कैसे कर सकते हैं सीबीएसई परीक्षा नतीजों पर यकीन?
नया ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (ओएसएम) पूरी तरह सही है, इसे लेकर शक पैदा हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सिस्टम में ही कोई भ्रष्ट तंत्र सक्रिय है?

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 2026 के शुरू में भारत की परीक्षा प्रणाली में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) नाम से एक बड़े बदलाव की शुरुआत की और इसे क्रांतिकारी सुधार बताया। इस बाबत किए गए वादे काफी प्रभावशाली थे- जैसे मानकीकृत मार्किंग, तेज नतीजे, पारदर्शिता, इंसानी गलतियों का खात्मा, और घर या विदेश से भी दूरस्थ मूल्यांकन सुविधा।
लेकिन, यह प्रयोग न सिर्फ बुरी तरह विफल रहा, बल्कि सिस्टम और साइबर सुरक्षा से जुड़ी तमाम खामियां भी उभर कर सामने आ गईं। ‘ओएसएम’ का ऐलान 9 फरवरी 2026 को किया गया था। उस समय 17 फरवरी से शुरू होने वाली 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में हफ्ता भर ही बचा था। इसके बाद 3 मार्च से यह मूल्यांकन विधि लागू कर दी गई, यानी एक माह से भी कम समय के भीतर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का परीक्षार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ सालाना संवाद ‘परीक्षा पर चर्चा’ 9 फरवरी को देशभर में प्रसारित हुआ था। जाहिर है, यह महज इत्तेफाक नहीं था। (हालांकि, छात्रों और शिक्षकों की तमाम शिकायतों और 13 मई 2026 को घोषित नतीजों को रद्द करने की उठ रही मांगों के बावजूद, प्रधानमंत्री ने तब से इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।)
ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि आखिर एक निहायत नए मार्किंग सिस्टम को लागू करने की ऐसी क्या जल्दबाजी थी?
सीबीएसई इस नए सिस्टम का पायलट टेस्ट करने या इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का फैसला लेता तो शुरू में ही सुरक्षा संबंधी खामियां शायद पकड़ में आ जातीं और उन्हें दुरुस्त कर लिया जाता। लेकिन, बिना जरूरी जांच-पड़ताल नए सिस्टम को लागू करने का नतीजा यह हुआ कि पोर्टल क्रैश हुए, लॉगिन फेल हुए, इंटरफेस धीमे लोड हुए, स्कैन की गुणवत्ता भी खराब रही। कुछ उत्तर पुस्तिकाएं धुंधली थीं या गायब, और कहीं सप्लीमेंट्री शीट गायब थी तो कुछ कहीं और लिंक हो गई थीं।
एक अनुमान के मुताबिक, मूल्यांकन प्रक्रिया में 25 से 30 हजार शिक्षकों ने हिस्सा लिया। लेकिन कई शिक्षकों का कहना है कि उनकी ट्रेनिंग केवल तुरत-फुरत आयोजित वेबिनार और ‘मॉक इवैल्यूएशन’ तक सीमित रही। कुछ मूल्यांकनकर्ताओं ने बताया कि उन्हें अभ्यास के लिए एक हफ्ते से भी कम समय मिला, जबकि अन्य का कहना था कि कॉपियां जांचने की यह प्रक्रिया नतीजे घोषित होने से एक दिन पहले तक चलती रही।
इस दौरान मूल्यांकनकर्ताओं को अपने नियमित शिक्षण और प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ कॉपी जांचने का काम भी संभालना पड़ा। ध्यान रखें, इन्हीं लोगों ने चुनावी राज्यों में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) की ड्यूटी भी निभाई। कड़ी निगरानी के बीच इस तरह कई मोर्चों पर एक साथ काम करना बेहद तनावपूर्ण था और इससे मूल्यांकन की गुणवत्ता से भी समझौता हुआ। इसके अलावा, कई शिक्षकों ने लगातार स्क्रीन देखने से थकान की भी शिकायत की।
दिल्ली यूनिवर्सिटी की पूर्व डीन और स्कूल एजुकेशन की प्रोफेसर, अनीता रामपाल ने एक पैनल चर्चा में कहा, ‘हम इंसानी सोचने-समझने की प्रक्रियाओं को, जिन्हें खास तरीके से किया जाना चाहिए, किसी ऐसी चीज से नहीं बदल सकते जो बिना सोचे-समझे काम करती हो। आप आंसर शीट महज स्क्रॉल करके ऐसे ही नहीं जांच सकते। इन्हें पता होता है कि उन पर लोगों की नजर है। वहां कैमरे होते हैं। किसी को ज्यादा समय लगता, तो वे कहते उन्हें कोई फोन आ गया था… यह मूल्यांकनकर्ता इस सवाल पर इतना ज्यादा वक्त क्यों ले रहा? हम रोबोट नहीं हैं, और हमें इंसानों को रोबोट नहीं बनाना चाहिए।’
सीबीएसई का दावा था कि ओएसएम से सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन की मांग में भारी कमी आएगी, लेकिन अब यह एक भद्दा मजाक जैसा लगता है। अपने नंबरों और सिस्टम की अव्यवस्था से निराश होकर इस बार रिकॉर्ड 4 लाख से ज्यादा छात्रों अपनी कॉपी दोबारा जांचने की मांग की। यह आंकड़ा पिछले साल के आंकड़ों से चार गुना ज्यादा है।
सीबीएसई का यह आश्वासन कि ‘डिजिटल लॉग’' (यह रिकॉर्ड रखकर कि किसने, क्या और कब जांचा) पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाएंगे, इस अहम सवाल को ही नजरअंदाज कर गया कि क्या यह सिस्टम वास्तव में सुरक्षित है? जितनी आसानी से इस सिस्टम को हैक कर लिया गया, उसने पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया को ही संदेह के घेरे में ला दिया है और कई तरह के असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर ऐसी जल्दबाजी में इस नए सिस्टम का रुख करने की जिद किसकी थी?
