मंदसौर ग्राउंड रिपोर्टः किसानों के आक्रोश ने बढ़ाई बीजेपी की मुश्किलें

पिछले साल मंदसौर जिले में पुलिस फायरिंग में 6 किसानों की मौत हो गई थी। इस बार जिले के सभी प्रत्याशियों की हार-जीत यही किसान तय करेंगे। प्रदेश के आगामी चुनाव के लिए प्रचार अपने चरम पर है और जिले के किसान इस समय मंदसौर मंडी के बाहर लाइन लगाकर बैठे हैं।

फोटोः रोहित गुप्ता
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रोहित गुप्ता

पिछले साल किसान आंदोलन के बाद पूरे देश में सुर्खियां बटोरने वाला मध्यप्रदेश का मंदसौर जिला राजनैतिक रूप से विधानसभा चुनाव में काफी अहम हो जाता है। जिले में विधानसभा की कुल चार सीटें हैं, जिनमें मंदसौर, गरोठ, सुवासरा और मल्हारगढ़ शामिल हैं। वर्तमान में 4 विधानसभा सीटों में से 3 पर बीजेपी और 1 पर कांग्रेस का कब्जा है। कांग्रेस को इस बार सत्ता में वापसी की पूरी उम्मीद है। पिछले साल मंदसौर में हुए किसान आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की 'किसान पुत्र' वाली छवि को बड़ा झटका लगा था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी उनपर हमला बोलते हुए उन्हें किसान विरोधी बताया था। 15 साल की सत्ता विरोधी लहर और किसानों के अंदर उबल रहा आक्रोश मंदसौर और राज्य में लगातार बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा रहा है।

दरअसल मंदसौर की मंडी प्रदेश की आदर्श मंडियों में शामिल है और यह प्याज, लहसुन की सबसे बड़ी मंडी है। मालवा-निमाड़ संभाग में इस बार प्याज और लहसुन का बंपर उत्पादन हुआ है। आस-पास के कई जिलों के किसान भी अपनी फसल बेचने मंदसौर आते हैं।

फोटोः रोहित गुप्ता
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मंदसौर की इस मंडी में टोकन सिस्टम नहीं होने की वजह से किसानों की सैकड़ों ट्रक-ट्रालियां मंडी गेट के बाहर खड़ी हैं। अपनी फसल बेचने के लिए किसानों को कई दिन इंतजार करना पड़ रहा है और इंतजार के बाद भी जब उनका नंबर आ रहा है तो उन्हें अपनी लागत तक नहीं मिल रही है। 4 साल पहले जो लहसुन 14000 रुपये क्विंटल तक बिका था, उसका इस बार 1400 रुपये क्विंटल भी मुश्किल से मिल रहा है। 1400 रुपये भी लहसुन की सबसे अच्छी किस्म, जिसे मंडी की भाषा में बम कहा जाता है, उसका मिल रहा है। वहीं छोटे और टुकड़ी लहसुन तो 100 रुपये प्रति क्विंटल के रेट से बिक रहे हैं। इसको लेकर किसानों में भारी नाराजगी है। ऐसे में मंडी पर सालों से राज कर रहे बीजेपी के नेता यहां झांकने तक की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

फोटोः रोहित गुप्ता
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किसान तय करेंगे प्रत्याशियों की किस्मत

मंदसौर जिले की चारों विधानसभा सीटों पर किसानों का गहरा प्रभाव है। मंदसौर सीट को अगर हटा दें तो बाकी तीनों सीटों के 80% से ज्यादा पोलिंग बूथ ग्रामीण इलाकों में पड़ते हैं। मंदसौर विधानसभा सीट के कुल 285 बूथ में से 155 ग्रामीण इलाकों में हैं। वहीं मल्हारगढ़, सुवासरा और गरोठ में 249, 263 और 245 पोलिंग बूथ ग्रामीण इलाकों में पड़ते हैं। जिले के ग्रामीण इलाकों में इस बार कांग्रेस को भारी फायदा मिलता दिख रहा है।

बीजेपी के मुद्दों का यहां असर ही नहीं

भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के मुद्दे उठा रही है। कभी कांग्रेस को मुस्लिम विरोधी बता रही है तो कभी कांग्रेस द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की बातें फैला रही है। ये खबरें प्रदेश और देश की मीडिया की सुर्खिया जरूर बन रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन मुद्दों का असर कम ही है। ग्रामीण छेत्रों में तो इन मुद्दों का कोई असर ही नहीं है। वहां के लोग अभी तक पीने के पानी, बेरोजगारी और सड़क जैसे मुद्दों से जूझ रहे हैं।

