फेल साबित हुई मोदी सरकार की रोजगार योजनाएं, गाजे-बाजे के साथ शुरू तो हुईं पर नतीजे सिफर

मोदी सरकार द्वारा संसद में रखे गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि सरकारी योजनाओं से रोजगार पैदा होने का आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले इस साल कम रहेगा। ये भी सामने आया कि रोजगार सृजन के नाम पर शुरू मोदी सरकार की तमाम योजनाओं के अपेक्षित परिणाम नहीं नजर आ रहे।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

देश में विकराल होती बेरोजगारी की समस्या पर मोदी सरकार भले अपनी कई योजनाओं को गिनाकर रोजगार बढ़ाने के दावे करे, लेकिन हकीकत में ऐसा हो नहीं रहा है। खुद मोदी सरकार द्वारा संसद में पेश आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस साल सरकारी योजनाओं से रोजगार पैदा होने का आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले कम रहने जा रहा है। सरकार के जवाब से ये भी सामने आया कि रोजगार सृजन के नाम पर शुरू मोदी सरकार की तमाम योजनाओं के अपेक्षित परिणाम नहीं नजर आ रहे।

दरअसल संसद में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री संतोष गंगवार की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक साल 2018-19 में रोजगार सृजन की सरकारी योजनाओं से 5.9 लाख रोजगार पैदा हुए। ऐसे में चिंता की बात ये है कि वर्तमान वित्तवर्ष में 31 दिसंबर तक रोजगार का आंकड़ा केवल 2.6 लाख तक ही पहुंच सका। हालात से साफ है कि अब बाकी के 3 महीनों में यानी मार्च तक इसका पिछले साल के स्तर तक पहुंच पाना भी संभव नहीं है। हालांकि उससे पहले साल 2017-18 में सरकारी योजनाओं से 3.9 लाख लोगों को रोजगार मिला था।


दरअसल मोदी सरकार की बहुप्रचारित योजना प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के अपेक्षित परिणाम नहीं दिख रहे हैं। हालांकि पीएमईजीपी सीधे तौर पर किसी तरह की नौकरी देने की योजना नहीं है। दरअसल यह क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी योजना है, जो उद्यम या उद्योग शुरू करने में मदद के जरिये रोजगार में मदद करती है। खास बात ये है कि देश में इस योजना से मिलने वाले रोजगार की संख्या मौजूदा वित्तवर्ष में साल 2014 के बाद से सबसे कम है।

वहीं एक और फ्लैगशिप योजना राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन की बात करें तो वित्त वर्ष 2018-19 में इसके जरिये 1.8 लाख लोगों को रोजगार मिला, लेकिन इस साल जनवरी के अंत तक के आंकड़े बताता है कि अभी तक केवल 44,000 लोगों को ही इशका लाभ मिला है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के परिणाम में सबसे बड़ी गिरावट असम और जम्मू-कश्मीर में आई है, जबकि राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन का प्रदर्शन गुजरात और मध्य प्रदेश में सबसे कमजोर रहा है।

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