक्षिणपंथी छात्रों को उकसाया। वह यह चिल्लाते हुए सुने गए कि ‘मैं विद्यार्थी परिषद था, मैं विद्यार्थी परिषद हूं, मैं सब दिन विद्यार्थी परिषद रहूंगा।’ तब भी विद्यार्थियों ने दिल्ली पुलिस का दरवाजा खटखटाया था लेकिन उधर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं हुई।”

यह ध्यान रहे कि करीब एक महीने पहले फीस वृद्धि को लेकर विरोध प्रदर्शनों के बाद से ही करीब 10-15 पुलिस वाले सादे कपड़ों में परिसर में रह रहे थे। एसएसएस के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज (सीएचएस) के एक वरिष्ठ फैकल्टी का कहना है, “आप उन्हें आम तौर पर पिंक पैलेस (जेएनयू प्रशासनिक भवन) के आसपास मंडराते हुए देख सकते हैं। हम इस हिंसा से हतप्रभ हैं। ऐसा प्रशासनिक नाराजगी की वजह से नहीं है। फैकल्टी मेंबर्स की पहचानकर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। हमला करने वाले इनके घरों में भी घुस आए। उनके बच्चे सन्न हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे परिवार वाले यह सब झेलें।”

जब गुंडे वामपंथी छात्रों और कश्मीरियों के कमरों में घुसकर मारपीट-तोड़फोड़किया तो उसके बाद पुलिस का एक दल साबरमती के सामने आया। स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंसेज के एक फैकल्टीकहते हैं: उन्होंने माइक पर भीड़को वहां से हट जाने को कहा लेकिननतो उपद्रव मचा रहे लोगों को रोकने या गिरफ्तार करने की कोशिश की। उन्होंने हमलावरों को भागजाने दिया।सएस 2 बिल्डिंग के सामने मानव श्रृंखला बनाई। विद्यार्थी परिषद के संतू मैती, सुमन चक्रवर्ती और अरूप वहां आकर छात्राओं की वीडियो बनाने लगे। हमने सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट (सीएसआरडी) की प्रो. भास्वती दास को भी यह बात बताई, लेकिन प्रो. दास ने कुछ नहीं किया। तब हमने उन लोगों से वीडियो डिलीट करने को कहा, क्योंकि वे बिना हमारी इजाजत के ऐसा कर रहे थे और इसी बात को लेकर एसएसएस 2 बिल्डिंग की लॉबी में हमारी उनसे झड़प हुई। इसी झड़प की फोटो को दिल्ली पुलिस पेरियार हॉस्टल में हुए हमले में मेरे शामिल होने के सबूत के तौर पर दिखा रही है। उसके बाद एबीवीपी के लोग एसएसएस-2 से चले गए, लेकिन हम वहीं रहे। दोपहर लगभग 1.30 बजे आदित्य चौधरी, राज पांडे, राजू कुमार और निशांत विद्यार्थी समेत एबीवीपी के छह छात्र आए और उन्होंने अपनी पैंट से रॉड निकाले। वहां मौजूद छात्रों ने उन्हें चुनौती दी। कैंपस के सुरक्षा गार्ड, जो तब कहीं नजर नहीं आते जब एबीवीपी के गुंडे हमें पीट रहे होते हैं, अचानक से आ गए और प्रदर्शनकारी छात्रों से एबीवीपी वालों को बचाया और फिर वे छात्र पेरियार होस्टल में भाग गए।

जब गुंडों ने वामपंथी छात्रों और कश्मीरियों के कमरों में घुसकर मारपीट-तोड़फोड़ किया तो उसके बाद पुलिस का एक दल साबरमती के सामने आया। स्कूल ऑफ कंप्यूटर साइंसेज के एक फैकल्टी कहते हैं, “उन्होंने माइक पर भीड़ को वहां से हट जाने को कहा लेकिन न तो उपद्रव मचा रहे लोगों को रोकने या गिरफ्तार करने की कोशिश की। उन्होंने हमलावरों को वहां से भाग जाने दिया।”

सेंटर फॉर इकॉनोमिक स्टडीज एंड प्लानिंग और सीएचएस के दो अन्य वरिष्ठ फैकल्टी ने बताया कि रात 11 बजे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत 50 से ज्यादा पुलिस वाले कैंपस के भीतर नॉर्थ गेट तक पहुंच गए थे। उन्होंने कहा, “हमने उनसे अनुरोध किया कि हमारे साथ चलें और गुंडों को पकड़ने के लिए हर कमरे की तलाशी लें। हमने उनसे कहा कि हम भी उनके साथ चलेंगे, जिससे हमारे छात्रों के साथ दुर्व्यवहार न हो। वे तैयार हो गए और करीब 300 मीटर तक हमारे साथ गए भी, लेकिन उसके बाद बिना कुछ कहे वापस मुड़ गए। हम उनके वापस जाने का कारण पूछते रहे लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।”

एक अन्य फैकल्टी ने बताया, “साबरमती होस्टल में छात्रों ने पांच हमलावरों को पकड़ लिया था। तभी हमलावरों को निकल जाने को कह रहे कुछ पुलिसवाले आए और उन्हें निकालकर ले गए। इस हिंसा में दिल्ली पुलिस की जेएनयू प्रशासन के साथ पूरी-पूरी मिलीभगत थी। अगर ऐसा नहीं होता तो चालीस हथियारबंद लोग ऐसे ही नहीं घुस आते और हर गेट पर भारी संख्या में पुलिस की मौजूदगी के बावजूद निकल भागने में सफल होते। जब हमलावरों की भीड़ साबरमती के पास पहुंची तो वहां की बत्तियां बुझा दी गई थीं। जाहिर है, जेएनयू प्रशासन की मिलीभगत से ही कैंपस के भीतर इस तरह की हिंसा को अंजाम दिया गया।

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