दिल्ली सरकार के पास नहीं है घरों में कोविड से जूझ रहे या जान गंवाने वालों का कोई आंकड़ा, मदद की भी कोई व्यवस्था नहीं

दिल्ली सरकार के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि घर में आइसोलेशन में रहकर कोविड से जूझ रहे लोगों की ऑक्सीजन जरूरत क्या है और इनमें से कितने लोगों की मृत्यु हुई है। सरकार ने यह बात दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मानी है।

फोटो : Getty Images
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ऐशलिन मैथ्यू

दिल्ली सरकार के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि घर में आइसोलेशन में रहकर कोविड से जूझ रहे लोगों की ऑक्सीजन जरूरत क्या है और इनमें से कितने लोगों की मृत्यु हुई है। सरकार ने यह बात दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मानी है। ध्यान रहे कि दिल्ली में लोग ऑक्सीजन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन के लिए संदेश भरे पड़े हैं।

गौरतलब है कि बीते दो सप्ताह के दौरा दिल्ली के लगभग सभी बड़े अस्पतालों, सर गंगाराम, बत्रा, मैक्स, एमडी सिटी, जयपुर गोल्डन आदि ने ऑक्सीजन सप्लाई के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। लेकिन घरों पर ऑक्सीजन के लिए तरस रहे लोगों के लिए सरकार की तरफ से कोई राहत नहीं है। ध्यान रहे कि 2 मई 2021 तक दिल्ली में कम से कम 50,742 लोग होम आईसोलेशन में रहकर कोविड से जूझ रहे हैं।

एम्स के डायरेक्टर डॉ रंदीप गुलेलिया के मुताबिक कोरोना पॉजिटिव पाए गए 15 फीसदी लोगों को ऑक्सीजन थेरेपी की जरूरत होती है। इस हिसाब से दिल्ली में होम आइसोलेशन वाले कम से कम 7,500 मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत है। असली संख्या इससे कहीं अधिक हो सती है क्योंकि बहुत से लोगों को टेस्ट कराने में भी दिक्कतें आ रही हैं और बहुत से ऐसे मरीज भी हैं जिनकी टेस्ट रिपोर्ट तो निगेटिव आई है लेकिन उनमें कोरोना के लक्षण साफ हैं।

दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में काम करने वाले एक डॉक्टर ने बताया कि, “यह कोई तरीका नहीं है। लोगों को अपने जीवन के लिए संघर्ष करने को छोड़ दिया गया है। अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौते तो खबरें बन रही हैं, लकिन हमें नहीं पता कि कितने लोगों की मौत घरों में ही ऑक्सीजन की कमी से हो रही है। यहां तक कि इन लोगों को सरकारी आंकड़ों में भी शामिल नहीं किया जा रहा है। आंकड़ों में सिर्फ उन्हें ही शामिल किया जा रहा है जिनकी मौत अस्पताल में हुई है।”

इसके अलावा सोशल मीडिया में उच्च मध्यवर्ग तो अपनी जरूरत के संदेश भेज देता है लेकिन न्यूनतम आय वर्ग और गरीबी की रेखा से नीचे जीवन वाले लोगों के पास तो यह साधन भी नहीं है। 2 मई को दिल्ली में 20, 394 कोरोना पॉजिटिव पाए गए और पॉजिटिविटी रेट 28.33 फीसदी था, यानी हर तीसरा आदमी जो टेस्ट करा रहा था कोरोना पॉजिटिव पाया गया। कोरोना केस बढ़ने के साथ ही दिल्ली में ऑक्सीजन की खपत और मांग भी बढ़ी है, जिसके चलते ऑक्सीजन और सिलेंडर की कालाबाजारी भी हो रही है और इनके दाम आसमान छू रहे हैं।

दक्षिण दिल्ली के एक ऑक्सीजन सप्लायर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “huns 10 से 15 लीटर का सिलेंडर 2500 से 350 रुपए में मिलता था और रीफिल 250 रुपए में होता था, लेकिन अब रीफिल ही 4000 रुपए में हो रहा है और सिलेंडर 35,000 का है। इसी तरह 50 लीटर का सिलेंडर 7500 रुपए से ज्यादा का नहीं होता था लेकिन अब इसके दाम दस गुना बढ़ गए हैं। मैं रीफिल के पैसे नहीं लेता। जब से यूपी और हरियामा ने सप्लाई रोकी है तब से दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी हो गई है। मैं बमुश्किल दूसरे राज्यों से सप्लाई ला पा रहा हूं। मेरी दुकान पर दोपहर होते होते सप्लाई ख्तम हो जाती है।”

कोविड से लड़ने की दवाएं, अस्पताल बेड और ऑक्सीजन आदि का डेटा रखने वाले एक वॉलंटियर अविक रॉय ने बताया, “सिलेंडर मिलना तो एकदम मुश्किल हो गया है। सभी जगह ऑक्सीजन खत्म हो गई है। रीफिल स्टेशन खुले हैं लेकिन वे मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऑक्सीजन सप्लाई के लिए सरकार की कोई हेल्पलाइन नहीं हैष अब तो लोग ऑक्सीजन कैन आदि की तलाश में भटक रह हैं। इससे कुछ देर की ही राहत मिलती है।

