बड़े कॉरपोरट्स के दबाव में सरकार, इसलिए किसानों के लिए बन गया है जीने-मरने का सवाल

विवादित कृषि कानूनों पर हैरानी जताते हुए कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि आश्चर्य है कि कृषि में ‘सुधार’ के लिए सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों है कि उसने प्रभावित होने वाले पक्षों से बात किए बिना ही जून में तीन अध्यादेश लागू कर दिए।

फोटोः सोशल मीडिया
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संयुक्ता बासु

मोदी सरकार के विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों का आंदोलन तेज होता जा रहा है। किसानों ने सरकार को साफ अल्टीमेटम दे दिया है कि कृषि कानूनों को वापस लेना ही होगा। हालांकि सरकार अभी भी अड़ी हुई है, जिससे गतिरोध बढ़ता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम पर कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा हैरानी जताते हुए कहते हैं कि कृषि में ‘सुधार’ के लिए सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों है कि उसने प्रभावित होने वाले पक्षों से बात किए बिना ही जून में तीन अध्यादेश लागू कर दिए।

संयुक्ता बसु से चंडीगढ़ से फोन पर बातचीत में विवादित कृषि कानूनों के मुखर आलोचक देविंदर शर्मा कहते हैं कि लगभग आधी आबादी को प्रभावित करने वाली नीतियों को समझने, उस पर विस्तार से चर्चा की जरूरत थी। हर आदमी जल्दबाजी का कारण जानना चाहता है और इसका जवाब तो सरकार को देना ही होगा। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंशः

आप भी मानेंगे कि किसानों के लिए ‘एक देश, एक बाजार’ आकर्षक नारा है। क्या यह व्यावहारिक है?

एक देश, एक टैक्स और एक देश, एक बाजार बोलना फैशन हो गया है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि भारत बहुत बड़ा देश है। यहां अलग जगह, अलग तरीके से खेती होती है। अलग-अलग ऋतु चक्र हैं, खाने-पीने के अलग-अलग तौर-तरीके हैं, बारिश होने का क्रम अलग-अलग है आदि-आदि। लेकिन यह हास्यास्पद है कि सरकार के प्रस्ताव और कृषि काननू में एक देश और दो बाजार की बातें हैं- एक, एपीएमसी (कृषि उत्पाद बाजार समिति) मंडियों के अंदर और दूसरी इससे बाहर- सरकारी मंडी और प्राइवेट मंडी। मैं इस बात पर सहमत हूं कि सरकार को सैकड़ों मॉडलों और बाजारों की जरूरत है, जिन्हें मजबूत किए जाने की जरूरत है।

लेकिन क्या एक देश-एक बाजार का विचार सचमुच खराब है? कैसे मानें कि यह काम नहीं करेगा?

मध्य प्रदेश से हाल में रिपोर्ट आई है जो बताती है कि कृषि काननूों के बाद राज्य के 248 एपीएमसी बाजार में से कम-से-कम 190 खत्म हो गए हैं। यह पंजाब और हरियाणा के किसानों के भय की पुष्टि करता है। उन लोगों को आशंका थी कि ऐसा ही होगा। कुछ ही दिनों में सरकारी मंडी खत्म हो जाएगी और एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तथा सरकारी खरीद- दोनों गायब हो जाएंगे। जैसा कि सब जानते हैं, एपीएमसी मंडी 2006 में खत्म करने में बिहार सबसे आगे था। तब कहा गया था कि कृषि के बाजार-नियंत्रित विकास में बिहार देश का नेतृत्व करेगा; कि निजी निवेश की बाढ़ आ जाएगी और इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होगा; कि किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे। पिछले 14 साल में तो ऐसा नहीं हुआ है।

आवश्यक उपभोक्ता कानून में संशोधन कर और स्टॉक तथा वस्तु सूची हटाकर ’जमाखोरी’ की बात हटा दी गई है। आपकी प्रतिक्रिया?

अगर आप ‘मदर इंडिया’ फिल्म की याद करें, तो उसमें कन्हैयालाल ने जमाखोर की भूमिका निभाई थी। फिल्म में वह खलनायक था। लेकिन सरकार हमें इस बात का यकीन दिलाना चाहती है कि वह वस्तुतः स्वप्नदर्शी था। कहा जा रहा है कि बड़े कॉरपोरेट द्वारा वैधानिक ढंग से की गई जमाखोरी उपभोक्ताओं और किसानों- दोनों को मदद करेगी। लेकिन अमेरिका और कुछ हद तक यूरोप द्वारा अपनाया गया मॉडल वहां गहरे दबाव में है और उसकी व्यापक आलोचना हो रही है। अमेरिका में वालमार्ट-जैसे बड़े रिटेलर हैं और माल जमा करने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन इससे क्या वहां के किसानों को फायदा हुआ है? यह बात ध्यान में रखने की है कि अमेरिका में एक औसत किसान हर साल 62 हजार अमेरिकी डॉलर की सब्सिडी पाता है। उसकी तुलना में भारतीय किसान 280 अमेरिकी डॉलर मूल्य की सब्सिडी पाता है।

लेकिन क्या कुछ अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों ने प्रमुख तौर पर इस तरह की आपत्ति नहीं उठाई थी कि सब्सिडी भारतीय किसानों को आलसी बना दे रही है?

