कोरोना संकटः लॉकडाउन पर विशेषज्ञों ने उठाए सवाल, क्या ऐसे ही महामारी से निपट लेगी मोदी सरकार!

कोरोना से निपटने के लिए किए गए देशव्यापी लॉकडाउन में सबसे बड़ा संकट जरूरी वस्तुओं की भारी जमाखोरी के कारण बढ़ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान सब्जियों, रसोई गैस और दूध की आपूर्ति सुनिश्चित करवाने के दावों की बुरी तरह पोल खुल रही है।

फोटोः सोशल मीडिया
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उमाकांत लखेड़ा

दुनिया में आर्थिक, सामाजिक और मेडिकल क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि मोदी सरकार ने जिस तरह से होमवर्क किए बिना अचानक देशव्यापी लॉकडाउन किया है, उसके चलते इस विशाल आाबादी वाले देश के दूसरे पक्षों पर कैसा असर पड़ेगा और उसके क्या परिणाम होंगे।

सबसे चौंंका देेने वाली बात यह है कि भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में सचिव के तौर पर काम कर चुकीं के सुजाता राव को भारत में कोरोना की चपेट में आए वास्तविक रोगियों की तादाद को लेकर केंद्र सरकार के दावों पर संदेह है। उन्होंने अंग्रेज़ी पत्रिका कारवां को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "हमारे देश की स्वास्थ्य सुविधाएं इस तरह की महामारी से निपटने में जरा भी सक्षम नहीं हैं।

उन्हें बस इतना संतोष है कि दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारत की घनी आबादी के मुकाबले अभी कोरोना संक्रमित रोगियों की आनुपातिक तादाद बहुत कम है। उन्होंने यह गंभीर सवाल उठाया है कि इतनी विशाल और बिखरी हुई आबादी वाले देश भारत में कोरोना टेस्ट कितने लोगों का हो पाया है। उन्हें आशंका है कि आने वाले दिनों में जितने रोगियों के सघन टेस्ट होंगे, उसी अनुपात में इस महामारी की चपेट में आए रोगियों की तादाद बढ़ना तय है।

इधर विशेषज्ञ इस बात से भी चिंतित हैं कि लोग अगर घरों में कैद रहेंगे तो वे खाएंगे, पीएंगे क्या। सबसे बड़ा संकट आवश्यक वस्तुओं की भारी जमाखोरी के कारण बढ़ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सब्जियों, रसोई गैस और दूध की आपूर्ति लॉकडाउन के दौरान घरों में सुनिश्चित करवाने के दावों की बुरी तरह पोल खुल रही है।

जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, "जमाखोरी का मूल कारण है, सप्लाई चेन का टूटना। लोगों की आम जरूरतों का सामान उत्पादन की जगहों से गंतव्य यानि आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही जमाखोरों के हाथ लग रहा है। उसके वितरण की समुचित व्यवस्था डगमगाने से ही साबित हो रहा है कि राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासनिक मशीनरी ने इस दिशा में पहले से कोई योजना बनाना तो दूर इस बारे में सोचा तक नहीं।”

अरुण कुमार आगे कहते हैं, “जबकि डेढ़ माह पहले से ही दुनिया के कई देशों में कोहराम मचा हुआ है। सरकार को सोच-विचार करना चाहिए था कि आज नहीं तो कल जब यह महामारी भारत में दस्तक देगी तो फिर आम जनता और गरीबों का क्या हश्र होगा। उनका कहना है कि सरकार ने रणनीति बनाकर समय रहते सही कदम उठाए होते तो बाजार में मौजूदा भारी मांग और आपूर्ति में असंतुलन के संकट का इतना विकराल रूप देखने को नहीं मिलता।”

वहीं दुनिया की ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री प्रो जयति घोष इस बात से बहुत चिंतित हैं कि इस महामारी के चलते किसानों के खेतों में पैदा साग-सब्जियों और अनाज को मंडियों तक पहुंचाने वाले ट्रक और माल वाहन की आवाजाही जहां-तहां ठप होने से जरूरी सामान की आवाजाही सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। जाने-माने पत्रकार करन थापर को दिए इंटरव्यू में जयति घोष ने कहा, "शहरी लॉकडाउन भारत के गांवों की इकोनॉमी पर दोहरा दुष्प्रभाव पड़ने जा रहा है। एक तो गांवों में पहले से ही रोजगार नहीं हैं और दूसरा यह कि गावों में अस्पताल और डॉक्टरों की भारी किल्लत है।

