उत्तर प्रदेश चुनाव: ‘मोदी’-‘योगी’ से तो पहले ही परेशान थे लोग-किसान, अब ‘वानर सेना’ का आतंक और तबाही

पूरे यूपी में गांव से जुड़े किसी भी व्यक्ति से बात करें, तो वह 'योगी-मोदी' और 'वानर सेना' की बात करता है। 'योगी-मोदी', मतलब आवारा गाय, बैल, सांड; और 'वानर सेना', मतलब जंगलों-बगीचों के खत्म होते जाने से बंदरों का लोगों का गांवों में जीना मुहाल कर देना।

कम लोगों को मालूम होगा कि 1942 की अगस्त क्रांति के समय बलिया तीन दिनों तक आजाद रहा था। स्वतंत्रता सेनानी चित्तू पांडे को अंग्रेजों को जेल से बाहर निकालना पड़ा और शासन व्यवस्था उनके सुपुर्द कर दी गई। इसी वजह से उन्हें बलिया का पहला कलेक्टर भी कहा जाता है। उनके गांव में भी आवारा पशुओं से बचाव के लिए इस तरह बाड़बंदी की गई है।
कम लोगों को मालूम होगा कि 1942 की अगस्त क्रांति के समय बलिया तीन दिनों तक आजाद रहा था। स्वतंत्रता सेनानी चित्तू पांडे को अंग्रेजों को जेल से बाहर निकालना पड़ा और शासन व्यवस्था उनके सुपुर्द कर दी गई। इसी वजह से उन्हें बलिया का पहला कलेक्टर भी कहा जाता है। उनके गांव में भी आवारा पशुओं से बचाव के लिए इस तरह बाड़बंदी की गई है।
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दिवाकर / नागेंद्र

उत्तर प्रदेश में अब चुनाव होने हैं। पश्चिम यूपी का किसान खासा आंदोलित है और माना जा रहा है कि किसान का संघर्ष इस बार निर्णायक भूमिका निभाएगा। तो दिवाकर ने सोचा, यू पी के पूर्वी इलाकों के गांवों में जाया जाए। लखनऊ पहुंचने पर नागेन्द्र का साथ मिला। इन दोनों ने जो देखा-समझा, उससे शायद जमीनी हालात का कुछ अंदाजा मिले। फोटो भी उन दोनों की हैं।

लगभग पूरे यूपी में सबसे बड़ी परेशानी क्या है?

कोरोना से हुई मौतों के खौफ से लोग उबरे नहीं हैं? नहीं। अधिकांश जगहों पर मास्क लगाए इक्का-दुक्का लोग ही दिखते हैं। जो दिखे, समझिए, जरूर कहीं दूसरी जगह से आए होंगे।

कोरोना से जो रोजी-रोजगार गया, उससे लोग तबाह हैं? नहीं। रोजगार न होने की बात लोग करते तो हैं, पर उनके लिए यह सबसे बड़ी समस्या नहीं है।

महामारी शुरू होने पर मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, बेंगलुरु, पंजाब वगैरह से लाखों लोग जान-बचाकर पांव-पैदल गांव लौटे थे, उनका बोझ अब भी परिवार वाले उठा रहे? नहीं। इनमें से करीब 80 प्रतिशत लौट चुके हैं, बाकी में से अधिकांश ने या तो यहीं कोई रोजगार पा लिया है या लौटने को हैं।

महंगाई? परेशान कर रही है, खूब कर रही है। पर जैसा कि होता है, लोगों ने कम तेल, कम सब्जी-जैसे विकल्पों से काम चलाना सीख लिया है।