वेंडर का चयन कैसे किया गया?
क्या इस पूरे खेल में कुछ गड़बड़ी करने वाले तत्व सक्रिय थे?
और सीबीएसई आखिर किस आधार पर इन नतीजों की विश्वसनीयता का दावा कर रहा है?
हालांकि दुनिया भर के विश्वविद्यालयों और बोर्डों ने मूल्यांकन प्रक्रिया डिजिटल की है, लेकिन इतनी कम तैयारी के साथ या इतने बड़े पैमाने पर यह कहीं नहीं हुआ। ज्यादातर मामलों में, बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई वर्षों तक पायलट टेस्टिंग, क्षमता निर्माण, बुनियादी ढांचे की मजबूती और आकस्मिक योजना बनाने पर काम हुआ। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन का एक्यूए परीक्षा बोर्ड ओएसएम के जरिये 13 लाख छात्रों का मूल्यांकन करता है, जिसके लिए वहां 60,000 प्रशिक्षित परीक्षक होते हैं- यह संख्या सीबीएसई द्वारा अपने कहीं ज्यादा बड़े समूह के लिए नियुक्त परीक्षकों की संख्या से दोगुनी है। सीबीएसई के फेल होने में न सिर्फ जल्दबाजी, बल्कि आधे-अधूरे प्रशिक्षितों और अस्थिर आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर का भी योगदान रहा।
टेक्नोलॉजी वेंडर का चयन भी विवादित रहा। कोएम्प्ट एडुटेक (पूर्व में ग्लोबारेना टेक) को अगस्त 2025 में ठेका मिला, जिससे उसे एक बेहद जरूरी सिस्टम तैयार करने, उसके परीक्षण, प्रशिक्षण और लागू करने के लिए छह महीने से भी कम समय मिला।
राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने वेंडर चयन पर सवाल उठाए। उन्होंने 2019 में तेलंगाना के इंटरमीडिएट एग्जाम के मूल्यांकन से जुड़े कंपनी के दागदार ट्रैक रिकॉर्ड का मुद्दा उठाया। इसमें स्कैन की गुणवत्ता में खराबी और मार्किंग में गलतियों का अफसोसनाक अंजाम कई छात्रों की खुदकुशी रहा।
वेंडर के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए तकनीकी, सुरक्षा और नैतिक पैमानों पर की गई ‘जांच-पड़ताल’ की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े होते हैं। सीबीएसई ने न तो वेंडर के चयन या टेंडर के मापदंडों का खुलासा किया, और न ही यह सार्वजनिक किया है कि अन्य बोलीदाता कौन थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर टेंडर की दौड़ में कोई और भी शामिल था, तो उसे दरकिनार कर एक दागी वेंडर को ही क्यों चुना गया?
मूल्यांकनकर्ताओं के प्रशिक्षण में हुई देरी और इसकी आधी-अधूरी शुरुआत एक और खतरे की घंटी है। अगर यह ठेका अगस्त 2025 में ही दे दिया गया था, तो फिर ट्रेनिंग इतनी देर से 2026 में क्यों शुरू की गई?
