केजरीवाल जी, सीसीटीवी कैमरे तो लगा दिए रिकॉर्ड संख्या में, लेकिन क्या इससे हो पा रही है दिल्ली वालों की सुरक्षा

इस साल के पहले छह महीनों में दिल्ली की सड़कों पर होने वाले अपराधों में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी इजाफा हुआ है। इसी अवधि में बलात्कार के मामले 43 फीसदी बढ़े और छेड़खानी के 1100 मामले भी दर्ज किए गए हैं। साथ ही चेन खींचने आदि के मामले भी बढ़े हैं।

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फोर्ब्स ने अपने आंकड़ों के आधार पर जो सूची अगस्त के आखिरी हफ्ते में जारी की है, उसमें बताया है कि दुनिया भर के शहरों में सार्वजनिक जगहों पर जितने सीसीटीवी लगे हैं, उनमें दिल्ली का स्थान पहला है। प्रति वर्ग किलोमीटर में लगे सीसीटीवी के हिसाब से यह आंकड़ा निकाला गया है। फोर्ब्स ने 150 शहरों में लगे सीसीटीवी के विश्लेषण के बाद यह रैंकिंग तय की है।

ये आंकड़े सामने आने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर अपनी पीठ यह कहकर थपथपाई कि ‘यह बताने में गर्व महसूस हो रहा है कि प्रति वर्ग किलोमीटर सीसीटीवी लगाने में दिल्ली ने शंघाई, न्यूयॉर्क और लंदन को पीछे छोड़ दिया है।’ दिल्ली में प्रति वर्ग किलोमीटर में 1,826.6 सीसीटीवी लगे हैं जबकि चेन्नई में 609.9 कैमरे लगे हैं और उसका स्थान तीसरा है जबकि मुंबई में 157.4 कैमरे लगे हैं और उसका स्थान 18वां है।

लेकिन क्या ये कैमरे लगा देने भर से दिल्ली ज्यादा सुरक्षित हो गई है, खास तौर से महिलाओं और बच्चों को लेकर? सीसीटीवी लगाने का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा है लेकिन इससे आगे बढ़कर क्या हम इन कैमरों के जरिये राष्ट्रीय राजधानी में नागरिक सुविधाओं की स्थिति की बेहतर मॉनिटरिंग कर पा रहे हैं? सीसीटीवी फुटेज के आधार पर बाद में अपराधी या दोषी व्यक्ति की पहचान के बारे में पुख्ता साक्ष्य रखने के अतिरिक्त हम इनकी मॉनिटरिंग के जरिये तत्काल सहायता की कितनी व्यवस्था कर पा रहे हैं? इन सीसीटीवी की मॉनिटरिंग करते हुए कितने ऐसे लोगों या क्षेत्रों की मदद करने में सफलता मिली है जिन्हें आपातकालीन मदद की जरूरत तो थी लेकिन वे किसी भी वजह से सूचना देने की स्थिति में नहीं थे?

केजरीवाल जी, सीसीटीवी कैमरे तो लगा दिए रिकॉर्ड संख्या में, लेकिन क्या इससे हो पा रही है दिल्ली वालों की सुरक्षा

दिल्ली में ऐसा कुछ हो पा रहा है, इस पर संदेह होने के कई कारण हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल के पहले छह महीनों में दिल्ली की सड़कों पर होने वाले अपराधों में पिछले साल यानी 2020 के मुकाबले 40 फीसदी इजाफा हुआ है। हो सकता है ऐसा पिछले साल लगे लॉकडाउन के कारण रहा हो। इसके अलावा इसी अवधि में बलात्कार के मामलों में भी 43 फीसदी की वृद्धि हुई है। वहीं छेड़खानी और महिलाओँ पर हमले के 1100 मामले भी दर्ज किए गए हैं। साथ ही चेन खींचने आदि के मामले भी बढ़े हैं।

आखिर इस सबको क्या सिर्फ सीसीटवी कैमरे लगाकर रोका जा सकता है?


वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ और महिला अधिकार एक्टिविस्ट डॉ. किरण अग्रवाल का कहना है कि ‘दरअसल, सीसीटीवी लगाने का मसला केजरीवाल की पुरानी धुन है। मुझे याद है कि मैं निर्भया कांड की बरसी के मौके पर 16 दिसंबर की एक बैठक में शामिल थी जहां वह और भाजपा के नेता इस मुद्दे पर झगड़ पड़े थे और मुख्यमंत्री यह कहते हुए वॉकआउट कर गए थे कि जब तक सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी नहीं होंगे, महिलाएं और बच्चे सुरक्षित नहीं हो सकते।

और आज हम कहां हैं? सीसीटीवीलगाने के मामले में आप नंबर-1 हो गए हैं लेकिन दिल्ली पुलिस खुद मान रही है कि दिल्ली में अपराध की दर सबसे अधिक हो गई है।’ वह कहती हैं, ‘कैमरे लगाते जाना कोई समाधान नहीं है। निदान ऐसी व्यवस्था है जहां कानून- व्यवस्था प्राथमिकता है। मैं अभी कुछ दिनों के लिए लीबिया में थी। वहां अपराध की दर लगभग नगण्य है क्योंकि लोग जानते हैं कि अगर उन्होंने किसी किस्म का अपराध किया, तो उन्हें कोई नहीं बचा पाएगा।’

और यह सब जानते हैं कि असली हाल क्या है, इसलिए वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउन्टेंट अभिजीत के इस किस्से से शायद ही किसी को आश्चर्य होः ‘दक्षिण दिल्ली में मेरे पड़ोस में डकैती हो गई। मैंने और आरडब्ल्यूए के लोगों ने पुलिस से संपर्क किया और उन्हें सीसीटीवी के फुटेज उपलब्ध कराए। इसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस ने डकैतों की पहचान कर ली और सम्मानजनक समझौते के लिए बुला लिया। इसलिए, इसे इस तरह कहें कि सब खुश हो गए। सीसीटीवी निर्माता, कानून बनाने वाले, कानून तोड़ने वाले, कानून की सुरक्षा करने वाले और मीडिया- सब।’


रिटायर हो चुके कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि बीट कॉन्स्टेबल का कोई विकल्प नहीं है। ट्रैफिक और क्राइम में कभी डीसीपी रहे एक अधिकारी ने कहाः ‘कैमरे हैं लेकिन पुलिस वाले की मौजूदगी का क्या? कैमरों की वजह से मेट्रो सुरक्षित नहीं, वहां सुरक्षा इसलिए है कि हर मेट्रो स्टेशन पर सुरक्षा कर्मी हैं।’ मुझे याद आता है कि डीसीपी (क्राइम) रहे मैक्सवेल परेरा ने एक बार मुझसे अपराध की औसत दर को संख्या से जोड़ने के भ्रम में न पड़ने की बात कही थी। आज के संदर्भ में कहें, तो इसका मतलब तकनीकी तौर पर प्रति मील पर कैमरों की संख्या से अपराध की संख्या कम नहीं होगी बल्कि यह कम होगी प्रति व्यक्ति कैमरे की संख्या के आधार पर। उदाहरण के लिए, लंदन में औसतन हर 13 व्यक्ति पर एक कैमरा है। सीसीटीवी लगाने को लेकर फोर्ब्स सूची में निचले पायदान पर होने के बावजूद इसीलिए वहां अपराध की दर काफी नियंत्रित है।

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