नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन ने कर्मचारियों के वेतन में की 60% की कटौती, अभी तक नहीं मिला है जून का वेतन

नेशनल टेक्सटाइन कार्पोरेशन ने अपने कर्मचारियों के वेतन में 60 फीसदी तक की कटौती की है। वहीं जून माह का वेतन अभी तक नही ंदिया गया है। कर्मचारियों ने इसे लेकर पीएमओ, श्रम मंत्रालय और कपड़ा सचिव को पत्र भी लिखा है।

फोटो : सोशल मीडिया
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ऐशलिन मैथ्यू

स्मृति ईरानी के प्रभार वाले कपड़ा मंत्रालय के अधीन नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन के प्रबंधन और कर्मचारियों को लॉकडाउन के दौरान का वेतन नहीं मिला है। मार्च के बाद से मिल वर्कर्स को उनके वेतन का मामूली हिस्सा ही दिया गया है। इन लोगों को जून माह का वेतन अभी तक नहीं मिला है। इस बारे में कर्मचारियों ने पीएमओ, श्रम मंत्रालय और टेक्सटाइल सचिव को पत्र लिखा है। ऐसा तब हो रहा है जब केंद्र सरकार ने बाकायदा निर्देश जारी किए थे कि लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन मिलना चाहिए।

एनटीसी का वेतन मद का सालाना बजट 350 करोड़ रुपए का है, यानी एनटीसी को हर माह करीब 30 करोड़ रुपए चाहिए होते हैं। एनटीसी के प्रबंधन में करीब 300 कर्मचारी और 7,200 मिल वर्कर्स शामिल हैं। मार्च माह में जब पहला लॉकडाउन घोषित हुआ, तो उस महीने एनटीसी के वर्कर्स को सिर्फ 75 फीसदी वेतन ही मिला। इसी तरह अप्रैल में 60 फीसदी और मई में सिर्फ 40 फीसदी वेतन का ही भुगतान हुआ।

टेक्सटाइल इम्पलाइज यूनियन (इनटक) के महासचिव फूल सिंह यादव का कहना है कि, “मार्च में कामगारों को सिर्फ उतने ही दिन का वेतन दिया गया जितने दिन उन्होंने काम किया। लॉकडाउन का ऐलान तो सरकार ने का था। मिल कामगारों का औसत वेतन 8000 रुपए महीना है। हमें जून माह की वेतन अभी तक नहीं मिला है और हमें यह भी नहीं पता है कि इस माह का कितना वेतन मिलेगा। सिर्फ 3200 रुपए महीने पर कोई कामगार कैसे जीवन चला पाएगा।” गौरतलब है कि वेतन न मिलन के चलते तमिलनाडु और मुंबई के कामगारों ने विरोध प्रदर्शन भी किया है।

प्रबंधन के मामले में सिर्फ दिल्ली में तैनात कर्मचारियों को पूरा वेतन मिला है। सीनियर मैनेजमेंट में काम करने वाले कस्तूरी रंजन (बदला हुआ नाम) का कहना है कि, “बाकी सबको सिर्फ बेसिक सैलरी ही दी गई। कंपनी में वेतन के दो हिस्से होते हैं। एक बेसिक और दूसरा डीए। इसका औसत 2:3 का है। मसलन अगर किसी व्यक्ति का वेतन एक लाख रुपए है तो 40,000 बेसिक और 60,000 डीए होता है। सिर्फ बेसिक सैलरी देने के प्रस्ताव को दिल्ली के बाहर के स्टाफ ने मानने से इनकार कर दिया। यह कुछ और नहीं बल्कि उत्पीड़न है। हममें से किसी को भी जून माह का वेतन अभी तक नहीं मिला है।”