मंदसौर ग्राउंड रिपोर्टः किसानों के आक्रोश ने बढ़ाई बीजेपी की मुश्किलें

जिले की चारों विधानसभा सीटों के समीकरण

मंदसौर विधानसभा सीट पर बीजेपी ने जहां अपने मौजूदा विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया को मैदान में उतारा है तो वहीं कांग्रेस ने मनासा से विधायक रहे वरिष्ठ नेता नरेंद्र नहाटा को मैदान में उतारा है। सिसोदिया मंदसौर विधानसभा सीट पर पिछले दो विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर चुके हैं। 2008 में जहां यशपाल सिर्फ 1685 वोटों से जीत पाए थे तो वहीं 2013 में कांग्रेस की जिला पंचायत उपाध्यक्ष आएशा बी की बगावत के बाद यह आंकड़ा 24295 पर पहुंच गया था। इस बार यशपाल को अपने क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दो दिन पहले मंदसौर के अलावदाखेड़ी में जनसंपर्क करने पहुंचे बीजेपी विधायक यशपाल को एक युवक ने थप्पड़ तक मार दिया था। वहीं दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मंत्री रहे नरेंद्र नहाटा के नेतृत्व में मंदसौर के कांग्रेस नेता एकजुट नजर आ रहे हैं।

जिले की सुवासरा विधानसभा सीट पर कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग का मुकाबला पूर्व विधायक राधेश्याम पाटीदार से है। हरदीप और राधेश्याम पारंपरिक प्रतिद्द्वी रहे हैं। सुवासरा में पाटीदार वोटरों की संख्या काफी ज्यादा है। जिसको ध्यान में रखकर बीजेपी ने राधेश्याम को एक बार फिर मैदान में उतारा है। तो वहीं कांग्रेस ने भी पाटीदार वोटों में सेंध लगाने के लिए पाटीदार नेता और निर्दलीय उम्मीदवार महेंद्र पाटीदार को कांग्रेस में शामिल कर लिया है। कांग्रेस में शामिल होते ही महेंद्र ने अपना नामांकन वापस ले लिया और कांग्रेस ने उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया है। कांग्रेस में शामिल होते ही महेंद्र ने मंदसौर जिले में कांग्रेस प्रत्याशियो के लिए प्रचार करना शुरू कर दिया है।

गरोठ विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने बीजेपी उम्मीदवार और मौजूदा विधायक देवीलाल धाकड़ के मुकाबले में सुभाष कुमार सोजतिया को मैदान में उतारा है। सुभाष कुमार कांग्रेस के वरिष्ट नेता हैं और 1985 से गरोठ विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं। सोजतिया 1985, 1993, 1998 और 2008 में चार बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। इलाके में शिक्षा और स्वास्थ्य जुड़ी समस्या प्रमुख मुद्दा है। रोजगार के लिए भी किसानों को उज्जैन और इंदौर जाना पड़ रहा है।

मल्हारगढ़ विधानसभा सीट की बात करें तो यहां कांग्रेस ने बीजेपी विधायक जगदीश देवड़ा के सामने परशुराम सिसोदिया को मैदान में उतारा है। जगदीश देवड़ा पिछले 2 बार से यहां से विधायक हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के श्यामलाल जोकचंद ने जगदीश को कड़ी चुनौती दी थी जिसके बाद बीजेपी नेता मात्र 6571 वोटों से चुनाव जीत पाए थे। परशुराम को टिकट मिलने के बाद कांग्रेस नेता श्यामलाल जोकचंद कुछ समय के लिए नाराज जरूर हो गए थे, लेकिन पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के समझाने पर उन्होंने सिसोदिया के पक्ष में प्रचार करना शुरू कर दिया है। श्यामलाल जोकचंद और परशुराम सिसोदिया के साथ आने से बीजेपी एक बार फिर बैकफुट पर आ गई है।

कुल मिलाकर मंदसौर जिले की चारों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है। शहर के कुछ इलाकों को छोड़ दें तो बीजेपी यहां बुरी तरह से पिछड़ती नजर आ रही है। हिन्दू-मुस्लिम, राम मंदिर और आरएसएस पर बैन जैसे मुद्दे यहां बेअसर दिख रहे हैं। किसानों के अंदर सरकार के प्रति गुस्सा यहां कांग्रेस को काफी फायदा पहुंचाने वाला है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अंदर जीत का भरोसा साफ दिख रहा है तो वहीं बीजेपी के कार्यकर्त्ता तक दबी आवाज में यह मान रहे हैं कि मंदसौर जिले में कांग्रेस की सीटें बढ़ रही हैं।

Published: 19 Nov 2018, 4:21 PM
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