हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल- क्या धर्म का अधिकार निर्धारित ड्रेस वाले स्कूल में भी हो सकता है लागू?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसे जज आते हैं जो तिलक लगाते हैं या पगड़ी पहनते हैं। इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि इसे धर्म से न जोड़ें। पगड़ी धर्म से जुड़ी नहीं है और उनके दादाजी अदालत में इसे पहना करते थे।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

कर्नाटक के हिजाब प्रतिबंध विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी भी व्यक्ति को धर्म का पालन करने का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अधिकार निर्धारित यूनिफॉर्म वाले स्कूल में भी लागू हो सकता है? कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या सेकुलर देश के सरकारी स्कूल में धार्मिक पोशाक पहन सकते हैं? ’ मामले में अगली सुनवाई आज फिर होगी।

सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक सरकार द्वारा राज्य के शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने के आदेश को हटाने से इनकार करने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि आपके पास किसी भी धर्म को मानने का अधिकार हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उस स्कूल में धर्म का पालन कर सकते हैं जहां निर्धारित यूनिफॉर्म है? क्या कोई विद्यार्थी उस स्कूल में हिजाब पहन सकती है जहां निर्धारित यूनिफॉर्म है।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि यह मुद्दा काफी सीमित है और यह शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन से संबंधित है। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि अगर कोई लड़की हिजाब पहनती है तो स्कूल में अनुशासन का उल्लंघन कैसे होता है?’ इस पर एएसजी ने कहा, “अपनी धार्मिक प्रथा या धार्मिक अधिकार की आड़ में कोई यह नहीं कह सकता कि मैं ऐसा करने का हकदार हूं, इसलिए मैं स्कूल के अनुशासन का उल्लंघन करना चाहता हूं।”

वहीं, कर्नाटक के महाधिवक्ता प्रभुलिंग नवदगी ने राज्य सरकार के 5 फरवरी, 2022 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसके जरिये स्कूल-कॉलेजों में समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने वाले कपड़े पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे कुछ मुस्लिम छात्राओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। नवदगी ने कहा कि राज्य ने नहीं बल्कि शैक्षणिक संस्थानों ने यूनिफॉर्म निर्धारित किए हैं। उन्होंने कहा कि यह सरकारी आदेश छात्रों के किसी भी अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करता है।


याचिकाओं का विरोध कर रहे सरकारी वकीलों के यह पूछे जाने पर कि क्या हिजाब पहनना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक अनिवार्य अभ्यास है, पीठ ने कहा कि इस मुद्दे को थोड़ा अलग तरीके से समझा जा सकता ह। यह जरूरी हो भी सकता है और नहीं भी। पीठ ने कहा, “हम जो कह रहे हैं वो यह है कि क्या आप किसी सरकारी संस्थान में अपनी धार्मिक रवायत के पालन पर जोर दे सकते हैं। क्योंकि संविधान की प्रस्तावना कहती है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं।”

वहीं मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसे जज आते हैं जो तिलक लगाते हैं या पगड़ी पहनते हैं। इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि इसे धर्म से न जोड़ें। पगड़ी धर्म से जुड़ी नहीं है और उनके दादाजी अदालत में इसे पहना करते थे। इसके बाद धवन ने कहा कि अदालत के समक्ष मुद्दा उन लाखों महिलाओं से संबंधित है, जो शैक्षणिक संस्थानों में ड्रेस कोड का पालन करती हैं, लेकिन उसके साथ हिजाब भी पहनना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि मामले में शीर्ष अदालत का फैसला महत्वपूर्ण होगा। यह अदालत जो फैसला देगी उसे पूरी दुनिया देखेगी।

सुनवाई के दौरान आई दलीलों पर पीठ ने कहा कि अगर कर्नाटक शिक्षा अधिनियम ड्रेस कोड निर्धारित करने की अनुमति नहीं देता है, तो सवाल यह है कि क्या अधिनियम ड्रेस कोड को प्रतिबंधित कर सकता है। साथ ही पीठ ने पूछा, ‘क्या छात्राएं मिनी, मिडी या जो पोशाक वो चाहें, पहनकर आ सकती से यह सवाल किया जो दलील रख रहे थे. इस तर्क पर कि हिजाब प्रतिबंध से महिलाएं शिक्षा से वंचित रह सकती हैं, पीठ ने कहा कि राज्य यह नहीं कह रहा है कि वह किसी भी अधिकार से इनकार कर रहा है। पीठ ने कहा, ‘राज्य यह कह रहा है कि आप उस यूनिफॉर्म में आएं जो विद्यार्थियों के लिए निर्धारित है….’हैं?’

कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने जोर दिया कि इस मामले में सर्वोच्च अदालत का फैसला समाज के एक बड़े वर्ग की शिक्षा पर असर डालेगा। उन्होंने कर्नाटक शिक्षा कानून, 1983 के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। हेगड़े ने कहा कि राज्य की कार्यकारी शक्ति मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती है। इस तर्क पर कि हिजाब प्रतिबंध से महिलाएं शिक्षा से वंचित रह सकती हैं, पीठ ने कहा कि राज्य यह नहीं कह रहा है कि वह किसी भी अधिकार से इनकार कर रहा है। राज्य यह कह रहा है कि आप उस यूनिफॉर्म में आएं जो विद्यार्थियों के लिए निर्धारित है।


इससे पहले शीर्ष अदालत ने पिछले हफ्ते इन याचिकाओं पर कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी किया था। कर्नाटक सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि यह कानून का मामला है और कोई जवाब दाखिल करने की जरूरत नहीं है।

बता दें कि हिजाब को लेकर यह विवाद सबसे पहले कर्नाटक के उडुपी जिले के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में तब शुरू हुआ था, जब दिसंबर 2021 में छह लड़कियों को हिजाब पहनकर आने पर कॉलेज में प्रवेश से रोक दिया गया था। उनके हिजाब पहनने के जवाब में कॉलेज में हिंदू विद्यार्थी भगवा गमछा पहनकर आने लगे और धीरे-धीरे यह विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैल गया, जिससे कई जगह शिक्षण संस्थानों में तनाव का माहौल पैदा हो गया था।

इस विवाद के बढ़ने के बाद फरवरी 2022 में कर्नाटक सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में समानता, अखंडता और लोक व्यवस्था को बाधित करने वाले कपड़े पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हिजाब विवाद पर सुनवाई करते हुए 15 मार्च को कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि हिजाब पहनना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और उसने कक्षाओं में हिजाब पहनने की अनुमति देने संबंधी मुस्लिम छात्राओं की याचिकाएं खारिज कर दी थी और राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध बरकरार रखा था। इसी आदेश को मुस्लिम लड़कियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

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