क्या सच में मोदी सरकार ने नहीं लिया कोई विदेशी कर्ज, क्या है व्हाट्सएप से निकले सरकारी दावों की असलियत !

चुनाव की तेज होती सरगर्मियों के बीच बेशक जमीन पर बहुत शोर नहीं दिख रहा हो, लेकिन सोशल मीडिया पर पार्टियों के वार रूम दिन-रात काम कर रहे हैं। सभी दलों को अंदाजा हो गया है कि जीत के लिए सोशल मीडिया अहम है। लेकिन इसी की आड़ में जमकर झूठ भी फैलाया जा रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

इन दिनों सोशल मीडिया, खासकर व्हाट्सएप और फेसबुक पर ऐसे संदेशों की बाढ़ है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान कई आर्थिक उपलब्धियां हासिल हुई हैं, जो भूतो न भविष्यति हैं। लेकिन इनकी असलियत आंखें खोलने वाली हैं। चलिए एक-एक कर इन दावों की पड़ताल करते हैं।

दावाः मोदी राज में विश्व बैंक के कर्जों का सर्वाधिक भुगतान हुआ। वैसे, इस संदेश में यह जरूर बताया जाता है कि 1947 से 1970 तक विश्व बैंक से लिए कर्जों का कोई डाटा उपलब्ध नहीं है।

असलियतः सरकार ने ऐसी कोई जानकारी नहीं दी। न ही किसी खबर में ऐसा कोई तथ्य उपलब्ध है। 2016 में बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1945 से 2015 तक कुल 102.1 बिलियन डॉलर का कर्ज भारत को मिला। वित्त मंत्रालय ने इसी साल लोकसभा में बताया कि देश पर विश्वबैंक का कुल 103 बिलियन (1 बिलियन = सौ करोड़) डॉलर का कर्ज है।

दावाः 70 साल के इतिहास में केवल 3 साल ऐसे हैं, जब भारत ने विश्व बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया- 2015-16, 2016-17 और 2017-18 में ।

असलियतः विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 1 अप्रैल, 2015 से मार्च, 2018 तक भारत को 50 योजनाओं के लिए 2064 करोड़ डॉलर मिले। इनमें 3 बिलियन डॉलर का सबसे बड़ा कर्ज 15 दिसंबर, 2015 को मिला। इसके अलावा पांच अन्य सबसे बड़े स्वीकृत कर्ज इस प्रकार हैंः

30 जून, 2015 को ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को 1.3 बिलियन डॉलर कर्ज

13 मई, 2016 को ग्रिड कनेक्टेड सोलर प्रोग्राम को एक बिलियन डॉलर

24 जून, 2016 को नॉर्थ ईस्टर्न रीजन पॉवर सिस्टम इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट को 94 करोड़ डॉलर

27 फरवरी, 2018 को महाराष्ट्र प्रोजेक्ट ऑन रीसाइलेंट एग्रीकल्चर को 84 करोड़ डॉलर 12 अप्रैल, 2017 को जल मार्ग विकास के लिए 75 करोड़ का कर्ज

दावाः एक बार फिर मोदी सरकार नामक सोशल मीडिया अभियान में 1.19 लाख ग्राम पंचायतों को भारत नेट योजना के तहत हाई-फाई ब्रॉडबैंड से जोड़ने को बड़ी उपलब्धि बताया गया है।

