‘कश्मीर में बीडीसी चुनाव का बेतुका फैसला मौजूदा हालात से ध्यान भटकाने के अलावा कुछ नहीं’

केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में बीडीसी चुनावों का ऐलान घाटी के मौजूदा हालात और आम लोगों की तकलीफों से दुनिया का ध्यान भटकाने के अलावा कुछ नहीं है। यह कहना है कि राजनीतिक विश्लेषकों का, जो इस फैसले को एकदम बेतुका मानते हैं।

फोटो : Getty Images
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गुलजार बट

सरकार ने कश्मीर में ब्लॉक डेवलेपमेंट काउंसिल (बीडीसी) चुनाव कराने का ऐलान किया है। सरकार के इस फैसले को बेतुका ही कहा जा सकता है, क्योंकि मौजूदा हालात में पंचायत सदस्य और राजनीतिक दलों के नेता, दोनों ही पाबंदियों का शिकार हैं। सरकार ने ऐलान किया है कि 310 ब्लॉक में 24 अक्टूबर को चुनाव होगा, जिसमें राजनीतिक दल हिस्सा लेंगे।

गौरतलब है कि पंच और सरपंच, जो बीडीसी चुनाव में मतदाता होते हैं, चुनाव के बाद से ही छिपे-छिपे फिर रहे हैं। ये लोग जमीनी स्तर पर चुनावी लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन लोगों के लिए तो हालात और भी बदतर हो गए हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिया है।

दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के एक सरपंच का कहना है कि, “किस चुनाव की बात कर रहे हैं ये लोग। यह लोकतंत्र को शर्मिंदा करने वाला कदम है। हम पर दोहरी मार पड़ी है। पहले आतंकी हमारे दुश्मन थे, और अब पुलिस हमारा पीछा कर रही है।” यह सरपंच पीडीपी का सदस्य है। उसका कहना है कि वह पुलिस और आतंकी, दोनों से बचने के लिए इधर-उधर छिपता फिरता है। उसने आगे कहा, “….और ये ऐसे में चुनाव कराना चाहते हैं।” इस सरपंच के मुताबिक उसे किसी किस्म की सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई है। सिर्फ कुछ पंचायत सदस्यों को ही श्रीनगर के किसी होटल में रहने की जगह दी गई है।

पिछले साल नवंबर-दिसंबर में जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव हुए थे। हालांकि मुख्य विपक्षी पार्टियों पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने इसका बहिष्कार कि. था, लेकिन फिर भी चुनाव आयोग ने आतंकियों की धमकी के बीच चुनाव कराया था।

बाद में इन चुनावों को बड़े पैमाने पर कामयाब होने का प्रचार किया गया और अधिकारियों ने इसमें 74 फीसदी तक मतदान के दावे किए। जम्मू और लद्दाख में अनुमानुसार ज्यादा लोगों ने मतदान किया था, लेकिन घाटी में मतदान केंद्रों पर बहुत कम लोग नजर आए थे। इस सबके चलते पंच और सरपंच की 60 फीसदी से ज्यादा खाली रह गई थीं, क्योंकि इन सीटों पर कोई नामांकन ही नहीं हुआ था। ऐसे में बहुत से पंच और सरपंच निर्विरोध भी चुन लिए गए थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुल 7596 पंचों में से 3500 निर्विरोध चुने गए थे। इसी तरह 500 से ज्यादा सरपंच भी बिना किसी चुनाव के जीते थे।

Political arrests and BDC elections

बहुत से पंचायत सदस्य अब पार्टी के आधार पर बीडीसी चुनाव कराने के तर्क पर सवाल उठा रहे हैं। पुलवामा के एक सरपंच का कहना है कि, “कश्मीर में न तो राजनीतिक लोकतंत्र बचा है और न ही राजनीतिक दल। बीजेपी के अलावा सभी राजनीतिक दलों के नेताओँ को अलग-अलग थानों के हवालात में बंद कर दिया गया है।”

ध्यान रहे कि 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले से पहले ही राज्य के तीन मुख्यमंत्रियों, और सैकड़ो राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था। जो अभी तक रिहा नहीं हुए हैं।

बीडीसी चुनाव की घोषणा के बाद अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने जम्मू में सभी राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया है। लेकिन घाटी के नेता अभी तक हिरासत में हैं और इस बारे में प्रशासन अभी तक चुप्पी साधे हुए है।

जम्मू के एक नेशनल कांफ्रेंस नेता ने कहा कि इन चुनावों के बहाने बीजेपी न सिर्फ दूसरे राजनीतिक दलों का गला घोंटना चाहती है बल्कि सबकुछ सामान्य होने का ढोल भी पीटना चाहती है। घाटी के एक राजनीतिक विश्लेषक ने नेशनल हेरल्ड को बताया कि बीडीसी चुनाव मौजूदा हालात से दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं है।

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