कांग्रेस फिर उठ खड़ी होगी और केंद्र में निश्चित रूप से बदलाव होगा: अधीर रंजन चौधरी

लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता और पश्चिम बंगाल के बहरामपुर से सांसद अधीर रंजन चौधरी ने संसद में जिस तरह मोदी सरकार पर शब्दों के बाण चलाए, उसकी चौतरफा चर्चा हो रही है। नेशनल हेरल्ड ने पांच बार सांसद रहे अधीर रंजन चौधरी से खास बातचीत की।

फोटो : सोशल मीडिया
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तथागत भट्टाचार्य

लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता के रूप में आप पर बड़ी जिम्मेदारी है, खासतौर से तब जब चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में आप इस जिम्मेदारी को किस तरह निभाएंगे?

यह अकेले मेरी नहीं, बल्कि पूरी पार्टी की सामूहिक जिम्मेदारी है। भले ही पार्टी ने मुझे अगली कतार में रखा है, लेकिन यह सभी सांसदों की सामूहिक जिम्मेदारी है। बहुत सारे मुद्दे हैं जिन पर बात होनी चाहिए। लोगों से जुड़े मुद्दे उठाने के लिए हमेशा संसद में संख्या बल जरूरी नहीं होता है। हम लड़ेंगे और आने वाले समय में अपना चुनावी प्रदर्शन बेहतर करने की कोशिश करेंगे।

यानी आपने मुद्दे तय कर रखे हैं जिन्हें संसद में उठाना है?

बहुत सारे मुद्दे हैं। लेकिन हम फिलहाल आर्थिक और सामाजिक मुद्दे उठाएंगे। देश में तरह-तरह की दिक्कते हैं, नौकरियां नहीं हैं, औद्योगिक विकास सुस्त पड़ा है, पानी की भयंकर कमी है, कृषि क्षेत्र बुरे हाल में है। इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। ऐसे में हम सदन में साबित करेंगे कि सरकार भले ही कुछ दावे करे, लेकिन जमीनी हकीकत एकदम अलग है।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी हमेशा से हाशिए की पार्टी रही थी, लेकिन अचानक उसके हिस्से में 18 लोकसभा सीटें आ गईं। इतने कम समय में कैसे बीजेपी को इतना फायदा हो गया?

देखिए, पूरे देश में जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो रहा है या हुआ है, पश्चिम बंगाल भी उससे अछूता नहीं रहा है। इसकेअलावा एक और कारण यह रहा कि तृणमूल कांग्रेस ने पूरे बंगाल में एक आतंक का माहौल बना रखा है। भयंकर भ्रष्टाचार और लोगों के साथ होते अन्याय के चलते मतदाता ने विकल्प तलाशने शुरु कर दिए। और उन्होंने इस बार बीजेपी को चुना। साथ ही लेफ्ट फ्रंट के करीब 80 फीसदी वोट बीजेपी के खाते में चले गए। लोग सुकून से जीना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने बीजेपी में शरण ली है।

बंगाल के मालदा उत्तर और जांगीपुर जैसे अपनेगढ़ में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। सिर्फ मालदा दक्षिण और बहरामपुर में ही कांग्रेस जीत सकी। ऐसा क्यों हुआ?

आपको समझना होगा कि बीजेपी के धार्मिक ध्रुवीकरण के खेल की काट के लिए ममता बनर्जी ने भी अलग किस्म की सांप्रदायिक राजनीति का सहारा लिया। इससे मुस्लिम वोटर तृणमूल के साथ चला गया और हिंदू वोटर बीजेपी के साथ। कांग्रेस को इससे दोहरा नुकसान हुआ, और उसे दोनों समुदाय के भारी संख्या में वोटों को खोना पड़ा। लेफ्ट के साथ भी ऐसा ही हुआ।

चुनावों से पहले तो कांग्रेस ने काफी सघन प्रचार अभियान चलाया लेकिन इससे मनपसंद नतीजे सामने नहीं आए। ऐसा कैसे हो गया?

इस बार एक अलग तरह के आक्रामक राष्ट्रवाद को सामने रख दिया गया और इसके सामने बाकी मुद्दे पीछे छूट गए। पुलवामा के जवाब में बालाकोट हवाई हमलों को लेकर  बीजेपी ने लोगों को समझाया कि मोदी एक ताकतवर नेता है और वही देश की रक्षा-सुरक्षा कर सकते हैं। असीम प्रचार और धनबल के जोर से इस संदेश को पूरे देश के कोने-कोने में फैला दिया गया। इस नैरेटिव की काट करने में कांग्रेस नाकाम रही। इसके अलावा राहुल गांधी ने यह भी कह दिया कि जो भी मोदी का विरोध करेगे, वह उसका समर्थन करेंगे, वह मायावती हों या ममता बनर्जी। इससे लोगों के बीच एक गलत संदेश गया कि जब कांग्रेस खुद ही किसी क्षेत्रीय दल को समर्थन देने की बात कर रही है तो फिर उसे क्यों वोट दिया जाए। वैसे यह फार्मूला काम करता अगर कांग्रेस और बाकी सभी विपक्षी दलों ने मिलकर विभिन्न राज्यों में एक संयुक्त विपक्ष की तस्वीर सामने रखी होती।

आप पांच बार सांसद रहे हैं और आपने कई दशक तक संसद का कामकाज देखा है। बीते पांच साल में इसमें कितना बदलाव आया है?

जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। पहले बहसों और चर्चाओं का एक स्तर होता था। सभी महत्वपूर्ण बिलों को संसद की स्टैंडिंग कमेटी जांचती-परखती थीं इसके बाद बिल आगे जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। सरकार जो भी चाहती है, मनमानी कर लेती है। कभी अध्यादेश का रास्ता अपनाती है तो कभी मनी बिल (वित्त बिल) का रास्ता। उनकेलिए यह सब अब सामान्य प्रक्रिया है।

लेकिन, इस सरकार से ऐसी ही अपेक्षा भी थी। यह सरकार हर संस्था को नष्ट करने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। जिन संस्थाओं को दशकों की मेहनत से बनाया गया उन्हें खत्म करने पर आमादा है। ऐसे में संसद भी कैसे बचा रह सकता है?

दो लोकसभा चुनावों में लगातार हार के बाद,अब पार्टी किस तरह अपनी खोई जमीन हासिल करेगी?

ऐसा जरूर होगा। इन लोगों के पास अब इसके बाद खेलने के लिए कुछ नहीं बचा है। अगर पुलवामा और बालाकोट नहीं हुआ होता, तो बीजेपी के नतीजे एकदम अलग होते। इसके अलावा विपक्ष भी एकजुट नहीं था। यूपीए सरकार भी 10 साल तक सत्ता में रही। इनके भी 10 साल होने दीजिए, इसके बाद बदलाव निश्चित रूप से होगा।

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