डूसू चुनाव आज: युवाओं के राजनीतिक रूझान और भविष्य के नेताओं की झलक होंगे नतीजे

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में आमतौर पर गहरी दिलचस्पी रहती है और इससे न सिर्फ युवाओं के राजनीकि रुझानों का अनुमान लगता है बल्कि भविष्य के नेताओं की झलक भी सामने आती है। डूसू चुनाव बुधवार 12 सितंबर को हैं और नतीजे गुरुवार को आएंगे।

फोटो: @NSUI
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दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव हमेशा से प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखे गए हैं और राजनीतिक दलों की इसमें गहरी रुचि रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लड़ने वाले कई उम्मीदवार आगे चलकर राजनेता बने हैं और उन्होंने मुख्य राजनीतिक दलों में अच्छी जगह भी बनाई है। सत्ता के गलियारों में मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली से लेकर कांग्रेस की युवा प्रवक्ता रागिनी नायक तक, कई ऐसे चेहरे हैं जो कभी डूसू के प्रतिनिधि रहे हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय माकन , विज्ञान की पढ़ाई करने वाले पहले ऐसे छात्र थे, जो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गए थे। अजय माकन ने बताया कि, “1985 में साइंस का कोई भी विद्यार्थी चुनावों में नहीं जाता था। मैं पहला ऐसा छात्र था जिसने चुनाव लड़ा और जीता।”

इनके अलावा आप नेता अलका लांबा 1995 में डूसू अध्यक्ष रह चुकी हैं। इनके अलावा विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता, अमृता धवन, विजय जौली, सतीश उपाध्याय और नुपुर शर्मा ऐसे चेहरे हैं जो छात्र राजनीति से मुख्य धारा की राजनीति में आए हैं।

दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय सदा से ही छात्रों के लिए राजनीति की नर्सरी रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में करीब सवा लाख छात्र पढ़ते हैं और इनमें से करीब 50 फीसदी वोट डालते हैं। विश्वविद्यालय छात्र संघ के अलावा हर कॉलेज अपनी एक छात्र परिषद का चुनाव भी कराता है।

इस बार के चुनाव में मुख्य रूप से चार छात्र संगठन हैं जो अलग-अलग राजनीतिक दलों के समर्थन से मैदान में हैं। इनमें बीजेपी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया या एनएसयूआई, आम आदमी पार्टी का छात्र संगठन छात्र युवा संघर्ष समिति या सीवाईएसएस और वाम दलों की मुख्य छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन या आइसा।

एक दो मौके पर स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया या एसएफआई का प्रदर्शन ठीकठाक रहा है, जबकि आमतौर पर मुख्य मुकाबला एनएसयूआई और एबीवीपी के बीच ही रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के इस बार के चुनाव में सीवाईएसएस और आइसा मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। ज़ाकिर हुसैन कॉलेज के पूर्व छात्र सैयद सुहेब कहते हैं कि, “जिस तरह दिल्ली का मध्यवर्ग कांग्रेस और बीजेपी के बीच बंटा हुआ है, वैसे ही छात्र भी बंटे हुए हैं।“ वामदलों को लेकर छात्रों की अलग रुचि है तो एससी-एसटी और ओबीसी छात्रों का रुझान आम आदमी पार्टी की सीवाईएसएस के प्रति है।

दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व छात्र और कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अली मेहदी कहते हैं कि, “जो छात्र वाम विचारधारा के होते हैं वे हमेशा वाम दलों की छात्र इकाई को ही वोट देते हैं, ऐसे में इससे एनएसयूआई को कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन ओबीसी और एससी-एसटी छात्र एबीवीपी को हराना चाहते हैं, और सिर्फ एनएसयूआई ही एबीवीपी को हरा सकती है।”

वहीं दिल्ली के पूर्व मंत्र अरविंदर सिंह लवली को भरोस है कि इस बार एनएसयूआई की जीत निश्चित है क्योंकि बढ़ती बेरोजगारी और लगातार बढ़ते तेल के दामों से छात्र बीजेपी से नाराज हैं। लेकिन बीजेपी सांसद और एबीवीपी के सलाहकार रमेश बिधूड़ी एबीवीपी की जीत को लेकर आश्वस्त हैं। उनका कहना है कि, “युवा में प्रधानमंत्री मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता है, ऐसे में छात्र एबीवीपी को ही वोट देंगे।“ इस सबके बीच आप की छात्र इकाई सीवाईएसएस का मानना है कि आइसा के साथ मिलकर वे सबकी छुट्टी कर देंगे।

सीवाईएसएस और आइसा के हाथ मिलाने से इस बार का डूसू चुनाव दिलचस्प हो गया है। 2015 के विधानसभा चुनावों में आप ने 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था और उसे उम्मीद है कि डूसू चुनाव में भी वह विजयी होगी, लेकिन वह तीसरे नंबर पर आई थी। 2016 और 2017 के चुनाव में सीवाइएसएस ने लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू न होने का बहाना बनाते हुए यह कह कर हिस्सा नहीं लिया था कि डूसू चुनाव में पैसा और पॉवर दोनों का इस्तेमाल होता है। लेकिन, इस बार सबको चौंकाते हुए उसने वह मैदान में है, जबकि नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

माना जा रहा है कि चुनावों में सीवाईएसएस की मौजूदगी से एबीवीपी को फायदा होगा। 2015 में भी सीवाईएसएस के मैदान में होने के चलते एबीवीपी ने डूसू की चारों सीटें बड़े अंतर से जीती थीं। लेकिन, पिछले दो साल के दौरान जब सीवाईएसएस मैदान में नहीं थी, बाजी एनएसयूआई के हाथ रही थी। लेकिन यह भी तथ्य है कि आम आदमी पार्टी की मूल ताकत रहे युवा अब उसके साथ नहीं हैं, और डूसू चुनावों में यह फैक्टर प्रभावी हो सकता है। वहीं एनएसयूआई ने आइसा-सीवाईएसएस की काट के लिए इस बार एक दलित छात्रा को भी मैदान में उतारा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने मुख्य चुनाव अधिकारी के साथ ही सभी कॉलेजों के लिए टीम का गठन किया है, ताकि चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से हो सकें। तमाम प्रबंधों के बावजूद एबीवीपी के उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार शक्ति सिंह ने कथित तौर पर ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में मारपीट की। कॉलेज के प्रधानाचार्य मसरुर अहमद बेग को पुलिस बुलानी पड़ी।

डूसू चुनाव के लिए दोनों कैंपस के कॉलेजों में सुबह साढ़े आठ बजे से शाम साढ़े सात बजे तक मतदान होगा। इन चुनावों के नतीजे 13 सितंबर गुरुवार को आएंगे जो प्रतिबिंब होंगे शहरी युवाओं के राजनीतिक रुझानों के। यूं भी दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में आमतौर पर गहरी दिलचस्पी रहती है और इससे न सिर्फ युवाओं के रुझानों का अनुमान लगता है बल्कि भविष्य के नेता भी इन्हीं चुनावों से निकलते हैं।

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