हम हैं कामयाब-9: 'ए.एम.डी.' बड़ी संख्या में सदाचारी और ईमानदार डॉक्टर्स तैयार करने में व्यस्त

मुस्लिम बच्चे और बच्चियों को डॉक्टर बनाने से ए.एम.डी. को निश्चित रूप से सराहना मिली है, लेकिन ए.एम.डी. की अन्य गतिविधियाँ भी प्रशंसा और बधाई के योग्य हैं।

डॉक्टर (प्रोफेसर) मोहम्मद अतहर अंसारी, एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स (AMD) के राष्ट्रीय सचिव
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तनवीर अहमद

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सिर से पाँव तक हिजाब में नज़र आने वाली बच्ची अम्बरीन तैयब ने 2019-20 में जब नीट (NEET) की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों से पास कर डॉक्टर बनने की ओर कदम बढ़ाया तो लोग हैरान रह गए। उसके दोस्त और परिचितों को तो छोड़िए, नीट की तैयारी कराने वाले गैर मुस्लिम शिक्षक अभिषेक सर (बायोलॉजी फैकल्टी) भी हर्षमिश्रित आश्चर्य में पड़ गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि शिक्षा प्राप्त करने में पर्दा कोई बाधा नहीं है। इस बात का इज़हार उन्होंने सार्वजनिक रूप से किया और उस अम्बरीन तैयब की सफलता पर दिल की गहराइयों से बधाई दी, जिसकी अब तक उन्होंने केवल आँखें ही देखी थीं। वे आँखें, जिन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में सेवा करने का सपना देखा था, और अब उस सपने की पूर्ति की ओर बढ़ गई थीं।

शगूफ़ा अंजुम की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है। उसने भी 2019-20 में ही नीट की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों के साथ पास की। शगूफ़ा पटना स्थित न्यू अज़ीमाबाद की ‘मस्जिद उमर इब्न ख़त्ताब’ के इमाम साहब की बेटी है, जो कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनकी पुत्री डॉक्टर बनेगी। इस्लामी वातावरण और पर्दे की व्यवस्था में पली-बढ़ी किसी भी बच्ची के लिए इस विकट और चुनौतीपूर्ण समय में उच्च शिक्षा प्राप्त करना ही कठिन है, फिर नीट की तैयारी आसान कैसे हो सकती थी।

यह तो केवल 2 उदाहरण हैं। ऐसे अनेक उदाहरण ‘ए.एम.डी.’ अर्थात ‘एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स’ की पहचान बन चुके हैं। ए.एम.डी. ने होनहार मुस्लिम बच्चियों को नीट की तैयारी कराने के उद्देश्य से 2019 में पहली बार पहल की, और उसका परिणाम यह हुआ कि ए.एम.डी. के बैनर तले तैयारी कर रही 15 में से 9 मुस्लिम बच्चियाँ नीट की परीक्षा पास कर विभिन्न अस्पतालों से जुड़ गईं। अम्बरीन तैयब (नीट में 653 अंक) ने ए.एम.डी. में पहला स्थान प्राप्त कर ‘जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज’ (अलीगढ़) में प्रवेश लिया, जबकि उमैमा फ़ातिमा (नीट में 652 अंक) और शगूफ़ा अंजुम (नीट में 644 अंक) ने ए.एम.डी. में क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त कर ‘पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल’ (पटना) का रुख किया। इन तीनों और अन्य छात्राओं की सफलता से ए.एम.डी. को ऐसा उत्साह मिला कि 2021 में लड़कियों के साथ-साथ लड़कों की भी कक्षाएँ शुरू कर दी गईं। फिर तो यह सिलसिला ऐसा चला कि हर वर्ष सफलता की नई दास्तानें लिखी जा रही हैं।

ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक हो गया, बल्कि इसके पीछे एक बुद्धिमत्तापूर्ण सोच, निष्ठापूर्ण प्रयास और विद्वत्तापूर्ण योजना मौजूद है। मुस्लिम बच्चियों और बच्चों के लिए नीट की तैयारी का प्रबंध करने का विचार तो बहुत बाद में आया, पहले मुस्लिम डॉक्टरों को एक मंच पर लाने के प्रयास हुए। इस संबंध में ए.एम.डी. के राष्ट्रीय सचिव डॉक्टर (प्रोफेसर) मोहम्मद अतहर अंसारी ने विस्तार से जो कुछ बताया, वह मन-मस्तिष्क के सिरे खोलने वाला है। दरअसल डॉक्टर मोहम्मद अतहर अंसारी ‘नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल’ (पटना) में प्रोफेसर ऑफ पेडियाट्रिक्स हैं, और ‘एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स’ उन्हीं की सोच का परिणाम है। इस सोच को विकसित करने में उनके मित्रों, विशेषकर डॉक्टर साथियों का भरपूर सहयोग रहा। डॉक्टर मोहम्मद अतहर बताते हैं कि “1997 में जब बिहार सरकार की नौकरी मिली तो कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। 2008 में जब नालंदा मेडिकल कॉलेज आया तो विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी के दौरान देखता था कि मुस्लिम डॉक्टरों को मंच पर स्थान ही नहीं मिल रहा। ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। फिर मन में विचार आया कि क्यों न मुस्लिम डॉक्टरों के लिए एक मंच तैयार किया जाए। यह विचार आते ही अपने साथी मुस्लिम डॉक्टरों से बात की, और फिर रास्ते बनते चले गए।”

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डॉक्टर मोहम्मद अतहर अंसारी का कहना है कि मुस्लिम डॉक्टरों का मंच स्थापित करने के उद्देश्य से 2009 में जब हाजीपुर (पटना) में पहली बैठक हुई तो उसमें 32 डॉक्टर और 20 सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। बैठक में मंच का नाम ‘इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ बिहार एंड झारखंड’ तय हुआ और इसी बैनर तले सम्मेलन तथा अन्य गतिविधियों को संचालित करने का निर्णय हुआ। 2011 में ‘एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स’ नाम से एनजीओ का पंजीकरण बिहार में हुआ, जहाँ से संस्था की गतिविधियाँ बढ़ गईं। डॉक्टर मोहम्मद अतहर ने यह भी बताया कि ‘एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स’ का पंजीकरण भी एक कठिन चरण सिद्ध हुआ, क्योंकि एनजीओ के नाम में ‘मुस्लिम’ या ‘इस्लामिक’ की उपस्थिति पर आपत्ति जताई गई। वे कहते हैं कि “मैं हर हाल में ऐसा नाम रखना चाहता था जिससे पहचान प्रकट हो। नाम में ‘इस्लामिक’ या ‘मुस्लिम’ शब्द की मनाही से मुझे बहुत पीड़ा हुई, फिर भी बहुत परामर्शों और प्रयासों के बाद कुछ नए नाम दिए गए और अल्हम्दुलिल्लाह ‘एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम डॉक्टर्स’ को मंजूरी मिल गई।”

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बहरहाल, आगे चलकर ए.एम.डी. के अंतर्गत ‘ए.एम.डी. अकादमी’ की नींव पड़ी और ‘ए.एम.डी. शाहीन’ की भी स्थापना हुई। नीट की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू करने का विचार डॉक्टर मोहम्मद अतहर अंसारी को तब आया जब अपनी बेटी को 2014 में मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा (राजस्थान) भेजा। वे बताते हैं कि “कोटा का वातावरण देखकर मैं चिंतित हुआ। सोचने लगा कि इस्लामी वातावरण में रहने वाली हमारी बेटियाँ गैर इस्लामी वातावरण में किस प्रकार शिक्षा प्राप्त कर पाएँगी।” उस समय तो वे कोई बड़ा निर्णय नहीं ले सके, लेकिन 2019 में जब दूसरी बेटी को नीट की तैयारी करानी थी तो पटना में ही होनहार मुस्लिम बच्चियों के लिए कोचिंग शुरू करने का निश्चय किया। उन्होंने बताया कि “बिहार और झारखंड की 93 बच्चियों की परीक्षा ली गई। उद्देश्य 40 होनहार बच्चियों का चयन करना था, लेकिन 30 बच्चियाँ ही परीक्षा पास कर सकीं। उनमें से भी केवल 15 बच्चियों ने कक्षाएँ जॉइन कीं, जहाँ 7 बच्चियों के अभिभावकों से शुल्क लिया जाता था और 8 बच्चियों को निःशुल्क शिक्षा दी गई। उन्हीं 15 बच्चियों में से 9 बच्चियाँ नीट की परीक्षा में सफल होकर विभिन्न अस्पतालों से जुड़ीं।”

