69 हजार शिक्षक भर्ती को लेकर कांग्रेस का BJP पर सीधा हमला, कहा- दलित-पिछड़ा विरोधी है BJP सरकार
युवाओं का कहना है, "हम दलित-पिछड़े समाज से हैं, हमारी कोई सुनने वाला नहीं है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करके सरकार पर हमला बोला है।

लखनऊ की सड़कों पर झुलसा देने वाली गर्मी के बीच एक झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी, विशेषकर दलित और पिछड़े वर्ग के युवा घुटनों के बल सड़क पर रेंगते हुए अपना हक मांग रहे हैं। तपती धूप और आंसुओं के बीच इन युवाओं का कहना है, "हम दलित-पिछड़े समाज से हैं, हमारी कोई सुनने वाला नहीं है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करके सरकार पर हमला बोला है।
कांग्रेस ने वीडियो शेयर करके कहा कि लखनऊ में शिक्षक भर्ती घोटाले से निराश युवा सड़क पर रेंगते हुए अपना हक मांग रहे हैं। दरअसल यूपी की BJP सरकार ने 69 हजार शिक्षक भर्ती में आरक्षण का घोटाला किया, जिसने दलित-पिछड़े वर्ग के युवाओं के सपनों को रौंद दिया है। ये युवा बीते 4 साल से संघर्ष कर रहे हैं, नौकरी के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। यही BJP सरकार का दलित-पिछड़ा विरोधी चेहरा है, जो नहीं चाहती कि दलित-पिछड़े वर्ग के युवाओं को नौकरी मिले, उचित हिस्सेदारी और भागीदारी मिले। लेकिन... कांग्रेस पार्टी इन युवाओं के साथ खड़ी है और उनकी मांग का पूरा समर्थन करती है। BJP सरकार को तत्काल इस पर संज्ञान लेते हुए युवाओं की मांग पूरी करनी चाहिए।
क्या है 69 हजार शिक्षक भर्ती में आरक्षण घोटाला?
यह पूरा विवाद दिसंबर 2018 में निकली 69,000 सहायक शिक्षकों की भर्ती से जुड़ा है। परीक्षा जनवरी 2019 में हुई और परिणाम 2020 में आया, लेकिन यहीं से विवाद शुरू हो गया । आरक्षित वर्ग (दलित, पिछड़े, आदिवासी) के अभ्यर्थियों ने पाया कि भर्ती में आरक्षण नियमावली 1994 और बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 का खुला उल्लंघन किया गया है।
अभ्यर्थियों का आरोप है कि इसमें सरकार ने तय आरक्षण से कहीं कम कोटा दिया। ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण के बजाय मात्र 3.86% दिया गया। एससी वर्ग को 21% आरक्षण के बजाय मात्र 16.2% दिया गया। इस गड़बड़ी के चलते करीब 19,000 सीटों पर तथाकथित घोटाला हुआ, जिससे अन्य वर्ग के करीब 20,000 अभ्यर्थी नौकरी से वंचित रह गए। लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 13 अगस्त 2024 को इस भर्ती की पुरानी मेरिट लिस्ट को रद्द कर दिया था और सरकार को तीन महीने में नई लिस्ट बनाने का आदेश दिया था , लेकिन सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर मामले को टालती रही। अब करीब 7 साल बीत चुके हैं, लेकिन अभ्यर्थियों को अभी तक नियुक्ति नहीं मिली है।
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