हरियाणा: मई में कहर बनकर टूटा कोरोना, 4000 से ज्‍यादा मौतें, मीडिया मैनेजमेंट में मशगूल रही खट्टर सरकार

मई में हरियाणा के लोगों पर कोरोना कहर बनकर टूटा। इस महीने प्रदेश में कोरोना से 4 हजार से अधिक लोगों ने दम तोड़ दिया। मतलब रोजाना औसतन 130 से ज्‍यादा लोगों की मौत कोरोना से हुई। यह आंकड़े तो सरकारी हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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धीरेंद्र अवस्थी

मई में हरियाणा के लोगों पर कोरोना कहर बनकर टूटा। इस महीने प्रदेश में कोरोना से 4 हजार से अधिक लोगों ने दम तोड़ दिया। मतलब रोजाना औसतन 130 से ज्‍यादा लोगों की मौत कोरोना से हुई। यह आंकड़े तो सरकारी हैं। असलियत में तस्‍वीर बेहद भयावह हो सकती है। यह हालात भी तब हुए हैं जब करीब 90 फीसदी मरीज होम आईसोलेशन में अपना इलाज करा रहे थे। मतलब महज 10 प्रतिशत कोरोना मरीजों का बोझ भी खट्टर सरकार नहीं उठा पाई।

हरियाणा में मई के आरंभ में ही हालात सरकार के नियंत्रण से बाहर जा चुके थे, लेकिन सरकार सब कुछ नियंत्रण में होने का दावा कर रही थी। 4 मई वह तिथि थी जब प्रदेश में सर्वाधिक 15786 कोरोना के पॉजिटिव केस आए थे। सरकार के मुखिया मनोहर लाल 5 मई को चंडीगढ़ में जब मीडिया के सामने आए तो उनके एक के बाद एक किए जा रहे ऐलान इस बात की तस्‍दीक कर रहे थे कि सरकार असहाय है। वह बस घोषणाएं किए जा रहे थे कि पीजीआई रोहतक में 1000 बेड, फरीदाबाद में 200 बेड, हिसार में 500 बेड, पानीपत रिफाइनरी में 500 बेड, गुरुग्राम में 100 और 70 बेड के अस्‍पताल जल्‍द उपलब्‍ध होंगे। मतलब भविष्‍य की बात करने के सिवाय उनके पास वर्तमान में देने के लिए कुछ भी नहीं था। वह दावा कर रहे थे कि प्रदेश के 22 जिलों में 45 हजार बेड उपलब्‍ध हैं, लेकिन अपनों की टूटती सांसें बचाने के लिए एक अस्‍पताल से दूसरे अस्‍पताल एक अदद बेड के लिए पूरे राज्‍य में भटक रहे लोग उनके इस दावे को बेमानी साबित कर रहे थे।

नौ मई वह दिन था जब राज्‍य में सर्वाधिक 116867 कोरोना के सक्रिय मरीज थे। इसमें से 103059 मरीज होम आईसोलेशन में थे। मतलब महज तकरीबन 13000 मरीज पूरे प्रदेश में अस्‍पतालों में थे और राज्‍य की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था इतने मरीजों को संभालने में ही नकारा साबित हो चुकी थी। कल्‍पना करें कि करीबन 90 फीसदी मरीज होम आईसोलेशन में नहीं होते तो हालात और कितने भयावह होते। नींद में डूबी सरकार की हालात का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि अप्रैल में कोरोना से मौतों का ग्राफ अचानक बढ़ने के बाद भी उसके कान में जूं नहीं रेंगी। सरकारी आंकड़ों में ही मार्च के महीने में कोरोना से 107 मौतें होने के बाद अप्रैल में यह आंकड़ा 1061 मौतों पर पहुंच चुका था। मतलब सीधे 10 गुणा की बढ़ोत्‍तरी के साथ कोरोना कहर बरपा रहा था। लेकिन स्थिति इससे भी बदतर थी और खट्टर सरकार आंकड़े दबाने का खेल खेल रही थी। मीडिया रिपोर्ट्स इस बात की तस्‍दीक कर रही थी। स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के अप्रैल माह में 1061 मौतों के दावे के उलट मीडिया रिपोर्ट कह रही थी कि अप्रैल में कोविड प्रोटोकॉल से श्‍मशान घाटों में 3814 लोगों का दाह संस्‍कार किया गया है। मतलब सरकार के दावे से तकरीबन चार गुणा ज्‍यादा।

