लॉकडाउन में छूट के बावजूद निचले स्तर पर सप्लाई चेन भंग, आफत में किसान, आने वाले दिन देश पर पड़ेंगे भारी 

बीते हफ्ते मध्य प्रदेश के एक किसान ने सोशल मीडिया पर सीधे प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि उसे तरबूज की फसल शहर जाकर बेचने की अनुमति दें। देश में सब इतना प्रधानमंत्री-केंद्रित हो गया है कि उस किसान को भी लगता है कि अब प्रधानमंत्री ही उसकी समस्या का हल कर सकते हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

फिलहाल तो देश में अनाज से लेकर फल-सब्जी तक की कोई कमी नहीं है। लेकिन कृषि विशेषज्ञों और खाद्य एवं कृषि संगठन (फाओ) ने आगाह किया है कि अगर 20 अप्रैल के बाद लॉकडाउन में छूट से सप्लाई चेन बहाल नहीं हो पाई तो संकट की स्थिति आ सकती है। होटल, रेस्तरां वगैरह की ओर से मांग के अचानक खत्म हो जाने के कारण इन सब चीजों की कीमतें अब तक काफी हद तक नियंत्रण में रही हैं, लेकिन साल के उत्तरार्द्ध में ये बढ़ सकती हैं।

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के नाबार्ड चेयर प्रोफेसर और जाने-माने कृषि विशेषज्ञ आर. रामकुमार कहते हैं कि फसल की कटाई और खरीद-बिक्री पर लॉकडाउन के कारण बुरा असर पड़ा है, क्योंकि सरकारी एजेंसियों द्वारा अनाज की खरीद प्रक्रिया प्रभावित हो गई;  निजी व्यापारी खेतों से अनाज नहीं उठा सके; खेतीहर मजदरों में कमी के कारण रबी की बुवाई नहीं हो सकी; परिवहन क्षेत्र में ड्राइवरों की कमी हो गई; राजमार्गों पर आवागमन के रुक जाने के कारण कृषि उत्पाद एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुंच सके; मंडियों में कामकाज या तो ठप पड़ गया या फिर नाम मात्र को रह गया; खुदरा कृषि बाजार में भी कामकाज ठप है।

इन कारकों के कारण तमाम फसलों- गेहूं, अंगूर, तरबूज, खरबूज, केला, कपास, मिर्च, हल्दी, धनिया, प्याज, आलू आदि की फसलों के लिए संकट की स्थिति आ गई है। इसके कारण उपज की कीमत कम हो गई है। संकट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र में टमाटर उत्पादकों को प्रति किलो 2 रुपये भी नहीं मिल रहे। अंगूर उत्पादकों को कुल मिलाकर करीब एक हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि मांग खत्म हो गई है।

25 मार्च के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में गेहूं की कीमत 22 सौ रुपये प्रति किवंटल से गिरकर 16 सौ रुपये प्रति क्विंटल रह गई है। कई फसलों की कीमतें तो न्यूतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चली गई हैं। पंजाब में जो सब्जी 15 रुपये प्रति किलो बिक रही थी, आज 1 रुपये किलो के भाव से बिक रही है। दिल्ली की मंडियों में जनवरी 2020 में चिकेन की कीमत 55 रुपये प्रति किलो होती थी, लेकिन मार्च में घटकर 24 रुपये प्रति किलो रह गई है। तमिलनाडु में अंडे की कीमत 4 रुपये घटकर 1.95 रुपये रह गई।

वहीं, बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के वापस अपने घर चले जाने का मतलब है कि फसलों की कटाई के लिए संकट खड़ा हो गया है और कई किसान फसलों को खेत में ही छोड़ देने के लिए मजबूर हैं। ऐसे मामलों में किसानों को व्यापक नुकसान होगा। जहां मशीन से कटाई होती है, वहां इन मशीनों को लाने-ले जाने में परेशानी हो रही है। इसके अलावा कुछ इलाकों में इन मशीनों को चलाने वाले ड्राइवर/ऑपरेटर की कमी की भी बात सामने आई है। अब जबकि मशीन मरम्मत की दुकानें भी बंद हैं, मेकैनिक उपलब्ध नहीं हैं, स्पेयर पार्ट्स आसानी से नहीं मिल रहे, कई मशीनें बेकार हो गई हैं।

केरल की मिलों का अनभुव यह है कि चूंकि प्रवासी मजदूर उपलब्ध नहीं, वे किसानों से पर्याप्त धान नहीं खरीद पा रहे। किसानों ने भी या तो कटाई की ही नहीं, या फसल काटकर खेत में ही छोड़ दी। अधिकतर मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट, कोल्ड स्टोरेज यूनिट और वेयरहाउस भी मजदूरों की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। अमूल के मुताबिक ज्यादातर मिल्क प्रोसेसिगं प्लांट आधी श्रम शक्ति से काम कर रहे हैं। पुलिस के डर से कई मजदूर या तो काम पर नहीं आ रहे, या फिर घर लौट चुके हैं।

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पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश के एक किसान ने सोशल मीडिया पर एक संदेश डाला। इस संदेश में वह प्रधानमंत्री से अनुरोध कर रहा है कि उसे अनुमति दें ताकि वह तरबूज की फसल को शहर ले जाकर बेच सके। यह सोचने की बात है कि सब कुछ इतना प्रधानमंत्री- केंद्रित हो गया है कि उस किसान को महसूस होता है कि केवल प्रधानमंत्री ही उसकी समस्या का समाधान कर सकते हैं। किसान कहता है कि उसने तीन लाख का लोन ले रखा है और अगर वह पैदावार नहीं बेच सका तो उसके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाएगा।

