अजित पवार गुट के विधायकों का असमंजस, 'हम इधर जाएं या उधर जाएं, बड़ी मुश्किल में हैं कि किधर जाएं...'

महाराष्ट्र विधानसभा में इन दिनों अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है। शरद पवार से छिटकर कर अलग गुट बनाने वाले अजित पवार गुट के कई विधायक इस पसोपेश में हैं कि किधर जाएं। इसके कई कारण हैं, लेकिन विधानसभा में उनके कुर्सियां बदलने से हास्यास्पद हालात बन रहे हैं।

अजित पवार अपने गुट के विधायकों के साथ 17 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में जाते हुए (फोटो : Getty Images)
अजित पवार अपने गुट के विधायकों के साथ 17 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में जाते हुए (फोटो : Getty Images)
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सुजाता आनंदन

राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ कहावत को महाराष्ट्र की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने एक नया ही रूप दे दिया लगता है। इस कहावत भारतीय राजनीति में पहली बार इस्तेमाल 1960 के दशक में तब हुआ था जब हरियाणा के राम नाम के विधायक ने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली थी। इसके बाद 1980 के दशक में दल-बदल विरोधी कानून पास किया गया, जिसके बाद ‘आया राम, गया राम’ पर रोक लग सके।

इस कानून के आने के बाद किसी भी विधायक या विधायकों को पार्टी से अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल होने या विलय के लिए अपनी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों का समर्थन चाहिए होगा। जबकि किसी एक विधायक को अगर पार्टी को दल बदल करना है तो उसे अपनी सीट से इस्तीफा देना होगा जहां से वह अपनी मूल पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतकर आया था, और उसे दोबारा चुनाव लड़ना होगा। दोबारा जीतने को लेकर अधिकतर आश्वस्त नहीं होते हैं, ऐसे में अक्सर वे अपनी पार्टी के विधायकों की संख्या के आधार पर दल-बदल करते हैं।

यही कारण था कि जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में पिछले साल बगावत की तो उन्होंने इस बात काध्यान रखा कि उनके साथ शिवसेना के कुल 56 में से 40 विधायकों का समर्थन हो, ताकि वे जरूरत पड़ने पर दो-तिहाई वाले नियम का उल्लंघन करते हुए न पाए जाएं।

और अब, एक साल बाद जब शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने एनसीपी से नाता तोड़ा है तो, अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि उनके साथ एनसीपी के दो-तिहाई विधायकों का समर्थन है या नहीं। जब 2 जुलाई को उन्होंने एनसीपी में अलग गुट बनाया तो उनके पास पार्टी के कुल 53 में से 32 विधायकों का समर्थन था। लेकिन दो सप्ताह बाद ही उनकी दिक्कतें शुरु हो गई जब इन 32 में से 15 विधायक महाराष्ट्र विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान सत्ता पक्ष छोड़कर विपक्षी सीटों पर जाकर बैठ गए। इसके अलावा शरद पवार खेमे के अधिकतर विधायकों समेत कम से कम 27 विधायक विधानसभा से अनुपस्थित भी रहे।


जैसे-जैसे मॉनसून सत्र आगे बढ़ा, महाराष्ट्र विधानसभा में अलग ही नजारा देखने को मिला। अजित पवार खेमे के कई विधायक कभी सत्ता पक्ष की तरफ बैठे दिखते तो कभी विपक्ष की तरफ। संभवत: उन्हें खुद अभी तक कोई भरोसा नहीं है कि आखिर वे है किस तरफ। इस तरह अजित पवार खेमे में कुल विधायकों की संख्या किसी भी समय 25 से अधिक नहीं हो पाई, क्योंकि अधिकांश तो सदन से गायब ही रहे।

इस बारे में विधानसभा में विपक्ष के नेता और शरद पवार खेमे के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) जीतेंद्र आह्वाड ने विधानसभा स्पीकर को पत्र भी लिखा कि सिर्फ उन्हीं विधायकों को मूल एनसीपी के बागी यानी अजित पवार गुट का माना जाए जिन्होंने सरकार में मंत्री पद की शपथ ली है, बाकी को मूल एनसीपी का ही हिस्सा माना जाए। ध्यान रहे कि शरद पवार ने जनता के बीच अपनी लोकप्रियता के दम पर अगले ही दिन बयान जारी किया था कि उन्हें उम्मीद है कि कुछ दिन बाद ही अजित पवार के साथ गए अधिकतर विधायक उनके पास वापस लौट आएंगे और अगर वे वापस नहीं आए तो वे जानते हैं कि उनका क्या करना है। इसे एक तरह से पवार की तरफ से धमकी के तौर पर भी देखा गया था।

