कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों के लिए देवदूत बनीं पूर्व राष्ट्रपति की बेटी, बोलीं- फौरन हो घर भेजने का इंतजाम

पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण की बेटी विजया रामचंद्रन साल 1986 से ही कानपुर में समाज सेवा में जुटी हुई हैं। यहां के ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों में वह शिक्षा का अलख जगा रही हैं। करीब तीन दशकों में वह 50 हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं।

फोटोः साभार
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आईएएनएस

कोरोना महामारी संकट के चलते लगे लॉकडाउन से जूझ रहे प्रवासी मजदूरों के लिए पूर्व राष्ट्रपति की बेटी देवदूत बनकर सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश में दूसरे राज्यों से पलायन करके आए मजदूरों और उनके बच्चों को वह न केवल खाने-पीने का सामान मुहैया करवा रही हैं, बल्कि महामारी से बचने के लिए उन्हें जागरूक भी कर रही हैं।

प्रवासी मजदूरों के सामने दानवीर के रूप में उपस्थित यह शख्स कोई और नहीं बल्कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ आर वेंकटरमण की बेटी विजया रामचंद्रन हैं। कानपुर के लोग इन्हें विजया दीदी के नाम से पुकारते हैं। साल 1986 से ही वह कानपुर में समाज सेवा में जुटी हुई हैं। यहां के ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों में वह शिक्षा का अलख जगा रही हैं। करीब तीन दशकों में वह 50 हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं।

उम्र के 75वें पड़ाव को पार कर चुकीं विजया दीदी के हौसले को कोरोना भी डिगा नहीं सका है। भारत के 8वें राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमण की पुत्री विजया को अपने पिता के नाम पर सद्भावना लेना भी ज्यादा अच्छा नहीं लगता है। उन्होंने कहा, "माता-पिता मेरी प्रेरणा हैं। पिता के बारे में ज्यादातर लोग पहले नहीं जानते थे। जब वह राष्ट्रपति बने तब लोग उन्हें जानने लगे। इसके पहले वह आजादी की लड़ाई में गांधी जी के साथ जेल गए थे। उन्होंने मजदूरों के लिए बहुत काम किया था। इसके बाद वह मजदूरों के मंत्री बने।"

विजया रामचन्द्रन की मां जानकी वेंकटरमण ने भी काफी समाज सेवा की। विजया के पति आईआईटी कानपुर में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। पति की नौकरी के बाद से ही विजया कानपुर में ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों को शिक्षा देने का काम करने लगी थीं। विजया ने बताया, “1990 से ईंट भट्ठा मजदूरों के बच्चों को शिक्षा देने के लिए 'अपना स्कूल' नामक संस्था का संचालन शुरू हुआ। इसमें इस समय करीब एक हजार बच्चे नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 'अपना स्कूल' के केंद्र कानपुर में अभी महराजपुर, सरसौल, चौबेपुर पनकी, टिकरा के ईंट भट्टों के नजदीक संचालित हो रहे हैं।"

प्रवासी मजदूरों के संबंध में विजया का कहना है कि उन सबकी जो मदद हो रही है, वह ठीक है। लेकिन, जो पैदल चल रहे हैं, उन्हें तत्काल उनके घर पहुंचाया जाना चाहिए। मजदूरों की हालत दयनीय है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। विजया दीदी का सुझाव है कि सरकार को प्रवासी मजदूरों के लिए यातायात की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके अलावा उनके खाने-पीने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा "क्वारंटाइन सेंटरों की भी व्यवस्था बेहतर हो। जब अपने देश के बाहर रहने वाले लोग हवाई जहाज से लाए आ सकते हैं, तो मजदूरों को उनके घर क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता, सरकार इस बारे में ध्यान दे।"

'अपना स्कूल' के केन्द्रों पर कोआर्डिनेटर का काम देखने वाले ब्रज नारायण शर्मा ने कहा, "इस संस्था में बच्चों को नि:शुल्क भोजन के साथ उन्हें ड्रेस भी उपलब्ध कराई जा रही है। इन शिक्षा केन्द्रों में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बच्चे भी नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते हैं। इसके अलावा जब वह यहां से चले जाते हैं तो उनकी शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए यहां से शिक्षक भेजकर उनकी पढ़ाई को सुचारू रूप से चालू रखा जाता है।"

उन्होंने बताया कि इस कोरोना काल में जब महाबंदी चल रही है, ऐसे में भट्ठे के प्रवासी मजदूर और महाराष्ट्र से आ रहे मजदूरों के लिए संस्था की तरफ से खाने-पीने की समुचित व्यवस्था की गई है। इसके लिए उन्हें सूखा राशन भी मुहैया कराया जा रहा है। शर्मा ने बताया कि लॉकडाउन के पहले चरण में 716 परिवारों में 6,126 किलोग्राम दाल, चावल और आंटा बांटा गया। इसके अलावा 473़5 लीटर तेल, 635 किलो नमक और साबुन 649 यूनिट वितरित किए गए।

उन्होंने कहा कि दूसरे चरण में 1112 परिवार लभान्वित हो चुके हैं। इस चरण में 11859 किलो चावल, दाल और आटे के साथ 859 लीटर तेल, 1112 किलो नमक और 1112 साबुन दिए गए। इसी तरह लॉकडाउन के तीसरे चरण में 1247 परिवारों में 29062 किलो दाल, चावल और आटा के अलावा 2494 लीटर तेल, 1247 किलो नमक और 1247 यूनिट साबुन बांटा जा चुका है। संस्था द्वारा अब तक तीन हजार से ज्यादा परिवारों को मदद दी जा चुकी है। इसमें 47 हजार किलो से अधिक राशन वितरित किया जा चुका है। शर्मा ने बताया कि पर्याप्त मदद मिलने के कारण ही क्षेत्र के ईंट भट्ठों पर काम करने वाले प्रवासी कामगारों का यहां से पलायन नहीं हो रहा है।

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