कासगंज हिंसा की जांच रिपोर्टः लोगों ने तो किया अमन कायम, कार्रवाई में योगी सरकार की नीयत पर सवाल

कासगंज में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय की दुकानों और मकानों को ही लूटा और जलाया गया, लेकिन दंगे के बाद गिरफ्तार 123 लोगों में से 87 लोग अल्पसंख्यक वर्ग के ही हैं।

फोटोः नवजीवन
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कासगंज में हुई हिंसा कोई सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी बल्कि यह एक प्रायोजित हिंसा थी। इस सच्चाई की पुष्टी कासगंज हिंसा से जुड़ी कई घटनाएं भी करती हैं। इस हिंसा में जहां बहुसंख्यक वर्ग की एक भी दुकान को नुकसान नहीं हुआ, एक भी मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा, वहीं इसके उलटअल्पसंख्यक वर्ग की 27 दुकानें जला दी गईं, 2 मस्जिदों को नापाक किया गया और मस्जिद के अंदर ना सिर्फ आग लगाई गई बल्कि जो कुछ भी मिला उसे लूट लिया गया। लेकिन इस पूरे दंगे को गिरफ्तारी के कोण से देखा जाए, तो हिंसा के बाद 123 लोग गिरफ्तार किए गए, जिनमें से 87 लोगों का संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से है।

इसका अर्थ यह है कि जिस समुदाय की दुकानें जलाई गईं, मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया गया, उसी समुदाय के लोग ज्यादा गिरफ्तार भी किए गए। जिस समुदाय का नुकसान नहीं हुआ, उसके लोग भी कम गिरफ्तार किए गए। यहां इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि चंदन की हत्या के संबंध में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनकी संख्या सिर्फ 23 है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि बाकी जो लोग गिरफ्तार किये गए हैं, उन्हें किस अपराध में गिरफ्तार किया गया है। क्योंकि दूसरे पक्ष का इसके अलावा कोई भी जान या माल का नुकसान नहीं हुआ है।

फोटोः नवजीवन
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रिपोर्ट जारी करते यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की जांच दल के सदस्य

इस सच्चाई का खुलासा लेक्चरर और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की सदस्य बनोज्योत्सना लाहिड़ी ने किया। गौरतलब है कि यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की एक टीम ने दंगे की सच्चाई का पता लगाने के लिए कासगंज का एक दिवसीय दौरा किया था। संगठन के सदस्यों ने नई दिल्ली के प्रेस क्लब में 5 फरवरी को अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए मीडिया के सामने अपने दौरे के अनुभव साझा किए।

इस टीम के प्रमुख सदस्य और पत्रकार अमित सेनगुप्ता ने कहा कि कासगंज में सांप्रदायिक हिंसा का कोई इतिहास नहीं मिलता है। उन्होंने बताया कि सिर्फ बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के समय बहुत मामूली सा दंगा हुआ था। उन्होंने कहा, “ये अभी तक पहेली बना हुआ है कि चंदन को किसने मारा और कहां गया।”

फोटोः सोशल मीडिया
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जांच रिपोर्ट का एक भाग

सलीम नाम के जिस शख्स को चंदन की हत्या का आरोपी बनाया गया है, उसके बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि वह एक बहुत शरीफ इंसान है। अमित सेनगुप्ता ने कहा कि दंगे में बहुसंख्यक समुदाय की किसी भी दुकान या मकान को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने अल्पसंख्यकों की जलती दुकानों को बुझाया और फायर ब्रिगेड को बुलाया। गौरतलब है कि मस्जिदों को नुकसान पहुंचाने के मामले में कोई एफआईआर नहीं दर्ज की गई है।

संगठन की एक अन्य सदस्य राखी सहगल ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि दंगे के दौरान मोटरसाइकिल पर आए लोगों ने करीब 70 मोटरसाइकिलें वहीं छोड़ दी थीं, जबकि पुलिस इनकी संख्या 35 बता रही है। इसके बावजूद इन मोटरसाइकिलों के किसी भी मालिक की पहचान नहीं की गई और ना ही उनके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज किया गया। उन्होंने बताया कि शेरवानी बूट हाउस के मालिक के लाख कहने पर भी उनकी एफआईआर नहीं दर्ज की गई। राखी सहगल ने कहा कि खराब माहौल में भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने मंदिरों की हिफाजत को सुनिश्चित किया।

फोटोः नवजीवन
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जांच रिपोर्ट का एक हिस्सा

यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के एक अन्य सदस्य नदीम खान ने पुलिस की भूमिका को उजागर करते हुए कहा कि चंदन की हत्या के मामले में सलीम को मोहसिन नाम के एक व्यक्ति के बयान पर गिरफ्तार किया गया है। मोहसिन ने अपने बयान में कहा कि चंदन और नौशाद पर एक ही जगह गोली चलाई गई, लेकिन नौशाद जिसका कि अलीगढ़ में इलाज चल रहा है, उन्होंने मोहसिन के इस बयान को गलत बताया है। पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका को उजागर करने के लिए नदीम खान ने एक और घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया, “एक स्कूटी पर दो दोस्त सवार होकर जा रहे थे, जिनको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। एक का नाम आसिफ था और एक का नाम प्रदीप। लेकिन दोनों के ऊपर जो धाराएं लगाई गईं, उनमें जमीन आसमान का अंतर है। आसिफ पर वे धाराएं लगाई गईं, जिनमें 25 साल तक की सजा हो सकती है, यानी उस पर दफा 405 और 307 लगाई गई है। जबकि प्रदीप पर धारा 121 लगाई गई, जिसमें सिर्फ भावनाओं को भड़काने का मामला बनता है।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि अब राजनीतिक दलों ने ऐसे मामलों पर बोलने से परहेज करना शुरू कर दिया है और वे नहीं चाहते कि वे अल्पसंख्यकों के हमदर्द के तौर पर नजर आएं। उन्होंने कहा, “उन्होंने समझ लिया है कि नरम हिंदुत्व ही उनकी राजनीतिक नैया पार लगा सकता है। लेकिन ये बहुत चिंताजनक है कि गलत को गलत कहने से राजनीतिक पार्टियां परहेज कर रही हैं, क्योंकि ये सोच लोकतंत्र को तबाह करने वाली है।”

गौरतलब है कि कासगंज में हुई हिंसा को लेकर बीजेपी के नेताओं को छोड़कर किसी भी राजनीतिक पार्टी ने कोई बयान नहीं दिया है और ना ही उनका कोई नेता वहां गया है। वहां सिर्फ बीजेपी के सांसद गए और उन्होंने भी वहां जहर फैलाने और लोगों को बांटने वाला बयान दिया।

बनोज्योत्सना लाहिड़ी ने कहा कि ये दंगा पूरी तरह से सुनियोजित था और इसमें व्यापारी वर्ग को निशाना बनाया गया। मृतक चंदन गुप्ता का संबंध कारोबारी वर्ग से था और उसकी हत्या के आरोप में गिरफ्तार होने वाला सलीम भी एक कारोबारी ही है। उन्होंने कहा, “कासगंज हिंसा एक बहुत सोची समझी साजिश का नतीजा था, लेकिन इसके बावजूद वहां के लोगों में बहुत भाईचारा नजर आया।”

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