बताना लाजिमी है कि एनसीपी के अधिकतर विधायक कारोबारी हैं और शुगर को आपरेटिव, डेरी फार्मिंग और सहकारी बैंकों आदि के धंधे में हैं। इन सभी क्षेत्रों में शरद पवार का जबरदस्त प्रभाव है। विपक्ष में होने के बावजूद इन क्षेत्रों में शरद पवार की तूती बोलती है और बीजेपी सरकार में होने के बावजूद शरद पवार के इस वर्चस्व को तोड़ने में नाकाम रही है। ऐसे में ये सारे विधायक अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर भी  पसोपेश में हैं क्योंकि इससे उनके धंधों पर गहरा असर पड़ने की आशंका है। यहां गौर करने वाली बात है कि ये सारे धंधे या कारोबार अकेले दम पर नहीं चलते, इनमें किसानों की बड़े पैमाने पर भागीदारी होती है और वे ही अपनी सहकारी संस्था का चेयरपर्सन चुनते हैं जो आमतौर पर स्थानीय विधायक या सांसद होता है।

इसलिए एक ही दिन में कई बार कुर्सियों की अदला-बदली हो रही है। ऐसे ही एक विधायक हैं मकरंद पाटिल, जिन्होंने अकेले एक ही दिन में कम से कम तीन बार विधानसभा में अपनी सीट बदली। पहले वे अजित खेमे के साथ सत्ता पक्ष की तरफ बैठे, फिर बीच में विपक्ष की तरफ चले गए और कुछ देर बाद फिर से सत्ता पक्ष की तरफ आकर बैठ गए। हालांकि अभी तक विधानसभा स्पीकर ने इस विषय में अपना फैसला नहीं सुनाया है और न ही अजित पवार गुट को मूल एनसीपी के रूप में मान्यता मिला है, ऐसे में इस विषय में कोई स्पष्टता नहीं है कि कौन कहां बैठे। विधानसभा के नियम मोटे तौर पर यह व्यवस्था देते हैं कि सत्ता पक्ष एक साथ बैठता है और इसके ठीक सामने विपक्ष बैठता है। संसद में भी ऐसी ही व्यवस्था है।


कुल मिलाकर स्थिति शिवसेना के दो-फाड़ से अलग है। शिवसेना की टूट में तो उद्धव ठाकरे ने मामले को सुप्रीम कोर्ट पहुंचाया था और 40 बागी विधायकों में से 18 को अयोग्य घोषित करने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय में विधानसभा स्पीकर को फैसला लेने का निर्देश दिया है, हालांकि स्पीकर ने अभी तक इस पर निर्णय नहीं सुनाया है। लेकिन एनसीपी के मामले में शरद पवार अलग किस्म का खेल खेल रहे हैं। उन्होंने इसके लिए कानूनी रास्ता नहीं चुना है और एक तरह से मामले को विधायकों की अंतरात्मा की आवाज़ पर छोड़ दिया है, यह एक तरह की ठंडी धमकी भी है, और एक खतरनाक खामोशी भी।

यही खामोशी अजित पवार को चिंतित कर रही है, क्योंकि मंत्री पद की शपथ लेने वाले 9 विधायकों के अलावा बाकी के सारे विधायक असमंजस में हैं कि आखिर जाएं तो कहां जाएं। पिछले सप्ताह उनकी शरद पवार के साथ मुलाकात से यही कयास लगे कि शायद उन्होंने शरद पवार को मनाने की कोशिश की, लेकिन शरद पवार ने ठंडे दिमाग से अजित और अन्य विधायकों की बातें सिर्फ सुनीं, जवाब और आश्वासन कुछ नहीं दिया।

यही वह कारण है कि अजित खेमे के विधायक विधानसभा में ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ‘आया राम, गया राम’ बने हुए हैं। यह ऐसी स्थिति है जो भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ही इससे पहले बनी हो।

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