हालात गंभीर थे और सरकार अस्‍पतालों में इंतजाम बेहतर करने की जगह मीडिया मैनेजमेंट में मशगूल थी। जाहिर है सरकार की इस संजीदगी के बाद स्थितियां और खराब होनी ही थीं। हुईं भी। मई में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा 4087 हो गया, लेकिन यह भी सरकारी आंकड़ा है। असल तस्‍वीर अभी आनी शेष है, जो और भयावह हो सकती है। अप्रैल से यदि हम तुलना करें तो यह आंकड़ा 15000 से आगे जाना चाहिए। यह वह वक्‍त था जब गांव-गांव से लाशें उठ रही थीं और हर जगह से खौफनाक खबरें आ रही थीं। कोई टेस्‍ट नहीं था, लिहाजा बिना कोविड प्रोटोकॉल के ही अंतिम संस्‍कार हो रहे थे। जिस दिन पांच मई को मुख्‍यमंत्री मीडिया के सामने आए उस दिन सर्वाधिक 181 मौतें कोरोना से प्रदेश में हुई थीं। उसके अगले दिन फिर 177 लोगों ने कोरोना से दम तोड़ा, जो दूसरा सर्वाधिक आंकड़ा था। मतलब सरकारी रजिस्‍टर में दर्ज मौतों के मुताबिक भी कोरोना का पीक आ चुका था और मुख्‍यमंत्री भविष्‍य के सपने दिखा रहे थे। लोग मर रहे थे और सरकार का मीडिया मैनेजमेंट प्रदेश की शानदार तस्‍वीर पेश कर रहा था।

7 मई को सरकार का मीडिया प्रबंधन कह रहा था कि 5 जिलों में आज जितने मरीज आए, उससे ज्‍यादा मरीज ठीक हुए। मतलब प्रदेश के 22 में से 17 जिलों की स्थिति ठीक नहीं थी। सरकार कह रही थी कि प्रतिदिन जितने मरीज अस्‍पतालों में भर्ती हो रहे हैं, उसके 83 फीसदी ठीक होकर घर जा रहे हैं। होम आइसोलेशन में इलाज करवा रहे मरीजों को 9 मई से घर पर ही ऑक्‍सीजन सिलेंडर की सप्‍लाई शुरू कर दी जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष स्‍वास्‍थ्‍य कैंप और जागरूकता अभियान चलाएगा। मतलब पूरे प्रदेश में बिखरी पड़ी मौतों की चर्चा भी उसे गंवारा नहीं थी। इससे आगे का मीडिया प्रबंधन और दर्दनाक था। सरकार इस दूसरी लहर में हो रही बेहिसाब मौतों की तुलना पहली लहर से कर रही थी, जो अपने आप में बेमानी था। यहां भी वह आंकड़ों का खेल कर रही थी। सरकार मीडिया को बता रही थी कि पिछले वर्ष मई के प्रथम सप्‍ताह में मृत्‍यु दर 1.08 प्रतिशत थी, जो आज कम होकर 0.90 फीसदी हो गई है। पिछले वर्ष मई के प्रथम सप्‍ताह में रिकवरी रेट 46.85 प्रतिशत था, जो आज बढ़कर लगभग 79 प्रतिशत हो गया है। पिछले वर्ष मई के प्रथम सप्‍ताह में प्रतिदिन 42 हजार टेस्‍ट किए जा रहे थे, जबकि आज प्रतिदिन 52 हजार से अधिक किए जा रहे हैं।

पिछले वर्ष मई के प्रथम सप्‍ताह में सरकारी और प्राइवेट अस्‍पतालों में 9,444 बेड की व्‍यवस्‍था थी, जो आज बढकर 22,429 हो गई है। जबकि हालात भयावह थे। सरकारी रजिस्‍टर में ही दर्ज मौतों का हिसाब कह रहा है कि मई के 10 दिन ऐसे रहे हैं, जब हर दिन प्रदेश में डेढ़ सौ से ज्‍यादा मौतें दर्ज की गई हैं। यह वह वक्‍त था जब श्‍मशान की पार्किंग तक में अंतिम संस्‍कार करने पड़ रहे थे। मीडिया के घेरने पर सीएम के जवाब में ही शायद सरकार का एजेंडा छिपा था। सीएम का कहना था कि इस संकट में हमें आंकड़ों से नहीं खेलना चाहिए। जिसकी मौत हो गई वह हमारे शोर मचाने से जीवित तो होता नहीं। मौत कम हैं या ज्यादा, इस विवाद में पड़ने का कोई अर्थ नहीं है। विधानसभा में सर्वश्रेष्‍ठ विधायक चुने गए कांग्रेस के वरुण चौधरी का कहना है कि मुख्‍यमंत्री के आंकड़ों में नहीं पड़ने के जवाब के बाद ही इस बात की तस्‍दीक हो गई थी कि सरकार की मंशा क्‍या है। एक तरह से सीएम ने मान लिया था कि हालात गंभीर हैं। वरुण चौधरी का कहना है कि सरकार के आंकड़े छिपाने से क्‍या होता है। सरकार अगर सच को स्‍वीकार ही नहीं करेगी तो उसका समाधान भी कैसे होगा। अस्‍पतालों में सिर्फ बेड लगा देने से ट्रीटमेंट नहीं हो जाता।

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