नूंह और गुरुग्राम हिंसा के बाद अल्पसंख्यक समुदाय में खौफ, डर के मारे कई प्रवासी कामगारों ने छोड़ा शहर

डर के कारण अल्पसंख्यक कामगार अपने गांव लौट गए, जिससे कपड़ा उद्योग का उत्पादन प्रभावित हुआ है। सर्दियों का मौसम कुछ ही महीने दूर है और यह सर्दियों के कपड़ों के उत्पादन का चरम समय है। यह हिंसा निश्चित रूप से कपड़ा उद्योग के लिए एक बड़ा नुकसान साबित होगी।

नूंह और गुरुग्राम हिंसा के बाद डर के मारे कई प्रवासी कामगारों ने छोड़ा शहर
नूंह और गुरुग्राम हिंसा के बाद डर के मारे कई प्रवासी कामगारों ने छोड़ा शहर
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नवजीवन डेस्क

हरियाणा के नूंह और गुरुग्राम में हाल ही में हुई सांप्रदायिक झड़पों के बाद घबराए अल्पसंख्यक समुदाय में भारी खौफ का आलम है। डर के मारे समाज के कई कारीगर हरियाणा के हिंसा प्रभावित जिलों से सब छोड़छाड़ कर भाग गए हैं। अधिकांश पलायन नूंह के रोजका मेव औद्योगिक क्षेत्र और गुरुग्राम के सेक्टर-37, खांडसा, कादीपुर, मानेसर और आईएमटी सोहना से हुआ है।

नूंह में मुस्लिम बहुल इलाके में विश्‍व हिंदू परिषद के जुलूस पर हमला होने के बाद दक्षिणपंथी समूहों के नेतृत्व में भीड़ ने पथराव किया। एक विशेष समुदाय की कई दुकानों को आग लगा दी गई और लोगों को धमकाया और उनकी पिटाई की गई, जिसके बाद पलायन शुरू हुआ। नूंह और गुरुग्राम हिंसा में 6 लोगों की जान चली गई है और 88 लोग घायल हो गए हैं।

हिंसा से नूंह, गुरुग्राम और सोहना में कपड़ा उद्योगों में काम करने वाले एक समुदाय विशेष के प्रवासी श्रमिकों में व्यापक भय फैल गया। पलायन 1 अगस्त को शुरू हुआ जब श्रमिक अपना मामूली सामान लेकर और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में अपने घरों को वापस चले गए।

इंडस्ट्रियल एसोसिएशन सेक्टर-37 के अध्यक्ष के.के. गांधी ने बताया, "गुरुग्राम में मुस्लिम कारीगरों ने हिंसा और भय के बीच गुरुग्राम छोड़ दिया है। हालांकि, इन कारीगरों को गुरुग्राम में निशाना नहीं बनाया गया। यहां तक कि किसी ने उन्हें धमकी भी नहीं दी है क्योंकि वे कपड़ा घरों में काम करते थे, न कि सैलून, मांस या स्क्रैप जैसी खुली दुकानों में। वे डर के कारण अपने मूल स्थानों पर लौट गए, जिससे कपड़ा उद्योग का उत्पादन प्रभावित हुआ है।'' गांधी ने कहा कि सर्दियों का मौसम कुछ ही  महीने दूर है और यह सर्दियों के कपड़ों के उत्पादन का चरम समय है। यह हिंसा निश्चित रूप से कपड़ा उद्योग के लिए एक बड़ा नुकसान साबित होगी।


बिहार के एक अधेड़ उम्र के कारीगर बाबू झा ने, जो गुरुग्राम के एक कपड़ा घर में काम करते थे, कहा, "हम जा रहे हैं, हम अब यहां सुरक्षित नहीं हैं। हमें पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है।" उन्होंने कहा, "हमने अपने नियोक्ताओं से कहा है कि सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी के बावजूद अब हम सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं।"

इस बीच, आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रियल एसोसिएशन ने हिंसा की निंदा की है। आईएमटी मानेसर इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अध्यक्ष अतुल मुखी ने बताया, "हम श्रमिकों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव में विश्वास नहीं करते हैं। हमने श्रमिकों को उनके काम की गुणवत्ता और कौशल के अनुसार काम पर रखा है और काम पर रखते समय हम धर्म नहीं देखते हैं। हम नूंह और गुरुग्राम में हुई हिंसा की कड़ी निंदा करते हैं।"

दोनों जिलों में सैकड़ों पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं और अधिकारी बचे हुए मजदूरों के बीच विश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। फिर भी, कुछ प्रवासियों ने कहा कि उनका विश्वास हिल गया है। बिहार जाते समय रहीम खान ने कहा, "मैं अपने परिवार के साथ हमेशा के लिए गुरुग्राम छोड़ रहा हूं। कोई भी हमारी रक्षा नहीं कर सकता। लोग हमें धमकी दे रहे हैं। मकान मालिक ने हमारे घर खाली करा दिए हैं।"

मेवात चैंबर ऑफ कॉमर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आर.एस. खटाना ने बताया, "रोजका मेव में लगभग 30 से 40 कपड़ा, डाइंग इकाइयां और ऑटो पार्ट इकाइयां चल रही हैं, लेकिन हाल की झड़पों के कारण हिंदू और मुस्लिम कर्मचारी काम पर नहीं आ रहे हैं। हालांकि, उन्हें किसी ने निशाना नहीं बनाया, लेकिन डर के कारण वे उत्तर प्रदेश और बिहार में उनके मूल स्थानों की ओर चले गए हैं।"

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