तब क्या है सबसे बड़ी परेशानी? संभवतः पूरे यूपी में गांव से जुड़े किसी भी व्यक्ति से बात करें, तो वह 'योगी-मोदी' और 'वानर सेना' की बात करता है। 'योगी-मोदी', मतलब आवारा गाय, बैल, सांड; और 'वानर सेना', मतलब जंगलों-बगीचों के खत्म होते जाने से बंदरों का लोगों का गांवों में जीना मुहाल कर देना। गाजीपुर जिला मुख्यालय से करीब 38 किलोमीटर दूर पचोखर गांव का किस्सा छोटा-सा उदाहरण है। यहां के एक सक्रिय फोटो जर्नलिस्ट के अनुरोध पर जिलाधिकारी ने यहां 300 बंदरों को पकड़वाकर ‘पास के जंगलों’ में भिजवा दिया। इसके दो महीने बाद हमलोग इस गांव में बैठे, तो लोग बंदरों के ताजा उत्पात के किस्से सुनाने लगे- अब भी न जाने कितनी फसल खा रहे हैं; कितने लोग हाथ-पांव तुड़वा बैठे हैं; कितनों के कपड़े फाड़ चुके हैं। बंदरों के डर से शहरी अपार्टमेंट की तरह लोग कपड़े घरों में ही सुखाते हैं। यहां से अस्पताल 15 किलोमीटर दूर है। गांव में लगभग 8,000 लोग हैं जिनमें दलित जातियों के 4,000, भूमिहार 2,000, मुसलमान 1,200 होंगे। लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। पानी में आर्सेनिक की समस्या तेजी से बढ़ रही है, उसका भी कोई उपाय नहीं। थोड़ा संपन्न लोग बॉटल्ड वाटर मंगवाने लगे हैं। इतने बड़े गांव में भी एक एटीएम खुलवाने के लिए लोग यहां-वहां दौड़ रहे हैं।

यहां से नक्सर करीब 18 किमी दूर है। नक्सर मीर राय और नक्सर नवाजू राय- दो गांव हैं। नक्सर नवाजू राय में रिटायर कॉलेज शिक्षक डॉ. हरीशचंद्र राय ने हमें ठीक से बताया कि खेती से कैसे फायदा हो सकता है और अगर सरसों की बंपर पैदावार के बाद इसके तेल की कीमत बढ़ रही है, तो इससे कुल मिलाकर फायदा किसानों का ही हो रहा है। लेकिन उन्होंने अपनी बात यह कहते हुए खत्म की कि परिवार टूटते जा रहे हैं इसलिए खेती अब फायदे की चीज नहीं रही। तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग करते हुए दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों से उनकी कोई सहानुभूति नहीं है, फिर भी कहते हैं कि सरकार को व्यवस्था करनी चाहिए कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे किसी की फसल न बिके।

यहां बैठे बुजुर्गों ने भी कहा कि जिस तरह बड़े-बुजुर्ग लोग परिवार के लिए अब बोझ हो गए हैं, उसी तरह पशुओं के साथ भी बर्ताव किया जा रहा है ‘जो उचित भी है’। आखिर, दूध न देने वाली एक गाय पर महीने में कम-से-कम 5,000 रुपये तो खर्च हो ही जाते हैं। उनकी बीमारी पर भी हजार-दो हजार निकल जाते हैं। बैलगाड़ी, हल वगैरह प्रचलन में न होने से बैल किसी काम के नहीं। ऐसे में ‘समय के अनुसार हिन्दू मानसिकता भी बदलनी चाहिए’।


गोरखपुर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, मऊ, संत कबीरनगर के जिस भी गांव में हम जा पाए, लोगों ने कहा कि जब से योगी आदित्यनाथ सरकार ने गो-तस्करी रोकी है, वे आवारा पशुओं से तबाह हो गए हैं। इसका दो ही तोड़ वे निकाल पाए हैं- एक, डंडे लेकर इन्हें अपने खेत से भगाएं; दो, अपने गांव से आवारा पशु पकड़कर मुंह-अंधेरे दूसरे गांव में छोड़ आएं। हर गांव ऐसा ही कर रहा है। प्रख्यात साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के गांव- बलिया के ओझवालिया में प्रधान विजय लक्ष्मी वर्मा के पति राजेश वर्मा के अनुसार, ऐसे ‘बेकार’ पशुओं को लोग गंगा दियारा पर जाकर छोड़ रहे हैं। एक ने धीरे से कहा कि ‘गांव में छोटा-मोटा पुस्तकालय होता, तो बच्चे जानते भी कि पहले पशुओं को भी कितने कद्र से रखा जाता था!’

कैसे चलें गोशालाएं

कहां जाएं पशु: 1934 में स्थापित बलिया का श्री लोकमान्य तिलक गोशाला एक उदाहरण भर है कि गोवंश की रक्षा में योगी सरकार की कोई रुचि नहीं
कहां जाएं पशु: 1934 में स्थापित बलिया का श्री लोकमान्य तिलक गोशाला एक उदाहरण भर है कि गोवंश की रक्षा में योगी सरकार की कोई रुचि नहीं