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दरअसल डॉक्टर मोहम्मद अतहर अंसारी की योजना ही यह थी कि आधी बच्चियों से शुल्क लिया जाएगा और आधी बच्चियों को (जो गरीब परिवार से संबंध रखती हों) निःशुल्क शिक्षा दी जाएगी। इसी योजना को आगे चलकर उन्होंने ‘ए.एम.डी. 2020’ नाम दिया। यहाँ ‘2020’ से आशय 20 बच्चियों को शुल्क लेकर शिक्षा देना और 20 बच्चियों को बिना शुल्क शिक्षा देना है। लड़कों के लिए भी यही योजना लागू हुई। परिणाम यह निकला कि अब तक लगभग 75 बच्चे और बच्चियाँ नीट पास कर चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ चुके हैं। लगभग 65 बच्चों को सरकारी सीटें प्राप्त हुईं, जबकि लगभग 10 बच्चों को प्राइवेट सीटें मिलीं। सुखद बात यह है कि आधे बच्चे और बच्चियों की फीस से ही शिक्षा तथा आवास और भोजन सहित सभी व्यवस्थाएँ सुचारु रूप से पूरी हो जाती हैं। डॉक्टर मोहम्मद अतहर ने बातचीत के दौरान इस बात पर तो प्रसन्नता व्यक्त की ही कि बड़ी संख्या में मुस्लिम बच्चे और बच्चियाँ डॉक्टर बन रहे हैं, उन्हें अधिक संतोष इस बात पर है कि ए.एम.डी. से निकलने वाले बच्चे और बच्चियाँ वास्तविक अर्थों में इस्लामी मूल्यों का पालन करते हैं। उन्होंने बताया कि “हमारा उद्देश्य ऐसे डॉक्टर बनाना है जो इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करें, नमाज़ पढ़ें, उत्तम आचरण का उदाहरण बनें और इस्लामी संस्कृति के प्रतिनिधि सिद्ध हों।” उल्लेखनीय है कि ‘ए.एम.डी. 2020’ से आगे बढ़कर दिल्ली में ‘ए.एम.डी. 40’ योजना की नींव पड़ चुकी है। इसके अंतर्गत सभी 40 बच्चों को निःशुल्क नीट की तैयारी कराई जाती है और आवास व भोजन सहित सभी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। 2025 में नीट पास कर 15 बच्चों ने सरकारी सीट प्राप्त की थी, जो अत्यंत उत्साहवर्धक है।