फल-फूल और सब्जियों को लाने-ले जाने और बेचने को लेकर जिला स्तर के अधिकारियों को स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं होने के कारण दूर-दराज के तमाम किसान जैसे अंधी गली में जा फंसे हैं। वहीं, शहर के करीब रहने वाले किसानों की बाजार तक पहुंच तो है, लेकिन उन्हें भी बहुत कम कीमत पर फसलों को बेच देना पड़ा रहा है। मुंबई में रहने वाले सुधीर सूर्यवंशी पत्रकार हैं। उनके पिता किसान हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने परिवार का हालचाल लेने के लिए फोन किया तो पिता ने बताया कि नियमित बाजार के नहीं लगने के कारण उन्हें हरी मिर्च 10 रुपये किलो के हिसाब से बेचनी पड़ी जबकि लॉकडाउन से पहले वह 30 रुपये किलो के रेट से बेच रहे थे।

सूर्यवंशी जरूर नवी मुंबई में 70 रुपये की दर से मिर्च खरीद रहे हैं। उनका यह अनभुव इस बात का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि लॉकडाउन के कारण किसानों को किस तरह की परेशानी उठानी पड़ रही है और उन्हें औने-पौने दाम पर पैदावार बेचनी पड़ रही है। थोक विक्रेता और बिचौलियों ने जरूर इस स्थिति का लाभ उठाया है। सरकार ने खेती को आवश्यक सेवा घोषित कर रखा है। लेकिन चकिूं निचले स्तर तक स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं पहुंच सका, इसलिए किसानों के लिए बाजार या उपभोक्ता तक पहुंचना मुश्किल साबित हो रहा है। चूंकि खरीदार भी विक्रेता तक नहीं पहुंच पा रहा, तो देशभर से औने-पौने दाम पर उपज बेचे जाने की खबरें आ रही हैं।

फूल किसानों की तो हालत एकदम दयनीय है। अचानक फूलों का बाजार ही खत्म हो गया है और यहां तक कि महंगी विदेशी किस्में भी खराब हो गईं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा चाय उत्पादकों को काम शुरू करने की अनुमति देने की नाहक आलोचना हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक इन पौधों को नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इससे पौधे और मिट्टी, दोनों का नुकसान होगा। उसके अलावा चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी परस्पर दूरी बनाए रखना कोई समस्या नहीं क्योंकि वे तो वैसे भी दूर-दूर रहकर काम करते हैं।

जब लॉकडाउन शुरू हुआ, नासिक के किसानों पर जैसे पहाड़ ही टूट गया। 40 लाख लोन लेकर उन लोगों ने 40 हजार टन अंगूर उपजाए थे जो अचानक बर्बाद हो गया। चूंकि बाजार बंद है, वे अंगूर को सुखाने का केमिकल भी नहीं ला सकते। लॉकडाउन के कारण शादी-ब्याह, सम्मेलन-समारोह जैसे तमाम आयोजन रुक गए हैं और होटल, रेस्तरां के बंद हो जाने से फल-फूल, सब्जी जैसी चीजों की मांग अचानक खत्म हो गई है। परिवहन संबंधी रोक-टोक और एकदम निचले स्तर पर पुलिस ने सप्ला चेन को तोड़ दिया है और मांग नहीं होने के कारण कीमत कम हो गई है। इसका असर किसानों और ग्रामीण अरव्थ्यवस्था पर बहुत ही बुरा होने जा रहा है। किसानों की हालत ऐसी हो गई है कि उनके पास अगली खेती के लिए पैसे भी नहीं हैं। उनके पास बीज, उर्वरक, कीटनाशक वगैरह खरीदने के पैसे नहीं।

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पंजाब और हरियाणा में जहां रबी फसल की कटाई शुरू हो गई है, इस काम में कुशल मजदूरों की बेहद कमी महसूस की जा रही है। दोनों राज्यों ने खरीद केंद्र बढ़ा दिए हैं और कहा है कि वे औद्योगिक श्रमिकों को इस काम में लगाएंगे। हरियाणा ने अनाज की ऑनलाइन खरीद शुरू की है, हालांकि व्यापारी इसका विरोध कर रहे हैं। चंडीगढ़ में रहने वाले कृषि विशेषज्ञ देवेंदर शर्मा ने बताया कि हरियाणा और पंजाब, दोनों राज्यों ने सही कदम उठाए हैं लेकिन देखने वाली बात होगी कि वे इनपर किस तरह अमल कर पाते हैं।

देवेंदर शर्मा कहते हैं कि महामारी के कारण कई देशों में मजदूरों की कमी हो गई है। यहां तक कि इंग्लैंड में भी सरकार होटल वगैरह के कर्मचारियों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे ग्रामीण इलाकों में जाकर किसानों के हाथ बंटाएं। फाओ ने भी मजदूरों की कमी को महसूस किया है। फाओ का आकलन है कि महामारी के बाद फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका में क्रमशः दो लाख, 80 हजार और 60 हजार मौसमी मजदूरों की कमी आ गई है। सीमाओं के बंद हो जाने के कारण मैक्सिको के मजदूर अमेरिका नहीं जा पा रहे और यूक्रेन के मजदूर पोलैंड की मांग को पूरा नहीं कर पा रहे।

इन स्थितियों में भारत में रबी की कटाई लंबे समय तक चलने का अनुमान है। माना जा रहा है कि यह जून या जुलाई तक भी खिंच सकती है। अगर अनाज खरीद की प्रक्रिया तेजी से ढर्रे पर नहीं आई तो किसान खरीफ की बुवाई भी ढंग से नहीं कर सकेंगे और उनकी तकलीफें बढ़ती चली जाएंगी।

(आर. रामकुमार, देविंदर शर्मा और फाओ के इनपुट के साथ)

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Published: 16 Apr 2020, 7:00 PM