एनजीओ के पीछे तो हाथ धोकर पीछे पड़ी रही सरकार, अब महामारी में कोई मदद हो भी तो कैसे हो

सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कामकाज पिछले कुछ वर्षों के दौरान खास तौर पर और मुश्किल हो गए हैं। इस वक्त सरकार कोरोना महामारी से निबटने में स्वयंसेवी संगठनों से मदद चाह रही है। लेकिन जब इनके पीछे सरकार ही हाथ धोकर पड़ी तो एनजीओ सक्रिय हों भी, तो कैसे!

फोटो : Getty Images
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संयुक्ता बासु

भारत में काम कर रहे एनजीओ की नरेंद्र मोदी सरकार ने दुर्गति कर रखी है। यहां तक कि कैथोलिक रिलीफ सोसाइटी से लेकर ग्रीन पीस और एमनेस्टी इंटरनेशनल-जैसे अंतरराष्ट्रीय एनजीओ को दमनात्मक कायदे-कानूनों, जांच-पड़ताल, काली सूची और अनुदान जारी करने में देरी जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है। कई के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर दिए गए हैं। कुछ लोगों को बेबुनियाद आरोपों पर गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई। विदेशों से आने वाले चंदे पर ऐसी पहरेदारी बैठा दी गई कि एनजीओ का ज्यादा समय जमीन पर काम करने की जगह कागजी खानापूर्ति में ही जा रहा है।

एनजीओ को काम न करने की स्थिति में ला देने का नतीजा यह हुआ कि रिसर्च और आंकड़े इकट्ठा करने के काम पर असर पड़ा। कोई नहीं जानता कि कितने एनजीओ बंद हो गए और उनमें काम करने वाले कितने लोगों की ‘नौकरी’ और आजीविका खत्म हो गई। सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कामकाज को वैसे भी संदेह की नजर से देखा जाता रहा है और पिछले कुछ वर्षों के दौरान तो ये काम खास तौर पर और मुश्किल हो गए हैं। इस वक्त सरकार कोरोना महामारी से निबटने में स्वयंसेवी संगठनों से मदद चाह रही है। लेकिन जब इन पर इस तरह की कार्रवाइयां हुई हैं, तो वे सक्रिय हों भी, तो कहां से।

इस बात के साफ सबूत दिखते हैं कि पिछले सात सालों के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े गैर- सरकारी संगठनों को सरकार से तो अधिक संरक्षण मिल ही रहा है, कॉरपोरेट भी अपने सीएसआर फंड उन्हें ही दे रहे हैं। लेकिन पारदर्शिता और स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट के अभाव में, एनजीओ क्षेत्र को हो रही फंडिंग और उनकी वित्तीय सेहत रहस्यों में लिपटी हुई है। यह क्षेत्र पूरी तरह सरकार के मनमाने फैसलों पर निर्भर हो गया है।

स्वैच्छिक और गैर-लाभकारी कार्यकर्ता बताते हैं कि एनजीओ सेक्टर को कॉरपोरेट सेक्टर के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। लेकिन मोदी सरकार कॉरपोरेट प्रबंधन के तौर-तरीकों को गैर सरकारी संगठनों पर भी आजमा रही है।

वर्ष 2015 के शुरू में 10,000 से अधिक गैर- सरकारी संगठनों का समय पर ‘रिटर्न’ और अन्य कागजात दाखिल नहीं करने या एक या अधिक दस्तावेजों के गायब हो जाने के कारण एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो गया। ओडिशा में सामाजिक विकास गतिविधियों से जुड़े समीत पांडा कहते हैं, ‘पहले की सरकारों में अधिक उदार दृष्टिकोण था। हमें कागजात दाखिल करने के लिए ग्रेस पीरियड भी दिया जाता था। लेकिन यह सरकार हमें अपराधी मानती है और हमें संदेह की नजर से देखती है। यह ऐसा है जैसे कि विदेशों से फंडिंग हासिल करने वाला हर एनजीओ किसी न किसी अपराध का दोषी है जब तक यह साबित न हो जाए कि वह निर्दोष है।’