असलियतः मोदी सरकार के लक्ष्यों के अनुसार मार्च, 2019 तक ढाई लाख ग्राम पंचायत को जोड़ना था। यह समय सीमा पहले 2016 थी। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा ने दिसंबर, 2018 में लोकसभा को बताया कि 1.21 लाख ग्राम पंचायतों को ब्राडबैंड से जोड़ा गया है। ग्राम पंचायतों को ब्राडबैंड से जोड़ना मोदी सरकार के 2014 में मंत्रिमंडल में पारित डिजिटल इंडिया का सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य था। मसौदे के अनुसार, दिसंबर, 2016 तक ढाई लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जाना था। बाद में यह भी लक्ष्य तय किया गया कि गांवों में यह नेटवर्क घर-घर पहुंचाना है। फाइनेंनशियल एक्सप्रेस की नवंबर, 2018 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 1.15 लाख पंचायतों के ऑप्टिकल फाइबर के जुड़ने के बावजूद केवल 10 फीसदी ग्रामीण परिवारों या संस्थाओं को लास्ट माइल कन्क्टिविटी उपलब्ध हो पाई है।

दावाः पिछले 5 साल में 25 नए एयरपोर्ट जोड़े गए। खुद प्रधानमंत्री ने सितंबर, 2018 में सिक्किम एयरपोर्ट का उद्घाटन करते हुए भाषण में और फिर एक ट्वीट में बताया था कि हमारे 100 एयरपोर्ट चालू हो गए हैं। इनमें से 35 एयरपोर्ट बीते 4 वर्षों में जुड़े हैं। आजादी के बाद से साल, 2014 यानि 67 सालों के बाद भी देश में 65 एयरपोर्ट थे यानि 1 वर्ष में औसतन 1 हवाई अड्डा बनाया गया। बीते 4 वर्षों में औसतन एक साल में 9 एयरपोर्ट तैयार हुए हैं।

असलियतः 25 या 35 नए एयरपोर्ट चालू करने का दावा भ्रामक और असत्य है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट 2017-18 के अनुसार, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के 129 एयरपोर्ट थे जिनमें 23 अतंरराष्ट्रीय, 78 घरेलू, 20 सैन्य क्षेत्र में बने एयरपोर्ट और 8 कस्टम्स एयरपोर्ट थे। अगस्त, 2018 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था कि इन 129 एयरपोर्टों में से सैन्य क्षेत्र के 20 सिविल एन्कलेव (एयरपोर्ट) सहित 101 हवाई अड्डे ऑपरेशनल थे। नागरिक उड्डयन मंत्रालय की 2013-14 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, मार्च, 2014 के अंत तक एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के 125 एयरपोर्ट थे जिनमें 94 एयरपोर्ट ऑपरेशनल थे। यानि 2014 से 2018 के बीच केवल 7 हवाई अड्डे ऑपरेशनल हुए। प्रधानमंत्री मोदी हवाईअड्डों की संख्या कहां से ले आए, यह तो उनका कार्यालय ही बता सकता है। जहां तक सिक्किम एयरपोर्ट का सवाल है, उसे 2008 में बनना था। खुद मोदी सरकार ने जुलाई, 2014 में लोकसभा में बताया था कि इसका 82 फीसदी काम पूरा हो गया है, यानी बाकी 18 फीसदी काम पूरा करने में 4 साल लगा दिए। यह है मोदी राज में 1 साल में 9 एयरपोर्ट बनने की असली तस्वीर।

दावाः भारतीय रेल की उपलब्धियों को लेकर भी मोदी सरकार नहीं अघाती है।

असलियतः ‘डाउन टु अर्थ’ पत्रिका ने एक आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर बताया है कि पुराने और जर्जर ट्रैक के नवीनीकरण में भी यूपीए-2 की तुलना में मोदी सरकार फिसड्डी है। यूपीए-2 के शासनकाल में हर साल औसत 3357 किलोमीटर ट्रैक का नवीनीकरण हुआ और वर्तमान सरकार में हर साल औसतन 3027 किलोमीटर ट्रैक का। ट्रेनों के विलंब का भी आंकड़ा सुन कर माथा चकरा जाता है। 2017-18 और 2018-19 में रेकार्ड 10 लाख ट्रेनें विलंब से पहुंचीं या देर से चलीं। और तो और, मोदी राज के तीन सालों में रेल के 20 करोड़ यात्री कम हुए हैं।

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