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मुस्लिम बच्चे और बच्चियों को नीट की तैयारी कराने के साथ-साथ इस्लामी शिक्षाओं से परिचित कराने के लिए ए.एम.डी. ने ऐसा दैनिक कार्यक्रम तैयार किया है, जो किसी दूसरी जगह देखने को नहीं मिलता। यहाँ यह बताना भी महत्त्वपूर्ण है कि ए.एम.डी. आवासीय कोचिंग चलाता है जहाँ व्यावसायिक शिक्षा के साथ-साथ क़ुरआन की समझ और दीनियात की कक्षाएँ भी होती हैं। समय पर जागना, भोजन करना, इबादत करना सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है। शिक्षा के साथ-साथ प्रशिक्षण का विशेष ध्यान रखना भी ए.एम.डी. की विशेषता है। इसका टैगलाइन ही ‘तालीम विद तरबियत’ है। प्रशिक्षण 2 भागों, क़ुरआन का अनुवाद और दीनियात की शिक्षा पर आधारित है। इस प्रकार प्रयास होता है कि बच्चों के भीतर दीन का एहसास पैदा हो और एक ईमान वाला डॉक्टर अस्तित्व में आए। संस्था की ओर से विद्यार्थियों को हर प्रकार की सुविधाएँ दी जाती हैं, यहाँ तक कि लड़कों और लड़कियों के लिए कोचिंग के साथ-साथ आवास की भी अलग व्यवस्था की गई है जिससे उनका मन किसी भी प्रकार विचलित न हो।

हम हैं कामयाब-9: 'ए.एम.डी.' बड़ी संख्या में सदाचारी और ईमानदार डॉक्टर्स तैयार करने में व्यस्त

मुस्लिम बच्चे और बच्चियों को डॉक्टर बनाने से ए.एम.डी. को निश्चित रूप से सराहना मिली है, लेकिन ए.एम.डी. की अन्य गतिविधियाँ भी प्रशंसा और बधाई के योग्य हैं। उदाहरण के लिए हर वर्ष होने वाला डॉक्टरों का सम्मेलन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। यह बताना भी हर्षप्रद होगा कि 2014 में ए.एम.डी. का दिल्ली चैप्टर, 2018 में झारखंड चैप्टर और 2025 में उत्तर प्रदेश चैप्टर शुरू हो चुका है। सभी स्थानों पर वार्षिक सम्मेलन आयोजित होता है। हर स्थान पर सम्मेलन से ठीक एक दिन पूर्व 2 महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। पहला कार्यक्रम ‘आओ दीन सीखें’ शीर्षक से आयोजित होता है जिसकी प्रस्तुति ‘मुनज़्ज़म मकतब दीनियात’ के जिम्मे है। इसमें दीन और इस्लाम की बातें उलेमा और विद्वानों की ज़ुबानी सुनने को मिलती हैं। दूसरा कार्यक्रम शाम के समय ‘इंटेलेक्चुअल मीट’ (बुद्धिजीवियों की बैठक) नाम से होता है जिसका शीर्षक ‘उम्मत के हालात और हमारी ज़िम्मेदारियाँ’ होता है। यह बैठक बहुत महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों से संबंध रखने वाले स्थानीय सम्मानित व्यक्तियों को एकत्र किया जाता है। उन्हें एहसास दिलाया जाता है कि मुस्लिम समाज को कठिन परिस्थितियों से निकालना है तो कम से कम 2 बच्चों को अपने क्षेत्र में शिक्षा और प्रशिक्षण देकर आगे बढ़ाएँ। अर्थात डॉक्टर किसी गरीब बच्चे की ज़िम्मेदारी लेकर उसे डॉक्टर बनाएँ, इंजीनियर किसी होनहार बच्चे को इंजीनियर बनाएँ, शिक्षक किसी बच्चे को शिक्षक बनाने का संकल्प लें, यहाँ तक कि किसी उत्पादन क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति आसपास के किसी बच्चे को उसी क्षेत्र में आगे बढ़ाए।

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ए.एम.डी. की सोच वास्तविक अर्थों में ऐसी है जो किसी भी व्यक्ति को दीन और दुनिया दोनों में सफल और कामयाब बना दे। डॉक्टर मोहम्मद अतहर अंसारी ने शिक्षा और प्रशिक्षण का जो दीपक प्रज्ज्वलित किया है, वह अब केवल उनके प्रयासों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि एक कारवाँ तैयार हो चुका है जिससे दिन-प्रतिदिन और लोग जुड़ते चले जा रहे हैं। अब आपको निर्णय करना है कि इस कारवाँ का हिस्सा आप कब बनेंगे!