सीबीएसई की तब और फजीहत हुई, जब 25 फरवरी 2026 को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के 19 वर्षीय छात्र निसर्ग अधिकारी ने ओएसएम पोर्टल को हैक कर लिया। न्यूज पोर्टल ‘मनीकंट्रोल’ से बात करते हुए उसने कहा, ‘मेरे मन में उत्सुकता जगी। उन्होंने कॉपियों के डिजिटल मूल्यांकन के लिए एक नया पोर्टल (http://cbse.onmark.co.in) लॉन्च किया था। मैंने थोड़ी छानबीन की और मुझे यह डोमेन मिल गया। शिक्षक पहले से ही इसका इस्तेमाल कर रहे थे और ऑनलाइन इसके वीडियो भी मौजूद थे।’
उसने वेबसाइट की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जावास्क्रिप्ट फाइलों को खंगाला और एक साधारण कीबोर्ड कमांड (Ctrl+F) के जरिये ‘मास्टर पासवर्ड’ खोज निकाला। सिस्टम के अंदर उसे जो दिखा, उसके शब्दों में वह ‘भयानक’ था।
एक सार्वजनिक ब्लॉगपोस्ट में, इस किशोर ने पांच गंभीर तकनीकी खामियों को उजागर किया, जिनमें ‘ऑथेंटिकेशन बायपास (लॉगिन प्रक्रिया को चकमा देने) से लेकर पूरे अकाउंट पर कब्जा कर लेने’ तक की कमियां थीं:
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्कूल कोड और ‘फ्रंट-एंड’ (वेबसाइट के बाहरी हिस्से) पर ही लीक हुए ‘मास्टर पासवर्ड’ का इस्तेमाल करके कोई भी व्यक्ति परीक्षक के तौर पर सिस्टम में लॉग इन कर सकता था।
ओटीपी वेरिफिकेशन महज ‘दिखावा’ था, क्योंकि इसका ‘सीक्रेट कोड’ ब्राउजर पर ही था।
सिस्टम में कोई ‘रूट गार्ड’ (सुरक्षा घेरा) न होने से यह एक खुले दरवाजे जैसा था; यानी आप बिना ऑथेंटिकेशन अंदरूनी पन्नों तक पहुंच सकते थे।
निसर्ग ने लिखा, ‘राष्ट्रीय स्तर की किसी बोर्ड परीक्षा की विश्वसनीयता पर पड़ने वाले असर खुद-ब-खुद सब कुछ बयां कर देते हैं।’ जब उसने उसी दिन ‘सर्ट-इन’ (CERT-In: कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम-इंडिया) को इन खामियों की जानकारी दी, तो उन्होंने उससे विस्तृत जानकारी और वीडियो सबूत मांगे। साथ ही आश्वस्त किया कि वे इस मामले को सीबीएसई के सामने उठाएंगे। कुछ खामियों को तो वाकई ठीक कर दिया गया, लेकिन अन्य को जस-का-तस छोड़ दिया।
मई में निसर्ग ने एक और तकनीकी खामी का पता लगाया, जिससे मूल्यांकनकर्ताओं के यूजरनेम, पासवर्ड और बैंक से जुड़ी जानकारियां उजागर हो रही थीं। उसने एक बार फिर ‘सर्ट-इन’ को बताया। हालांकि, इस बार उसे केवल एक ई-मेल के जरिये पावती ही मिली।
26 मई को, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘जब एक राष्ट्रीय स्तर की बोर्ड परीक्षा का सिस्टम इतनी आसानी से हैक किया जा सकता है, तो यह सवाल सिर्फ साइबर सुरक्षा का नहीं रह जाता। यह निष्पक्षता, भरोसे और लाखों छात्रों के भविष्य का सवाल बन जाता है।’ आईएफएफ ने स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव और सर्ट-इन के महानिदेशक को इस बारे में पत्र लिखा। इसने सीबीएसई द्वारा ओएसएम पोर्टल की सेवा लेने, उसे लागू करने और उसके संचालन की मंत्रालय स्तर की जांच की मांग की है। इसके अलावा, वेंडर के साथ हुए करार और उसकी जवाबदेही की समीक्षा करने, 12वीं कक्षा के नतीजों के मूल्यांकन की फोरेंसिक जांच सहित तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने, तथा एक स्वतंत्र सार्वजनिक ऑडिट कराकर उसके नतीजों को सार्वजनिक करने की भी मांग की।
सच्चाई को स्वीकार करने से सीबीएसई इस कदर कतरा रहा था कि शुरू में उसने इससे ही इनकार कर दिया कि पोर्टल लाइव था; उसका दावा था कि निसर्ग ने किसी ‘डमी’ साइट को हैक किया है। लेकिन, जब निसर्ग ने यह ध्यान दिलाया कि यह डोमेन छात्रों को भेजे गए सीबीएसई के आधिकारिक संवाद में भी साझा किया गया था, तो पोर्टल को गुपचुप बंद कर दिया गया।
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