मध्य प्रदेश में आरटीआई का जवाब देने से रोक रहा है भूत, मेडिकल कॉलेज ने आत्मा के डर से जवाब से किया इनकार

ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस एडमिशन प्रक्रिया में धांधली की खबरों पर पड़ताल के लिए कुछ ऐक्टिविस्ट पिछले तीन साल से मगजमारी कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका जवाब नहीं मिल रहा है। अब भूतों का डर बताकर जवाब देने में असमर्थता बता दिया गया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

मध्य प्रदेश भी गजब है। कभी सरकारी अस्पतालों में चूहों द्वारा मरीजों के अंग कुतरने की खबर आती है, तो कभी सरकारी विभागों में फाइल कुतरने की। लेकिन गजब मध्य प्रदेश में इस बार तो इससे भी बड़ा कमाल हुआ है। यहां के एक मेडिकल कॉलेज में भूत का प्रकोप हो गया है, जिसने रिकॉर्ड रूम पर ही कब्जा जमा लिया है, जिसके चलते कॉलेज आरटीआई का जवाब नहीं दे पा रहा है। भूत-प्रेत की कहानी पर विवाद बढ़ने पर अब डीन ने कार्रवाई का भरोसा जरूर दिया है, लेकिन आरटीआई पर बहानेबाजी की यह कहानी बड़ी दिलचस्प है।

यह मामला ग्वालियर के ऐतिहासिक गजरा राजा मेडिकल कॉलेज का है, जहां एमबीबीएस एडमिशन की प्रक्रिया में धांधली के आरोपों पर जानकारी के लिए कुछ ऐक्टिविस्ट पिछले तीन साल से मगजमारी कर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसका जवाब नहीं मिल रहा है। वहीं अब भूतों का डर बताकर मेडिकल कॉलेज ने खुद को आरटीआई का जवाब देने में असमर्थ बता दिया है।


दरअसल गजरा राजा मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस में डोमिसाइल कोटे में गैर-डोमिसाइल छात्रों के फर्जी तरीके से दाखिले आरोपों का पता लगाने के लिए पंकज जैन नाम के एक ऐक्टिविस्ट तीन साल से कॉलेज से दस्तावेजों की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले तो कॉलेज ने कहा कि दस्तावेज सीबीआई सीज कर चुकी है, फिर कहा कि जो क्लर्क उन्हें देखता था, उसे सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है। अब कहा जा रहा है कि जहां ये दस्तावेज रखे गए थे उस रूम में क्लर्क ने सुसाइड कर लिया था और अब वहां उसकी आत्मा भटकती है, इसलिए वे ताला खोलने से डरते हैं।

हालांकि, इस मामले के तूल पकड़ने के बाद गजरा राजा मेडिकल कॉलेज के डीन ने मीडिया को कहा कि यह मामला उनकी जानकारी में नहीं है। उन्होंने इसका पता लगाने की बात कही है। लेकिन सच्चाई ये है कि सूबे में आईरटीआई का जवाब देने में आनाकानी करना सरकारी अधिकारियों की आदत बन गई है। लेकिन, हद तो ये हो गई कि अब बहानेबाजी के लिए भूतों और भटकती आत्माओं का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो सूचना के अधिकार का मखौल उड़ाना है।

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