बकौल उनके देश के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में संक्रमण फैला तो आर्थिक क्षति की तीव्रता कई गुना बढ़ेगी। विमानन सेवाओं के बंद होने से छोटे और मंझोले उद्योग-धंधों के बंद होने के साथ ही होटल, पर्यटन व्यवसाय के अलावा जो लाखों लोग इस क्षेत्र में अपरोक्ष आजिविका पर निर्भर हैं, उनके सामने जिंदा रहने का संकट पैदा हो गया है।

प्रो जयति घोष ने आगाह किया है कि अगर जमीनी स्तर पर जमाखोरी और आम लोगों के मन में थोक भाव से सामान खरीदने की बाध्यता को हतोत्साहित नहीं किया गया तो इससे कई जगहों पर भोजन और राशन-पानी के लिए लोगों में आपसी झगड़े, तनाव और बलवा होने की आशंकाएं हैं। इसलिए पहले चरण में लॉकडाउन दो सप्ताह तक सीमित रख समीक्षा के बाद अगला कदम उठाया जाना चाहिए था।

कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि लॉकडाउन एक एहतियाती कदम है ताकि लोगों को सामाजिक मेलजोल से रोका जाए। बकौल उनके यह उपचार नहीं बल्कि कोरोना से एहतियात भर है। जेएनयू में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ स्टडीज के प्रोफेसर कमल मित्र चिनॉय एक और मुद्दे को उठाते हुए कहते हैं, "भारत के कई राज्यों की भिन्न-भिन्न विकट भौगोलिक स्थितियां हैं। हर राज्य में आदतन अलग-अलग तरह के माल और सामान की मांग है। जो प्रदेश अन्न पैदा करने में सक्षम हैं, वहां दूसरी चीजों की जरूरतें हैं। केरल में अनाज कम होता है, तो वहां दूसरे प्रदेशों से ट्रकों की आवाजाही ठप है। उस सुदूर राज्य की जरूरत के हिसाब से माल-सामान पहुंचना जरूरी है। केंद्रीय एजेंसियों को चाहिए कि राज्यों के बीच माल और खाद्यान्न की आपूर्ति में और समन्वय बनाएं, ताकि जहां जिस माल की जरूरत हो वहां उन वस्तुओं को आम लोगों तक पहुंचाया जाए।”

जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ और अग्रसेन इंटरनेशनल हॉस्पिटल रोहिणी में कार्डियक सर्जरी के प्रमुख डॉक्टर दिनेश चंद्रा कहते हैं, "देशभर में लॉकडाउन की वजह से जीवन रक्षक जरूरी दवाएं और आपातकालीन उपकरणों की भारी कमी चिंताजनक है। राज्यों और केंद्र सरकार को चाहिए कि प्रशासनिक व्यवस्था के तहत यह सुनिश्चित हो कि शुरुआत में तो कम से कम जिलों के सरकारी अस्पतालों में दवा और उपकरण भंडार केंद्रों की अतिरिक्त व्यवस्था सुलभ हो।”

मेंदांता मेडिसिटी गुड़गांव में कई साल हर्ट सर्जन रहे चुके डॉ चंद्रा कहते हैं, “हमारी सरकार भले ही इस महामारी से बचने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि राज्यों के सभी अंचलों, यहां तक कि जिलों में समुचित मात्रा में कोरोना मरीजों के लिए विशेष अस्पताल शीघ्रता से बनें। जिन अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं, वहां इन्हें बढ़ाएं। वेंटिलेटर्स पर्याप्त हों ताकि ज्यादा से ज्यादा गंभीर रोगियों की जान बचायी जा सके। डॉक्टरों का यह भी मानना है कि कोरोना रोगियों की तादाद बढ़ने की सूरत में इटली मॉडल अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा, जहां वेंटिलेटर्स की कमी होने से उम्रदराज रोगियों को उनके हाल पर छोड़ देना पड़ा।

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