नारायणा के उद्योगपति जी एस गिल जो वॉलंटियर प्रोग्राम चलाते हैं, बताते हैं कि उन्होंने दोस्तों के साथ मिलकर आसपास के गरीब इलाकों में ऑक्सीजन थेरेपी शुरु की है। उन्होंने बताया, “मैंने इलाके में 50 सिलेंडर दान किए हैं। मुझे हर दिन डेढ़ सौ से ज्यादा फोन आते हैं जिनमें से आधे से अधिक ऑक्सीजन के लिए होते हं। हमने कुछ ऑक्सीजन सप्लायर से बात की है ताकि लोग धोखाधड़ी से बच जाएं।”

इसी तरह का प्रोग्राम विपुल पांधी भी चलाते हैं। उन्होंने 24 घंटे वाली ऑक्सीजन हेल्पलाइन शुरु की है। उनके साथ 40 लोग जुड़े हैं उन्होंने बताया, “हमारे वॉलंटियर्स शिफ्च में काम करते हैं फोन अटेंड करते हैं। हमें पहले दिन 11-1200 कॉल आईं जो अब बढ़कर 3200 कॉल तक पहुंच गई हैं। इससे पता चलता है कि कितनी दिक्कत है। सरकार गायब है और हम जैसे लोग जितनी मदद कर सकते हैं कर रहे हैं।”

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्राय के सचिव राजेश भूषण के मुताबिक देश में हर रोज 7500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की सप्लाई है, इनमें से 15 फीसदी हेल्थकेयर पर खर्च होती है बाकी उद्योगों में खर्च होती है। लेकिन कोरोना की लहर के दौरान 90 फीसदी ऑक्सीजन सिर्फ मेडिकल इस्तेमाल पर ही खर्च हो रही है।

जमीनी हकीकत इतनी भयावह होन के बावजूद दिल्ली सरकार ने आखिरकार माना है कि उन्होंने ऑक्सीजन की मांग करते हुए लोगों की जरूरतों का पूरा ध्यान नहीं रखा। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मालिनी ऐसोला बताती हैं कि, “दिल्ली हाईकोर्ट में इस बात पर लंबी बहस हुई कि कैसे होम आईसोलेशन वाले लोगों को ऑक्सीजन सप्लाई सुनिश्चित की जाए। लेकिन इसे फिलहाल छोड़ दिया गया क्योंकि दिल्ली को अस्पतालों की जरूरत भर की भी ऑक्सीजन सप्लाई नहीं मिल रही है। फिलहाल दिल्ली को 490 मीट्रिक टन ऑक्सीजन देने का प्रावधान किया गया, जिसे बाद में 590 मीट्रिक टन कर दिया गया, लेकिन दिल्ल की जरूरत तो 700 मीट्रिक टन है। अस्पताल लगातार ऑक्सीजन कम होने के मैसेज भेज रहे हैं।” ऐसोला उस सिटिज़न ग्रुप की सदस्य हैं जो मरीजों के लिए अस्पताल बेड, दवाएं और ऑक्सीजन की व्यवस्था करने की कोशिश करता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 27 अप्रैल को कहा था, “ऐसा लगता है कि अस्पतालों को दी जाने वाली सप्लाई को रोक कर घरों में इलाज करा रहे लोगों को दी जानी चाहिए। इस पर दिल्ली सरकार ने कहा था, कि यह हमारे लिए बहुत ही असमंजस की स्थिति है, किसी एक को ऑक्सीजन देंगे तो किसी अन्य को नहीं मिलेगा।” इसके बाद 29 अप्रैल को फिर हाईकोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली के अस्पतालों को हर दिन 704 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत है। इसमें घरों पर इलाज कराने वालों की जरूरत शामिल नहीं है।

ऐसोला बताती हैं, “घरों वाले मरींजों की ऑक्सीजन जरूरत पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है। पहले एक विचार आया था कि इसके लिए ऑक्सीजन सप्लाई का अलग तरीका अपनाया जाए, लेकिन उस पर अमल नहीं हो सका।”

पहले तो लोगों को निजी सिलेंडर को जब्त किया जा रहा था और बॉर्डर के बाहर से सप्लाई रुक गई थी। लेकिन कोर्ट का निर्देश आया कि न तो सिलेंडर को जब्त किया जा सकता है और न ही दवाओं को रोका जा सकता है, भले ही वह ब्लैक मार्केट से ही क्यों न आए हों। कोर्ट ने कहा था कि इन्हें जब्त कर लिया, लेकिन इनकी तो जरूरत है, इन्हें तुरंत सर्कुलेशन में लाना चाहिए और मामले की जांच फोटो के आधार पर हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जिन लोगों ने ब्लैक मं सिलेंडर खरीदे थे उनसे जांच में सहयोग की अपील की जा सकती है।

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