क्या मारे गए हैं नेतन्याहू? सोशल मीडिया पर जारी अटकलों के पांच कारण
अगर आप ग्रोक से पूछें कि क्या वे वीडियो, तस्वीरें और दावे 'सच' हैं जिनमें कहा गया है कि इज़रायली पीएम की मौत हो गई है, तो शायद आपको बताया जाएगा कि यह ईरान द्वारा युद्ध के समय फैलाए जा रहे झूठे प्रोपेगैंडा का हिस्सा है। लेकिन अटकलें तो लग ही रही हैं।

"किसी को परवाह नहीं कि नेतन्याहू ज़िंदा हैं या मारे गए हैं। सभी ज़ोयनिस्ट (यहूदी) नेतन्याहू जैसे ही हैं।" यह टिप्पणी तेहरान यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सैयद मोहम्मद मरांडी ने शनिवार को एक्स पर की गई एक पोस्ट में की। प्रोफेसर मरांडी ईरान पर इज़रायली-अमेरिकी हमले के बारे में सबसे ज़्यादा इंटरव्यू देने वाले ईरानी हैं। उनकी यह पोस्ट इज़रायली प्रधानमंत्री के ठिकाने को लेकर कई दिनों से चल रही ज़ोरदार अटकलों के बाद आई है। ख़बरों के मुताबिक, नेतन्याहू 9 मार्च 2026 के बाद से सार्वजनिक रूप से कहीं नजर नहीं आए हैं।
नेतन्याहू के बारे में लोगों ने ग्रोक से भी पूछताछ की है, लेकिन कयासों और अटकलों का दौर जारी है। ग्रोक ने उन शंकाओं को दूर कर दिया है कि नेतन्याहू के बारे में कुछ गलत हुआ है। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें खूब शेयर की जा रही हैं जिनमें नेतन्याहू जैसे दिखने वाले एक घायल व्यक्ति को एम्बुलेंस में ले जाते हुए दिखाया गया है। ग्रोक बता रहा है कि इजरायली प्रधानमंत्री के घायल होने के 'एक्सक्लूसिव फुटेज' का दावा असली नहीं हैं।
Snopes (12 मार्च) और हिंदुस्तान टाइम्स के फैक्ट-चेक इस बात की पुष्टि करते हैं कि ये तस्वीरें मनगढ़ंत/एआई निर्मित हैं और गुमराह करने वाली हैं। नेतन्याहू ने 12 मार्च को एक लाइव न्यूज़ कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक रूप से बात की थी, और किसी भी विश्वसनीय मीडिया आउटलेट ने उनके घायल होने की कोई खबर नहीं दी है। यह उन अफ़वाहों से मेल खाता है जिन्हें ईरानी सरकारी मीडिया मार्च की शुरुआत से ही फैला रहा है।
28 फरवरी को जब इज़राइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला किया, तब से बेंजामिन नेतन्याहू सार्वजनिक तौर पर बहुत कम ही नज़र आए हैं। शुरू में ऐसी खबरें आई थीं कि सुरक्षा कारणों से उनके सरकारी विमान को बर्लिन या साइप्रस में खड़ा कर दिया गया है। इसके बाद ऐसी खबरें आईं कि वे अपना ज़्यादातर समय अपने विमान में उड़ते हुए बिता रहे हैं। हालांकि, पिछले एक हफ़्ते से इज़राइल के अंदर या बाहर की मीडिया रिपोर्टों में उनका ज़िक्र बहुत कम हुआ है; सिवाय एक AI-निर्मित भाषण के, जिसमें कथित तौर पर उन्होंने यह दावा किया था कि इज़राइल दुनिया में एक महाशक्ति के रूप में उभरने वाला है।
तेल अवीव में तबाह हुए एक घर की तस्वीरें, एम्बुलेंस में रखे जा रहे एक शव की तस्वीर, और मलबे के बीच बेजान पड़े एक हमशक्ल की तस्वीर—ये सब इस दावे के साथ फैलने लगीं कि इज़राइल के प्रधानमंत्री की एक मिसाइल हमले में मौत हो गई है। इस बारे में कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि नहीं हुई थी, और मुख्यधारा के मीडिया ने युद्ध के माहौल में फैली इस बेबुनियाद अटकलबाज़ी को एक और झूठा प्रोपेगैंडा मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। लेकिन, विश्वसनीय सूत्रों और 'विशेषज्ञों' को अटकलें लगाने से कौन रोक सकता है।
अगर नेतन्याहू गंभीर रूप से घायल नहीं है, या कोमा में नहीं है, या अगर उनकी मौत नहीं हुई है, तो लोग तो कयास लगाएंगे ही कि अस्तित्व की इस लड़ाई के बीच वह अचानक चुप क्यों हो गए हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उनके लिए तो किसी मीटिंग में, हवाई जहाज़ में, अपने दफ़्तर या बंकर में, या फिर अपने घर पर भी दिखाई देना काफ़ी आसान होता। तो फिर, वह कहां हैं? इस तरह की अटकलों के पीछे कई वजहें रही हैं।
कयास लगाने वालों ने इज़राइली प्रधानमंत्री के दफ़्तर से किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट की ओर इशारा किया, जिसमें नागरिकों से प्रधानमंत्री के बारे में फैल रही अफ़वाहों को नज़रअंदाज़ करने को कहा गया था। हालांकि, उस पोस्ट को बाद में हटा दिया गया। ऐसे में सवाल यह है कि ऐसा क्यों किया गया। उन्होंने तेल अवीव में हुई एक सुरक्षा समीक्षा बैठक का भी ज़िक्र किया, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री काट्ज़ ने की थी, लेकिन इसमें प्रधानमंत्री शामिल नहीं हुए थे। उन्होंने कहा कि यह एक असामान्य बात थी। तीसरी वजह प्रधानमंत्री के बेटे, यायर नेतन्याहू हैं, जो 9 मार्च 2026 के बाद से पूरी तरह से चुप हैं। कहा जाता है कि ग्रोक ने इस बात की पुष्टि की थी कि वह सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति थे, और अक्सर एक दिन में 50 या 60 पोस्ट किया करते थे। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे व्यक्ति का अचानक सोशल मीडिया से दूर हो जाना एक असामान्य बात है।
ताज़ा अटकलें यह हैं कि एक-दो दिन में ऐलान कर दिया जाएगा कि स्वास्थ्य तकलीफों के चलते नेतन्याहू नहीं रहे। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है कि यह अटकल भी गलत ही साबित होगी, क्योंकि जंग में तो किसी की भी जान नहीं जानी चाहिए, वह सैनिक हो, राष्ट्राध्यक्ष हो, ईरान या इज़रायल के आम नागिरक हों या फिर नेतन्याहू हों। वैसे भी कहावत है कि, जंग में सबसे पहले सच की ही बलि चढ़ती है।
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