मैं समझता हूं कि इसके उलट हमारे अर्थशास्त्री और योजनाकार आलसी हैं। उन्हें अपने एकांत से बाहर आना चाहिए और खेती-किसानी को समझने के लिए खेत में किसानों के साथ काम करना और समय बिताना चाहिए। मुझे याद है, पहली बार इस तरह की उटपटांग तुलना भारतीय स्टेट बैंक के अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार रिपोर्ट में की गई थी। इस रिपोर्ट में किसानों को आलसी कहा गया था। मैं हतप्रभ रह गया था। भारतीय, खास तौर से पंजाब और हरियाणा के किसानों की उत्पादकता दुनिया में सबसे ज्यादा है। वे विश्व बैंक और अमेरिका तथा यूरोप की रिपोर्टों से कट एंड पेस्ट करने वाले आलसी अर्थशास्त्रियों से कहीं ज्यादा मेहनत करते हैं। मुझे लगता है कि खेती करने वाले देश के 60 करोड़ परिवार अधिक और निश्चित आय के हकदार हैं। 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में आकलन था कि एक किसान की औसत वार्षिक आय 20,000 रुपये है। मुझे आश्चर्य ही है कि वे लोग 1,700 रुपये महीने पर अपना परिवार कैसे पालते हैं? एक गाय पालने के लिए भी यह पर्याप्त नहीं है। और आप उसे आलसी कह रहे हैं?

अगर सरकार किसानों की हालत जानती है, तो वह इसे और खराब करने की कोशिश क्यों करेगी?

मुझे संदेह है कि आंशिक तौर पर इसलिए क्योंकि वे लोग विभिन्न लॉबी से दबाव में हैं। नहीं तो, आखिर क्यों ऐसा मॉडल लागू करने का प्रयास करेंगे जो अमेरिका में फेल हो चुका है? हर पांच साल में अमेरिकी सरकार कृषि के लिए समर्थन की घोषणा करती है। 2014 और 2018 में पेश दोनों फार्म बिलों में अमेरिकी किसानों के लिए ट्रिलियन डॉलर सब्सिडी दी गई। फिर भी अमेरिकी खेती संकट में है। किसान आत्महत्या बढ़ गई है। दीवालिया होने की घटनाएं बढ़ी हैं। डेयरियां बंद हो गई हैं। लेकिन उत्पादकता कम नहीं हुई है। बड़े कॉरपोरट्स को फायदा हुआ है जबकि औसतन 400 एकड़ जमीन वाले किसान परेशान हैं। और हम उम्मीद कर रहे हैं कि भारत में यह मॉडल सफल होगा, जहां औसतन भूमि स्वामित्व पांच एकड़ या उससे कम है?

रोनाल्ड रीगन से डोनाल्ड ट्रंप तक अमेरिका ने यह नीति अपनाई है कि या तो ‘खेती के लिए जमीन का बड़ा टुकड़ा रखो या यह धंधा छोड़ दो।’ हमारे किसान इसीलिए भयभीत हैं और विरोध कर रहे हैं। मेरे विचार से, वे सबसे अच्छे अर्थशास्त्री और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं।

उदारीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था वे दोहरा मंत्र हैं जिन्हें सुधारवादी बढ़ा रहे हैं। आप इसका किस तरह प्रतिकार करेंगे?

बाजार क्षमता (मार्केट एफिसिएंसी) एक मिथ है। अमेरिका में भी संघीय सब्सिडी, और न कि बाजार क्षमता, ने कृषि को मदद की है। यहां सरकार का तर्क है कि 94 प्रतिशत भारतीय किसान एमएसपी नहीं पाते हैं और निजी सेक्टर के साथ व्यापार कर रहे हैं, तो फिर, यह शोरशराबा आखिर क्यों?

