'हम अडानी के हैं कौन' सीरीज के सवालों की 8वीं किस्त - सेबी की खामोशी, केतन पारिख से रिश्ते और जेपीसी का डर

कांग्रेस सांसद और पार्टी कम्यूनिकेशन इंचार्ज जयराम रमेश ने अडानी गाथा के संदर्भ में प्रधानमंत्री से रोज पूछे जा रहे सवालों की नई किस्त जारी की है। इसमें उन्होंने अडानी समूह के केतन पारिख से रिश्तों और सेबी की खामोशी को लेकर प्रधानमंत्री से सवाल पूछे हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
फोटो : सोशल मीडिया
user

नवजीवन डेस्क

 प्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी,

 जैसा कि वादा किया गया था, आपके लिए आज का तीन प्रश्नों का अगला सेट प्रस्‍तुत है, HAHK (हम अडानी के हैं कौन) श्रृंखला में यह आठवीं कड़ी है। ये प्रश्‍न इस सच्‍चाई से संबद्ध हैं कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा बार-बार इस निष्‍कर्ष पर पहुंचने के बावजूद कि‍ अडानी समूह स्टॉक में हेरफेर का दोषी है, आश्चर्यजनक रूप से भारतीय नियामकों द्वारा पिछले तीन साल के दौरान अडानी के शेयरों की कीमतों में संदिग्ध उछाल की जांच करने के लिए कोई तत्‍परता नहीं दिखाई गई।

आज के सवालों इस प्रकार हैं-

सवाल नंबर 1 - सेबी आखिर खामोश क्यों है!

1999 और 2001 के दौरान अडानी एक्सपोर्ट्स (जिसे अब अडानी एंटरप्राइजेज के नाम से जाना जाता है) के शेयरों की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की जांच के बाद 2007 में सेबी के एक विनिर्णय में पाया गया था कि स्टॉक में हेरफेर करने के लिए कुख्‍यात केतन पारेख (केपी) से जुड़ी संस्थाएं “अडानी के शेयरों की कीमत को प्रभावित करने के लिए समक्रमिक / छद्म व्‍यापार (सिंक्रोनाइज़्ड ट्रेडिंग/सर्कुलर ट्रेडिंग) और कृत्रिम मात्रा का निर्माण” जैसी "हेरफेर पूर्ण गतिविधियों" में शामिल थीं।

यह भी पाया गया कि "अडानी समूह के संस्‍थापकों ने बाजार में हेरफेर करने में केतन पारेख की संस्थाओं को सहायता और प्रोत्‍साहन दिया।" यह अडानी समूह के खिलाफ मौजूदा आरोपों के साथ एक चिंताजनक समानता है, अंतर केवल इतना है कि अब स्टॉक में हेरफेर संदिग्‍ध विदेशी संस्थाओं के माध्‍यम से किया जा रहा है। सेबी ने 2020 के बाद समुचित गंभीरता के साथ जांच करके अडानी समूह के शेयरों की कीमतों में अत्‍यधिक वृद्धि पर अंकुश लगाने का प्रयास क्‍यों नहीं किया?

सवाल नंबर 2 - केतन पारिख से रिश्तों की जांच क्यों नहीं!

हाल के खुलासों से यह संकेत मिलते हें कि दोषी शेयर दलाल केतन पारेख के अडानी समूह के साथ संबंध अभी भी बने हुए हैं। उसके एक करीबी रिश्तेदार ने एलारा कैपिटल के साथ काम किया है, जिस फर्म के इंडिया फंड ने अडानी के शेयरों में 99% निवेश किया था। एलारा को पारेख के सहयोगी चार्टर्ड अकाउंटेंट धर्मेश दोषी के साथ संबंध होने के लिए भी जाना जाता है, जो 2002 में भारत से फरार हो गया था। इस गंभीर आरोप को समक्ष रखते हुए कि एलारा अडानी समूह के मुखौटे के तौर पर कार्य करता है, क्या सरकार केतन पारेख और अडानी समूह के बीच इस ताजा सांठ-गांठ से आंख मूंदकर बैठी है, जो रिश्ता लगभग 25 साल पुराना है?


सवाल नंबर 3 - आप जेपीसी से क्यों डर रहे हैं!

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के नेतृत्व वाली सरकारें अतीत में शेयर बाजार में बड़े पैमाने पर हेराफेरी के मामलों की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने पर सहमत हुई थी। 1992 में हर्षद मेहता मामले की जांच के लिए जेपीसी की स्थापना की गई थी, जबकि 2001 में केतन पारेख मामले की जांच जेपीसी ने की थी। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, दोनों को करोड़ों भारतीय निवेशकों को प्रभावित करने वाले घोटालों की जांच के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों पर विश्वास और भरोसा था। आप किस बात से भयभीत हैं? क्या आपको डर है कि वास्तव में एक स्वतंत्र जाँच अडानी समूह के गलत कार्यों में आपकी व्यक्तिगत संलिप्‍तता उजागर कर सकती है?

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia


;