Diwali Lakshmi Puja: दिवाली पर बन रहे हैं आयुष्मान और सर्वार्थ सिद्धि योग, इस विधि से करें मां लक्ष्मी की पूजा

दिवाली पर शुभ योगों के बीच मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। शाम को लक्ष्मी पूजन के लिए 1 घंटा 56 मिनट का शुभ मुहूर्त रहेगा।

फोटो: सोशल मीडिया
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  • दिवाली का पर्व आज शुभ योगों में मनाया जा रहा है। इस दिन आयुष्मान और सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है।

  • लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 5:53 बजे से रात 7:49 बजे तक रहेगा। पूजा के लिए कुल 1 घंटा 56 मिनट का समय मिलेगा।

  • दिवाली पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा का विधान है। पूजन की शुरुआत शुद्धिकरण, संकल्प और कलश स्थापना से की जाती है।

  • षोडशोपचार पूजा में गणेश और लक्ष्मी जी का ध्यान, स्नान, वस्त्र, चंदन, पुष्प, नैवेद्य और आरती सहित कई चरण शामिल हैं।

दिवाली का पर्व आज, 8 नवंबर को देशभर में धूमधाम से मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि दिवाली की रात शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि और धन-संपदा का आगमन होता है। इस बार दिवाली पर आयुष्मान से लेकर सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। पंडित केपी शुक्ल के अनुसार, शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और धन-संपदा की प्राप्ति हो सकती है।

दिवाली पर शाम के समय प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन किया जाता है। इस दौरान भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा का विधान है। पूजा के लिए पहले से ही सभी सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए, ताकि शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजन किया जा सके।

दिवाली 2026: लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त और तिथि

दिवाली पर लक्ष्मी पूजन के लिए शुभ मुहूर्त शाम 5:53 बजे से रात 7:49 बजे तक रहेगा। इसकी कुल अवधि 1 घंटा 56 मिनट है। इसके अलावा रात में निशिता काल और सिंह लग्न का समय भी दिया गया है।

  • लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: शाम 5:53 बजे से रात 7:49 बजे तक

  • पूजा की अवधि: 1 घंटा 56 मिनट

  • निशिता काल: रात 11:38 बजे से 9 नवंबर की सुबह 12:30 बजे तक

  • सिंह लग्न: रात 12:24 बजे से 9 नवंबर की सुबह 2:41 बजे तक

  • अमावस्या तिथि शुरू: 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे

  • अमावस्या तिथि समाप्त: 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे

  • प्रदोष काल: शाम 5:30 बजे से रात 8:08 बजे तक

  • वृषभ काल: शाम 5:53 बजे से रात 7:49 बजे तक


दिवाली पर गणेश-लक्ष्मी की पूजा कैसे करें?

दिवाली की शाम शुभ मुहूर्त में पूजा शुरू करने से पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। वहां पानी से शुद्धिकरण करने के बाद आटे से रंगोली बनाएं। अब लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर थोड़े चावल रखें। इसके बाद भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियां स्थापित करें। पूजा में गणेश जी को लक्ष्मी जी के बाईं ओर रखें। साथ ही अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित कर सकते हैं।

पूजा शुरू करने से पहले कुशा या आम के पत्तों से अपने ऊपर और आसन के नीचे जल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इस दौरान 'ऊं अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥' मंत्र का जाप करें। इसके बाद हाथ धोते हुए 'ऊं केशवाय नम:', 'ऊं माधवाय नम:' और 'ऊं नारायणाय नम:' बोलें। आसन शुद्ध करने के लिए 'ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥' मंत्र का जाप करें। इसके बाद चंदन लगाकर पूजा का संकल्प लें।

संकल्प के लिए हाथों में फूल, सुपारी, पान, नारियल, चांदी का सिक्का, मिठाई, लौंग और अक्षत रखें। इसके बाद विष्णु मंत्र के साथ अपना नाम, गोत्र और पूजा का उद्देश्य लेते हुए संकल्प करें। पूजा में गणेश-लक्ष्मी को सभी सामग्री अर्पित करने के बाद कलश स्थापना करें।

कलश स्थापना से लेकर गणेश-लक्ष्मी आरती तक की विधि

कलश स्थापना के लिए सबसे पहले कलश पर स्वास्तिक बनाएं और उसके गले में मौली बांधें। इसके ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश में जल, गंगाजल, सुपारी, दूर्वा, अक्षत और सिक्का डालें। इसके बाद ढक्कन बंद करके उसमें गेहूं या चावल भर दें। एक नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलावा बांधें और कलश के ऊपर स्थापित करें। दोनों हाथों में फूल लेकर वरुण देव का आह्वान करें। इसके बाद फूल, माला और भोग अर्पित करें।

कलश स्थापना के बाद भगवान गणेश की पूजा शुरू करें। सबसे पहले हाथ में फूल लेकर उनका ध्यान करें और 'गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।' मंत्र का जाप करते हुए फूल अर्पित करें। इसके बाद गणेश जी को पाद्य, अर्घ्य, स्नान और आचमन कराएं। चंदन, सिंदूर, दूर्वा और बिल्वपत्र चढ़ाएं। उन्हें वस्त्र और आभूषण अर्पित करें। फिर मिठाई, प्रसाद और पान-सुपारी चढ़ाकर पुष्पांजलि दें।

इसके बाद माता लक्ष्मी का ध्यान और पूजन करें। हाथ में अक्षत लेकर मां का आह्वान करें और प्रतिष्ठा के बाद उन्हें स्नान कराएं। इसके बाद रक्त चंदन, सिंदूर, फूल और माला अर्पित करें। मां लक्ष्मी को लाल वस्त्र पहनाकर अंग पूजा करें। इसमें माता के चरणों से लेकर सिर तक अलग-अलग मंत्रों के साथ अक्षत अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद अष्टसिद्धियों और अष्टलक्ष्मी की पूजा करें। मां को मिठाई, नैवेद्य, आचमन और पान-सुपारी अर्पित करें। अंत में पुष्पांजलि और धूप-नैवेद्य चढ़ाएं।

माता लक्ष्मी की पूजा के बाद भगवान कुबेर सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा करें। सबसे आखिर में भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और कुबेर की आरती करें। पूजा पूरी होने पर जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें।

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