मेरा सवाल है कि अगर बाजार सक्षम है और 94 प्रतिशत किसानों को उसने लाभ पहुंचाया है, तो 3.64 लाख किसानों ने आत्महत्या क्यों की? अगर बाजार और निजी सेक्टर सक्षम हैं, तो बिहार के किसान हजार रुपये प्रति क्विंटल धान क्यों बेचने को बाध्य हैं? क्यों बेशरम व्यापारी बेचने के लिए बिहार और यूपी से धान पंजाब लाते हैं, जहां एमएसपी 1,888 रुपये है? इस साल भी अनुमान है कि बिहार और यूपी से 40 लाख टन धान पंजाब और हरियाणा लाया गया। दोनों राज्यों में ऐसे धंधे पर सैकड़ों एफआईआर दर्ज हैं।

क्या यह बाजार की क्षमता दिखाता है? मैं तो कहूंगा, 2006 में बिहार में एपीएमसी मंडियों के खात्मे के बाद किसानों की एक पूरी पीढ़ी दरिद्रता में धकेल दी गई है। यही बात दूसरी जगहों पर किसानों को डरा रही है। अजीब लगता है जब टीवी एंकर पूछते हैं कि बाजार कृषि काननूों को लेकर इतने उत्साहित हैं, तो किसान क्यों विरोध कर रहे हैं? जवाब इसी में है। बाजार उन्मादी किस्म का लाभ देख रहा है, लेकिन किसान जीवन-यापन को लेकर भयभीत हैं। बाजार शहरी इलाकों में सस्ते श्रम के लिए भूखा है और वह लोगों को शहरों की ओर धकेलना चाहता है। लेकिन लॉकडाउन के बाद प्रवासी संकट ने दिखाया है कि गांव के लोगों के लिए इसका क्या मतलब है। क्या हम ऐसे विनाशकारी मॉडल अपनाना चाहते हैं?

तब, क्या आप यथास्थिति के पक्ष में और भारतीय कृषि में सुधार के खिलाफ हैं?

मैं पुराने पड़ चुके आर्थिक सोच और आलसी अर्थशास्त्रियों के खिलाफ हूं। हमारे अर्थशास्त्री अमेरिका और यूरोप के अर्थशास्त्रियों से 10 साल पीछे हैं। हमें गैरबराबरी, भूख और कुपोषण घटाने का रास्ता खोजना है। हमें वाइब्रेंट कृषि की जरूरत है जो उद्योग के साथ बराबरी का हिस्सेदार हो। सुधारों का मतलब निजीकरण नहीं है। हमारी अपनी शक्ति है और उन क्षेत्रों में काम होना चाहिए।

वे तीन कदम क्या हैं जो भारतीय कृषि को मजबूती देने के लिए जरूरी हैं?

पहला, हर किसान के लिए पांच किलोमीटर के दायरे में एपीएमसी मंडी। अभी सात हजार एपीएमसी मंडी हैं। इसका मतलब है कि इसे बढ़ाकर 42 हजार करना हागा। दूसरा, एमएसपी को वैधानिक न्यूनतम मूल्य बनाना होगा। अगर कीमत इससे नीचे गिरे तो सरकार आगे आए ताकि किसान न्यूनतम मूल्य के लिए आश्वस्त रहें। हालांकि, सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है, यह प्रभावी तौर पर चार या पांच फसलों तक सीमित है। एमएसपी का अन्य फसलों तक विस्तार जरूरी है।

केरल ने इस साल एमएसपी को 16 सब्जियों तक बढ़ाया है और खरीद के लिए 35 करोड़ रुपये अलग रखे। लेकिन उन्हें इसका उपयोग नहीं करना पड़ा क्योंकि कीमतें एमएसपी से नीचे नहीं गिरीं। किसानों को ऐसे ही कदम की जरूरत है। और अंत में, हमें किसानों के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) जैसा मॉडल लागू करना चाहिए। एनडीडीबी के सहकारिता मॉडल से गुजरात के डेयरी किसान 100 रुपये की बिक्री में से 70 रुपये पाते हैं। जबकि अमेरिकी किसान प्रति डॉलर सिर्फ 8 प्रतिशत पाते हैं।

सरकार कृषि कानूनों को वापस करने के मूड में नहीं लगती। गतिरोध कैसे टूटेगा?

यह किसान आंदोलन इस मामले में अलग है कि यह राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं से उबरा हुआ है। किसानों में गुस्सा पनप रहा था। मुझे याद है कि ओईसीडी (अंतरराष्ट्रीय संगठन- ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट) की रिपोर्ट में आकलन था कि भारतीय किसानों को कम कीमतों के कारण सन 2000 से 2016 के बीच 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मुझे लगता है कि यह आंकड़ा कहीं अधिक होगा क्योंकि यह अध्ययन तो कुछ ही फसलों का था। किसानों ने देश को छूट दी है, सच्चाई तो यही है। हमारी कृषि की जरूरतों को समझने की जरूरत सरकार ही नहीं, हर व्यक्ति की जिम्मेवारी है। यह मीडिया के लिए भी सीखने का मौका है। वस्तुतः, जनमत बनाने में मीडिया की ज्यादा जिम्मेवारी है। उम्मीद है सरकार किसानों की हालत समझेगी।

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