अब ‘पाताल लोक’ में भी दिखा इस्लामोफोबिया, अखिर कब तक मुसलमानों की आस्था पर की जाएगी चोट?

चर्चित वेबसीरीज ‘पाताल लोक’ में फ़ज़ाइले आमाल जैसी इस्लामी किताबों को जेहादी साहित्य बताने को लेकर मुसलमानों में काफी नाराजगी है और निर्माताओं और वेबसीरीज की सोच को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ये सभी किताबें तबलीग से जुड़ी हैं और जीवन जीने के इस्लामी तौर-तरीके बताती हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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आस मोहम्मद कैफ

लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म अमेजॉन पर रिलीज हुई वेब सीरीज 'पाताललोक' काफी चर्चित हो रही है। यह वेब सीरीज बॉलीवुड अभिनेत्री और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली की पत्नी अनुष्का शर्मा ने प्रोड्यूस की है। तकनीक और विषय के स्तर पर काफी बढ़िया यह वेबसीरीज इस्लामोफोबिया पर करारी चोट करती है और साथ ही बताती है कि कैसे एक सामान्य अपराध को भी आतंकी घटना बनाते हुए सनसनीखेज बनाकर पेश किया जा सकता है!

लेकिन इन तमाम खूबियों के बावजूद 'पाताललोक' विवादों में घिर गई है। इस वेब सीरीज की एक बड़ी गलती सवालों के घेरे में आ गई है। इस्लामोफोबिया पर करारी चोट करती इस वेबसीरीज में एक गलती की वजह से मुसलमानों की आस्था पर गहरी चोट पड़ी है। दरअसल वेबसीरीज में फ़ज़ाइले आमाल, जन्नत का ज़ेवर और दावत जैसी इस्लामी किताबों को जेहादी साहित्य बता दिया गया है। इसी को लेकर मुसलमानों में काफी नाराजगी है और निर्माताओं और वेबसीरीज की सोच को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह सारी किताबें तबलीग से जुड़ी हैं और जीवन जीने के इस्लामी तौर-तरीके बताती हैं।

पाताल लोक की कहानी के मुताबिक चार अपराधियों को एक बड़े मीडिया पर्सनल्टी की हत्या करने की सुपारी मिलती है, लेकिन चारों पकड़े जाते हैं। सुपारी यूपी का एक बड़ा राजनेता देता है। इसकी जांच दिल्ली पुलिस करती है, लेकिन बाद में सीबीआई को जांच सौंप देती है और सीबीआई सामान्य आपराधिक साजिश में पाकिस्तान, नेपाल और मुसलमान तलाश लेती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन चारों अपराधियों में से एक मुजफ्फरनगर का रहने वाला कबीर एम मुसलमान है और उसके एक भाई को लिंचिंग में मारा जा चुका है।

दिल्ली पुलिस की जांच से इतर सीबीआई कबीर एम को दिल्ली के जामिया नगर इलाके के बाटला हॉउस के एक फ्लैट से पकड़ती है। एजेंसी उसके फ्लैट से हथियारों के साथ कुछ उर्दू और अरबी साहित्य की बरामदगी दिखाती है। सीबीआई जिन किताबों को जेहादी लिटरेचर बताती है उनमें फ़ज़ाइले आमाल, जन्नत का ज़ेवर और दावत जैसी किताबें हैं। ये सारी किताबें तबलीग से जुड़ी हैं।बस इसी को लेकर मुसलमानों में सवाल उठ रहे हैं।

‘पाताल लोक’ देख चुके मेरठ के युवा वकार जैद बताते हैं कि वेब सीरीज में यह देखने के बाद वो हैरत में पड़ गए कि ‘फ़ज़ाइले आमाल’ की फोटो यहां क्यों इस्तेमाल की गई है! उन्हें बहुत निराशा हुई और गुस्सा आया। वकार बताते हैं कि उनके पिता महबूब आलम तबलीगी जमात से जुड़े हैं। यह किताब वो पढ़ते हैं। तबलीगी जमात की सबसे बेहतरीन किताब हयातुस्सहाबा और फ़ज़ाइले आमाल सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है। फ़ज़ाइले आमाल का मतलब है ‘आमाल की फजीलत' यानी अच्छे कर्मों से होने वाले फायदे। इस क़िताब में अच्छे कर्म करने की हिदायत दी गई है और सहाबा की जिंदगी की मिसाल देकर उन्हें समझाया गया है। वेब सीरीज में इसे आतंकी लिटरेचर बनाकर पेश किए जाने से उन्हें ठेस पहुंची है।

