गांव-गांव पहुंच चुकी है किसान आंदोलन की धमक, हक के लिए आखिरी सांस तक लड़ने का जोश लिए दिल्ली कूच की तैयारी

केंद्र सरकार के कषि कानूनों के खिलाफ जारी आंदोलन की धमक गांव-गांव पहुंच चुकी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान अपने हक के लिए आखिरी सांस तक लड़ने के जज्बे के साथ दिल्ली कूच की तैयारी कर रहे हैं।

फोटो : आस मोहम्मद कैफ
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आस मोहम्मद कैफ

दिल्ली-पौड़ी मार्ग पर मेरठ और बिजनोर के बीच रामराज आता है, रामराज को मिनी पंजाब कहा जाता है। रामराज से हस्तिनापुर मार्ग पर स्थित संगत मोहल्ले के 40 वर्षीय सरदार बूटा सिंह कहते हैं, "किसानों की लड़ाई हक़ की लड़ाई हैं। अभी हमने सिर्फ रजाई गद्दे और राशन ही भिजवाया है। अब हम भी उनके साथ रहेंगे। कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। यह लोग कानून बनाकर किसानों को पीछे ले जाना चाहते हैं। हमारे बच्चों के मुंह से निवाला छीनना चाहते हैं। सरकार को यह कानून वापस करना ही होगा।! अगर वो ऐसा नही करते हैं तो हम लड़ते रहेंगे। आखरी सांस तक।"

रामराज के इस संगत मोहल्ले में किसानों के लगभग 50 घर है। सभी घर बहुत बड़े हैं। युवा गुरजंत सिंह बताते हैं कि यहां 5 एकड़ से कम जमीन वाला कोई किसान नही हैं। यह लगभग 35 बीघा होता है। यहां हर गली में गन्ने की ट्रॉली खड़ी है। गुरजंत बताते हैं कि मिल मालिक बाहर से गन्ना खरीद रहा है जबकि हमें इंडेंट नहीं दे रहा है। किसान से गन्ना खरीदने के लिए मिल मालिक पर्ची देता है। तय धनराशि पर गन्ना खरीदने से बचने के लिए मिल बाहर से खपत पर गन्ना ले रहा है। यह उसे सस्ता मिल रहा है और यहां के किसानों का गन्ना सड़ रहा है।

फोटो : आस मोहम्मद कैफ
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इसी मोहल्ले के नरेंद्र सिंह का कहना है कि "इसी से कानून को समझिए, आज मिल मालिक किसानों का गन्ना खरीदने के लिए बाध्य हैं। गन्ने की एक एमएसपी है। एक कीमत तय है। कल जब एमएसपी नहीं रहेगी तो खरीदार कीमत अपनी मर्जी से तय करेगा। किसान सस्ती नहीं दे पाया तो उसकी उपज सड़ जाएगी! मजबूरी में वो कम कीमत में बेचेगा।

नरेंद्र सिंह बताते हैं कि खरीदार न मिलने से उन्हें धान की फसल में 50 हजार रुपये का नुकसान हुआ है। दाम तो 1791 रुपए प्रति कुंतल था लेकिन हमने मजबूरी 1600 में बेचा है, जबकि एमएसपी 1900 है।


फोटो : आस मोहम्मद कैफ
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इसी तरह 65 साल के सरदार अमरीक सिंह कहते हैं कि "किसानों की जायज़ लड़ाई को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। यह बीजेपी का एजेंडा है। इनके ग़लत कामों का जो भी विरोध करता है उसपर नए नए आरोप लगाते हैं। मोदी इन कानूनों को जितना जल्दी वापस लें तो ठीक है। अब हम भी दिल्ली प्रदर्शन में जाने की तैयारी कर रहे हैं।"

फोटो : आस मोहम्मद कैफ
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70 साल के गुरदीप सिंह मलिक भी ऐलान करते हैं कि आंदोलन में शामिल सभी किसानों को हमारा समर्थन है। वे कहते हैं, "यह काले कानून है। इन्हें वापस लिया जाना चाहिए। खेती को बरबाद करने की योजना है यह। सरकार दावा करती है कि वे किसानों को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन कर क्या रहे हैं। अब हमें मोदी पर भरोसा नहीं है। हमारी बहन बेटियों पर पैसे लेकर आंदोलन में शामिल होने के बात कही जा रही है, हमें बदनाम कर रहे हैं। प्रदर्शन में पंजाब के हमारे रिश्तेदार भी शामिल भी है। अब हमारा भरोसा टूट चुका है। हम भी दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे हैं। हम भी किसान है।"


गौरतलब है कि तीन कृषि कानूनों के विरोध में लाखों किसान पिछले दस दिनों से राजधानी में जुटे हैं। दिल्ली में पंजाब और हरियाणा के इन किसानों के समर्थन में भारतीय किसान यूनियन समेत तमाम किसान संगठनों ने समर्थन दिया है। किसानों की सरकार के साथ दो बार वार्ता नाकाम हो चुकी है। गांव - गांव अब इस कृषि कानून के प्रति लोगों में नाराजग़ी बढ़ती जा रही हैं। किसानों में हलचल है और खासकर दिल्ली से जुड़े इलाकों में प्रदर्शन में शामिल होने की तैयारी चल रही है।

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