टियर-टू और टियर-थ्री शहरों में एनजीओ सेक्टर पहले से ही दबाव में था क्योंकि उनमें से कई सरकारी ऑडिट के कारण बंद हो गए थे। जैसे इतना ही काफी नहीं था, सरकार ने सितंबर, 2020 में, महामारी के दौरान, कायदे-कानून में दमनात्मक बदलाव की जैसे झड़ी ही लगा दी। नए नियमों में किसी बड़े एनजीओ का दूसरे छोटे एनजीओ को पैसे देने पर रोक लगा दी गई है। इसका मतलब यह हुआ है कि फोर्ड फाउंडेशन या बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन- जैसे अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों से पैसे ले रहे दिल्ली या मुंबई में स्थित बड़े एनजीओ जिलों और गांवों में अपने साझेदार संगठनों को पैसे देकर समाज सेवा के कार्यक्रमों को लागू नहीं करा सकते।

एक समय था जब ओडिशा में एनजीओ सेक्टर में सबसे ज्यादा रोजगार थे। स्थानीय स्तर पर छोटे- छोटे एनजीओ लोगों को हायर करते जो सामुदायिक कार्यकर्ता या क्षेत्रीय कार्यकर्ता के तौर पर काम करते हुए सशक्तिकरण और जागरूकता बढ़ाने के कार्यक्रमों में ग्रामीणों के साथ समन्वय करते और यही लोग शहर आधारित बड़े एनजीओ की रीढ़ होते।

दुनिया भर में एनजीओ सेक्टर में काम का एक साझेदारी मॉडल चलता है। शहरी पेशेवर धन जुटाने में बेहतर तरीके से प्रशिक्षित होते हैं और वे नीतिगत बदलावों, अनुदानों के लिए सरकार के साथ लॉबी करने के काम को बेहतर तरीके से करते हैं जबकि लोगों के बीच काम करने वाले कार्यकर्ता जमीनी परिस्थितियों, लोगों और उनकी संस्कृति और स्थानीय मुद्दों से भलीभांति परिचित होते हैं।

लेकिन लोगों के बीच काम करने वाले ये कार्यकर्ता या सोशल एक्टिविस्ट जिन्होंने पिछले 20-30 वर्षों से छोटे-छोटे गैर सरकारी संगठनों में काम किया है, वे अचानक नौकरी से बाहर हो गए हैं क्योंकि बड़े गैर सरकारी संगठन उन्हें वेतन देने की स्थिति में नहीं रहे।

नए एफसीआरए नियमों ने एनजीओ के प्रशासनिक खर्च को पहले के 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया है; बाकी की धनराशि का उपयोग कार्यक्रम लागत के लिए ही किया जा सकता है। प्रशासनिक व्यय जिसमें वेतन, कार्यालय किराया, फर्निशिंग, स्टेशनरी, संचार और परिवहन शामिल हैं। लेकिन यह अनिवार्य व्यय कुल परियोजना लागत का 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

उत्तर प्रदेश में महिला पंचायत सदस्यों और स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के लिए कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाने वाले दिल्ली स्थित एक गैर-सरकारी संगठन को पेशेवर रूप से योग्य कानूनी चिकित्सकों की एक टीम नियुक्त करनी पड़ी है जो कार्यशालाओं का संचालन करने के लिए महीने में दो बार गांवों का दौरा करेंगे। ये कार्यशालाएं तो अक्सर खुले मैदान में, पेड़ के नीचे या गांव के सामुदायिक हॉल में आयोजित की जाती हैं जिस पर खर्च कम ही आता है लेकिन वास्तविक लागत ज्यादा होती है क्योंकि अगर कानूनी रूप से योग्य टीम को हायर करें, उनकी यात्रा और होटल के बिल, स्थानीय यात्रा वगैरह का खर्च जोड़ें तो यह निश्चित ही काफी हो जाएगा। लेकिन अगर इन खर्चों पर 20 प्रतिशत की सीमा लगी हो तो इस तरह की गतिविधियां कैसे होंगी? जागरूकता पैदा करने, कानूनी और संवैधानिक साक्षरता, भागीदारीपूर्ण अनुसंधान और ग्रामीण सशक्तिकरण परियोजनाओं से जुड़े सामुदायिक कार्य नए नियमों से प्रभावित हुए हैं।

इससे भी अधिक विचित्र नियम तो यह है कि विदेशी फंड लेने के इच्छुक एनजीओ को भारतीय स्टेट बैंक की नई दिल्ली शाखा में खाता खोलना जरूरी हो गया है। राज्यों और दूरदराज के कई गैर सरकारी संगठनों को पंजीकरण से रोक दिया गया है। यहां तक कि एफसीआरए लाइसेंस को सरेंडर करना भी एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें एफसीआरए पैसे से बनाई गई संपत्तियों की ऑडिट वगैरह शामिल है।

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