फ़ज़ाइले आमाल को मज़ाहिर उलूम सहारनपुर के बड़े उस्ताद मौलाना मुहम्मद जिकरिया ने लिखा था। वो कांधला के रहने वाले थे। कांधला शामली जनपद में आता है। यहीं पास में ही थाना भवन है, जहां के मौलाना अशरफ अली थानवी ने ‘बहिश्ते जेवर’ लिखी है। ये दोनों किताबें खासकर देवबंद और तबलीगी जमात से जुड़े मुसलमानों के लगभग हर घर मे पाई जाती हैं। इन दोनों विद्वानों ने इन्हें कुरान और हदीस के सालों अध्ययन के बाद लिखा था। बताया जाता है कि मौलाना जिकरिया ने फ़ज़ाइले आमाल लिखने के लिए 40 साल रिसर्च की। हालांकि मुसलमानों के सभी फिरके इस पर एक राय नहीं रखते, मगर वेब सीरीज में फ़ज़ाइले आमाल की इस तस्वीर से नाराज हैं।

देवबंद के मौलाना अरशद कासमी फ़ज़ाइले आमाल पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि "मौलाना जिकरिया साहब ने इस किताब में हिकायते सहाबा, फ़ज़ाइले नमाज़, फ़ज़ाइले तबलीग़, फ़ज़ाइले जिक्र, फ़ज़ाइले रमज़ान जैसे मामलों पर लिखा है। फ़ज़ाइले का मतलब फायदे से होता है, जैसे कि वो नमाज, जिक्र, रमज़ान और तबलीग़ के फायदे बता रहे हैं। ऐसी बेहद जरूरी इस्लाह करनी वाली किताब को किसी बुरे मकसद से पेश करना निहायत ही एतराज के लायक है।”

कांधला के उस्ताद मौलाना मौहम्मद सुएब सिकंदरपूरी ने इस पर सख्त नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि इसे चूक नहीं कहा जा सकता है। यह जानबूझकर की गई साजिश है। इसके बनाने वालों के विरुद्ध धार्मिक भावनाओं को भड़काने का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। यह किताब तबलीग से जुड़ी है, इसीलिए छवि प्रभावित करने के लिए अब यह तरकीब सोची गई है। वो इसकी मज्जमत करते हैं।

इस विवाद पर बॉलीवुड लेखक-अभिनेता अंबर सलीम कहते हैं, “यहां काम करने वाले लोगों में उर्दू की जानकारी अब कम ही लोगों को है। हो सकता है कि वो दृश्य फिल्माने के लिए बाजार से ये किताबें ऐसे ही खरीद ली गई होंगी, मगर तब भी यह गंभीर चूक है। यह भी अधिक पीड़ादायक है कि उन्हें उर्दू की हर एक किताब आतंकवादी की किताब लगती है। डायरेक्टर ने तब इसे पढ़ा क्यों नहीं! यह चूक भी अपराध से कम नही है।”

गौरतलब है कि इन दिनों फिल्मों और तेजी से फैल रहे वेबसीरीज में इस्लाम और मुसलमानों से जुड़ी चीजें दिखाकर उनकी गलत व्याख्या का चलन जोरों पर है। इससे पहले एक और डिजिटल प्लेटफॉर्म हॉटस्टार पर आई स्पेशल ऑप्स नाम की एक सीरीज में मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ित एक महिला को आत्मघाती हमलावर के तौर पर दिखाया गया था। सादिया कुरेशी नाम की यह महिला बाद में ब्लास्ट नहीं कर पाती है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इसे इस्लामोफोबिया का नाम दिया है।

वेबसीरीज ‘पाताल लोक’ के निर्माताओं या निर्देशकों की तरफ से अब तक इस विवाद पर कोई खेद नहीं जताया गया है। इतने हंगामे के बाद भी निर्माताओं की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना, किसी साजिश की तरफ भी इशारा करता है। यह गलती जानबूझकर की गई है या अंजाने में हुई है, इस पर अब तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आना कई सवालों को जन्म देता है और गहरे तक जड़ें जमा चुके इस्लामोफोबिया की तरफ इशारा करता है।

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