वहीं फूल सिंह यादव बताते हैं कि मार्च के अंत से ही मिलें बंद पड़ी हैं। उनका कहना है कि, “सरकार की योजना आखिर है क्या। आखिर वे मिलों को सैनिटाइज करके उत्पादन क्यों नहीं शुरु कराया जा रहा है। इस बारे में कोई कुछ नहीं बताता कि मिलें कब शुरु होंगी। हमने मई के पूरे वेतन के लिए मिल हेडक्वार्टर का घेराव भी किया था।”

लेकिन मैनेजमेंट स्टाफ का मानना है कि यह सिर्फ एनटीसी को घाटे में दिखाने का तरीका है ताकि आखिरकार इसे बंद कर दिया जाए। यह काम ऐसे वक्त में किया जा रहा है जब सरकार नौकरियों के अवसर पैदा करने का शोर मचा रही है। कस्तूरी रंजन कहते हैं कि, “एनटीसी हर साल करीब 1000 करोड़ रुपए का यार्न और करीब 100 करोड़ रुपए का कपड़ा तैयार करती है। एनटीसी के पास पीपीई उपकरण बनाने की भी विशेषज्ञता है। आखिर ये सब उत्पादन करने से सरकार को कौन रोक रहा है। अगर एनटीसी पीपीआई किट बनाएगी तो उसकी लागत 90 रुपए से अधिक नहीं आएगी। हाई ग्रेड पॉलीप्रोपिलीन ही पीपीई किट्स बनाने में इस्तेमाल होता है जो सिर्फ 10 रुपे मीटर आता है और एक किट में सिर्फ 4.5 मीटर ही लगता है। अगर एनटीसी पीपीई किट्स बनाती तो अच्छा खासा मुनाफा कमा सकती थी।”

रंजन कहते हैं कि लेकिन सरकार पीपीआई किट्स रिलायंस इंडस्ट्रीज से खरीद रही है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने हाल ही में अधिग्रहीत की गई अपनी दो कपड़ा मिलों में पीपीआई किट्स बनाने का काम शुरु किया है और वह 650 रुपए प्रति किट के हिसाब से सरकार को बेच रही है। रिलायंस ने सिलवासा में आलोक इंडस्ट्रीज में भी पीपीआई किट बनाने का काम शुरु किया है।

रंजन आगे कहते हैं कि, “अगर सरकार को अर्थव्यवस्था की चिंता होती तो निजी क्षेत्र के बजाए सरकारी मिलों में काम कराती। इससे वर्कर्स को महामारी के दौरान काम भी मिलता और उत्पादन में भी तेजी आती। लेकिन सरकार मिलें बंद करने की मंशा बनाए बैठी है ताकि उसकी जमीने बेची जा सकें। अगर ऐसा ही है तो सरकार वीआरएस योजना लेकर आए।”

गौरतलब है कि एनटीसी के पास करीब 80,000 करोड़ रुपए की जमीन देश भर में है। इनमें मुंबई के दादर और परेल इलाके में काफी कीमती जमीनें भी शामिल हैं। रंजन बताते हैं कि, “जमीन माफिया की नजर मुंबई की जमीनों पर कई सालों से है। अगर सरकार एनटीसी को मारना चाहची है तो इन जमीनों को मोटे मुनाफे पर बेचा जाएगा। एनटीसी को मुनाफे में लाना मुश्किल काम नहीं है बशर्ते सरकार ऐसा चाहे। एनटीसी को मुनाफे में लाने के कई प्रस्ताव मंत्री स्मृति ईरानी के समाने रखे जा चुके हैं, लेकिन उन्होंने इन पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है।”

एक बात और अहम है कि एनटीसी के उच्च प्रबंधन को एक-एक कर हटाया जा रहा है। आज की तारीख में एनटीसी के पास कोई चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर नहीं है, वित्त, एच आर, मार्केटिंग और टेक्निकल विभाग के डायरेक्टर भी नहीं हैं। सीएमडी का कार्यभार फिलाह कपड़ा सचिव के एन आर दाश के पास है जबकि वित्त निदेशक का कार्यभार नेशनल हेल्थ मिशन की निदेशक बिंदु शर्मा के पास है।

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