योगी सरकार ने आवारा पशुओं की समस्या समाधान के लिए जगह-जगह गोशाला खोलने की घोषणा की थी। कुछ खुलीं भी लेकिन अधिकांश बंद ही हो गईं। जो हैं, उनका हाल खुद ही समझने लायक है। देवरिया के पिपरा चंद्रभान गांव के वृहद गोरसंरक्षण केन्द्र की देखभाल भगवान दास चैरिटेबल ट्रस्ट करता है। पहुंचने के लिए एक किलोमीटर तक पैदल रास्ता ही है क्योंकि संपर्क सड़क, बल्कि पगडंडी पर मोटरसाइकिल के अलावा कुछ नहीं चल सकता। इलाके के कई घरों में शौचालय हैं, पर इन पंगडंडियों पर शौच से बचना हमारे लिए तो एक कलाकारी ही थी। हम पहुंचे तो यहां 380 मवेशी थे। पशु अधिकारियों का दल भी मौजूद था। सब मिले, पर मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी एक कमरे में आराम कर रहे थे, उनसे मुलाकात न हो पाई। खैर। गांव में लोग घेर-घारकर किसी पशु को पकड़ लें और चंदा इकट्ठा कर ढोकर ले जाने के लिए वाहन का इंतजाम कर दें, तब भी यहां तक पशु लाना कितना जोखिमभरा है, इसे जानना चाहिए। एक कर्मचारी ने हाल की ही एक घटना बताई, ‘गांव वालों ने फोन किया, तो मैं मौके पर पहुंच गया। लोगों ने वाहन में पशु को ले जाते वक्त राजी-खुशी विदा किया। हम आगे बढ़े कि पुलिस वाहन ने हमें रोक लिया। भीड़ इकट्ठा हो गई। तरह-तरह के सवाल- कौन हो; कहां से ला रहे हो; कहां से खरीदी; कितने में खरीदी आदि-इत्यादि। खैर, केन्द्र का परिचय पत्र दिखाया, तो पुलिस वालों ने किसी तरह लोगों को शांत कराया। कई अफसरों को फोन मिलाया। पशुपालन अधिकारियों ने पुष्टि की, तब हमें छोड़ा गया। ऐसा अक्सर होता है।’

इस केन्द्र को 30 रुपये मवेशी रोजाना सरकार की तरफ से मिलते हैं। वैसे, कुछ लोगों ने बताया कि राज्य की कुछ गोशालाओं में यह रेट 36 रुपये भी है। इतने में एक शाम भी एक पशु को आहार नहीं दिया जा सकता। इन पशुओं की देखभाल के लिए 6,000 से 8,000 रुपये मासिक वेतन पर 14 लोग काम करते हैं। ट्रस्ट मदद न करे, तो हर शाम मुश्किल हो। दिक्कत एक और है। ये पशु गांव में थे तो हरा चारा खाते थे। गोशालाओं में सूखा चारा मिलता है। खानपान के इस बदलाव से उनका पेट फूल जाता है और कई बार अफरा रोग की वजह से कुछ घंटों में ही मौत तक हो जाती है। गोबर भी गोशालाओं के लिए जान के जंजाल हैं। इसी केन्द्र में लगभग एक क्विंटल गोबर रोज जमा हो जाता है जिसे उठाने, ले जाने का कोई इंतजाम नहीं हो पा रहा।

बलिया के राजपूत नेवड़ी में श्रीलोकमान्य तिलक गोशाला समिति के सदस्य अंबादत्त पांडे ने बताया कि कुछ साल पहले तक गोबर पाथने वाले मिल जाते थे जो आधा-आधा गोयठा (उपला-कंडा) कर लेते थे। अब तो वे भी नहीं मिलते। ‘हम तो चाहते हैं कि इसे कोई फ्री में ले जाए।’ यहां भी गोबर इधर-उधर पड़ा मिला। सामुदायिक सहायता के बारे में पूछने पर मुस्कुराकर बोले, ‘पर्व-त्योहार पर छोटे पॉलीथिन बैग में चोकर लेकर आने वाले भी बदले में दो-चार गोयठा मांग लेते हैं। लोग गोशाला से फूल तोड़ते हैं; न दो, तो झगड़ा करते हैं लेकिन कोई एक पौधा नहीं लगाता।’ उन्होंने बताया कि ‘अब हमलोगों ने नगर निगम वगैरह से आवारा पशु लेना बंद कर दिया है। एक पशु मर जाए, तो पोस्टमॉर्टम से लेकर अंतिम संस्कार तक कम-से-कम 2,000 रुपये खर्च हो जाते हैं। मारवाड़ी समाज मदद न करे, तो पशुओं की देखभाल असंभव ही है।’

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